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राहुल फॉर्मूला मतलब चापलूसों की चांदी
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Mon, 08 Sep 2014 12:57 PM IST
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लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त झटका खाने के बाद भी कांग्रेसियों की चाल बदली नहीं है। जनाधार वाले नेताओं पर चापलूस भारी पड़ रहे हैं।
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हालत यह है कि लोकसभा चुनाव में जो अपने बूथ पर ही तीसरे-चौथे नंबर पर रहे, वही संगठन के भाग्य विधाता बन गए हैं। हाल ही कांग्रेस के जिला-शहर अध्यक्षों की घोषणा हुई तो इसकी कलई खुल गई।
कांग्रेसी समझ नहीं पा रहे कि आखिर राहुल फॉर्मूला है क्या बला? कानपुर में दूसरे नंबर पर रहे पार्टी के एक वरिष्ठ नेता तो अपने मनमाफिक जिला-शहर अध्यक्ष बनवा नहीं सके।
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अलबत्ता बुंदेलखंड से यूपीए सरकार में मंत्री रहे एक नेता ने अपने लोगों को संगठन में जगह दिलवाकर विरोधियों को ठिकाने जरूर लगवा दिया।
इन महाशय को खुद अपने बूथ पर मुंह की खानी पड़ी। जिले के जिस पदाधिकारी के बूथ पर वह दूसरे नंबर पर रहे, उसे हटवाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया।
कामयाब भी रहे। जिस तरह से जिला-शहर अध्यक्षों का मनोनयन हुआ है उसे लेकर अब पार्टी में चर्चा होने लगी है कि चापलूस नेता सूबे में पार्टी को खत्म करके ही मानेंगे।
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खुद तो किसी काम के साबित नहीं हुए और जो काम के हैं उन्हें काम करने नहीं देंगे। ऐसे तो कांग्रेस खड़ी होने से रही।