भाजपा को वनवास से मुक्ति, पर इस बीमारी का क्या?
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लोकसभा चुनाव में भले ही भाजपा उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 सीटें जीतकर वनवास से मुक्ति पा गई हो, पर अपने पुराने रोगों से मुक्ति नहीं पा सकी।
एक-दूसरे को निपटाने का खेल पार्टी में पहले की तरह ही चल रहा है। भले ही मंच पर एकजुटता से काम करने को पार्टी की विशिष्टता बताई जा रही हो लेकिन सच्चाई इसके उलट है।
नेताओं के बीच मतभेद तो पहले से ही थे, अब मनभेद भी चरम पर पहुंच चुके हैं।
तभी तो जिस पार्टी में इस तरह की बैठकों में पूर्व प्रदेश अध्यक्षों व अन्य वरिष्ठ नेताओं को बुलाकर उनसे सुझाव मांगे जाते थे, उसी पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में कई बड़े नेताओं को सिर्फ श्रोता बना दिया गया।
बहुत कुछ कहती है बड़े नेताओं की दूरी
बड़े नेताओं की ओर से बरती गई दूरी ने जहां इस बैठक को पहले ही निष्प्रभावी बना दिया था, वहीं रही-सही कसर पूरी हो गई बैठक में डाली गई नई परंपराओं ने।
इनसे पार्टी नेताओं की एकजुटता तो दूर, दिलों की दूरी और बढ़ती नजर आई। सांगठनिक शिष्टाचार की ही धज्जियां नहीं उड़ीं, परंपराओं की भी अनदेखी की गई। इससे बैठक में आए नेता भी अनमने से नजर आए। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विनय कटियार उद्घाटन सत्र के बाद ही लौट गए।
डॉ. रमापति राम त्रिपाठी व सूर्यप्रताप शाही रुके भी तो सिर्फ श्रोता की भूमिका निभाते रहे।
सवालों में उलझा संगठनात्मक सत्र
वजह शायद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी ही थी जिसके चलते कार्यसमिति का संगठनात्मक सत्र सवालों में उलझकर रह गया।
बंद दरवाजों के पीछे संगठनात्मक मुद्दों पर चर्चा के दौरान जब प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने घोषणा की कि अब जिला व मंडलों की बैठकें नियमानुसार प्रत्येक तीन महीने पर हुआ करेंगी तो एक पूर्व महामंत्री ने सवाल कर दिया।
सवाल कि जिस मौजूदा नेतृत्व ने प्रदेश कार्यसमिति की बैठक तीन महीने के बजाय 15-16 महीने में करने की परंपरा शुरू कर दी हो, वह इसकी अपेक्षा कैसे कर सकता है?
क्यों चुप हो गए वाजपेयी?
इस पर वाजपेयी को चुप होना पड़ा। इसी दौरान प्रदेश महामंत्री संगठन सुनील बंसल ने पार्टी के मोर्चा व प्रकोष्ठों के प्रमुखों की निष्क्रियता पर सवाल कर क्षोभ जताया।
इस पर मंच से नीचे बैठे एक अन्य पूर्व महामंत्री ने यह सवाल दागकर कि ‘बनाया तो आपने ही है, काम देने की जिमेदारी भी तो आपकी है’ उन्हें भी चुप रहने को मजबूर कर दिया।
ऐसे में साफ हो गया कि वजह चाहे जो भी हो लेकिन पार्टी के भीतर अहं का टकराव खत्म नहीं हुआ है।
सम्मान व सद्भावना का संकट
कुछ वरिष्ठ नेता जो कुछ कहते हैं उससे पता चलता है कि भाजपा में परस्पर संवाद की कमी तो पहले ही थी, अब परस्पर सम्मान व सद्भावना का भी संकट खड़ा हो गया है।
इसी वजह से कई वरिष्ठ नेता इस बैठक से किनारा कर गए। सूत्रों की मानें तो वरिष्ठों को जान-बूझकर सही तरीके व समय से सूचना नहीं दी गई।
पार्टी विधानमंडल दल के एक पूर्व नेता कहते हैं कि उन्हें बैठक से एक दिन पहले कार्यालय से फोन पर बताया गया, जिसके चलते पहुंच पाना असंभव ही था।
एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि जाते तो तब, जब मौजूदा नेतृत्व की बुलाने में दिलचस्पी होती। वे कहते हैं कि जो गए ही थे, उनकी क्या भूमिका रही? सिवाय श्रोता बने रहने के।
इस तरह टूटीं पंरपराएं
पार्टी की परंपरा के अनुसार इस तरह की बैठकों में सारे पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व अन्य वरिष्ठ नेताओं से विभिन्न सत्रों में सुझाव पूछे जाते हैं, पर वृंदावन की बैठक में ऐसा नहीं हुआ।
यही नहीं, उद्घाटन व समापन सत्र के अलावा शेष पूरे समय बैठक में मौजूद पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मंच से नीचे बैठे रहे।
आम तौर पर विधानमंडल दल के नेता और विधानपरिषद में पार्टी के नेता सभी सत्रों में प्रदेश अध्यक्ष के साथ मंच पर रहते हैं और सुझाव भी देते हैं, लेकिन इस बार इस परंपरा को भी तोड़ दिया गया।
विधानमंडल दल के नेता सुरेश खन्ना राजनीतिक प्रस्ताव पर बात रखने भर को ही मंच पर जगह पा सके।
बढ़ गई है संवादहीनता की खाई
एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि पार्टी के मौजूदा नेतृत्व और पुराने नेताओं के बीच संवादहीनता की खाई खतरनाक सीमा तक बढ़ गई है।
वैसे तो वे अस्वस्थ हैं, पर वर्तमान नेतृत्व जिस शैली में काम कर रहा है, उसके चलते जाने का अर्थ ही क्या था।
जो गए उनकी भूमिका की अनदेखी कर दी गई, तो वहां जाकर अपमान को न्यौता देने से कोई लाभ नहीं था।
सूर्य प्रताप शाही जैसे पूर्व अध्यक्ष वहां गए थे, पर उन्हें बोलने का मौका नहीं मिला। जब वरिष्ठ नेता सुझाव नहीं दे सकते तो सिर्फ गिनती गिनाने से क्या लाभ।