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अदब के शहर में गोमा से बेअदबी
दीप सिंह, सचिन त्रिपाठी/लखनऊ
Updated Sun, 29 Sep 2013 02:36 PM IST
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लखनऊ के लिए गोमती नदी जीवनदायिनी है। लेकिन हम इसे लेकर बिल्कुल भी सजग नहीं हैं।
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इसकी सफाई के नाम पर दावे तो खूब हुए लेकिन हकीकत इसके उलट है।
यही हकीकत जानने के लिए रिवर डे के बहाने अमर उजाला ने गोमती का जायजा लिया तो देखा कि हम वो सारे काम कर रहे हैं जिससे हमारी लाइफ लाइन गोमा का दम घुट रहा है।
नाम के बने एसटीपी
नाम के लिए एसटीपी बने, लेकिन नाले अब भी सीधे नदी में मिल रहे हैं। जो एसटीपी हैं उनकी क्षमता बहुत कम है। सीवेरज पंपिंग स्टेशनों से भी पानी साफ हुए बगैर नदी में पहुंच रहा है।
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बाढ़ नियंत्रण के लिए बने पंपिंग स्टेशन सामान्य दिनों में बंद रहते हैं और नाले का पानी नदी में गिरता है। जब बारिश ज्यादा होती है तो नदी का पानी शहर की ओर न आए, इसके लिए ये चलाए जाते हैं।
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नालों का मुहाना बंद करके फिर गंदा पानी नदी में गिराया जाता है। नदी के जलस्रोत कम करने में भी हम कोई कसर नहीं छोड़ रहे। नदी तटों के दोनों ओर पक्के निर्माण होते जा रहे हैं।
भूले हरियाली बढ़ाना
पौधरोपण 50 साल में 40 प्रतिशत से घटकर चार प्रतिशत रह गया। इससे जलस्तर घट रहा है। प्रतिमा विसर्जन और पॉलीथिन सहित पूजन सामग्री गोमती में फेंककर रही सही कसर हम पूरी कर देते हैं।
हालत यह हो गई है कि लखनऊ पहुंचने तक गोमती का पानी जहर बन जाता है।
नालों की गंदगी सीधे गोमती में
नालों का पानी सीधे गोमती में न गिरे। इसके लिए सभी के डायवर्जन करके एसटीपी तक गंदा पानी ले जाने का दावा किया गया था। इसके बावजूद अब भी शहर के 48 नाले सीधे गोमती में गिराए जा रहे हैं जिनमें जाली तक नहीं लगी है।
बंद हो रहे हैं गोमती के जलस्रोत
गोमती मूलत: भूजल पर आधारित नदी है। पीलीभीत जिले में स्थित फुल्हर झील इसका मुख्य स्रोत है। इसके अलावा आसपास की कई झीलों से निकले पानी की वजह से इसमें साल भर पानी रहता है। लेकिन लोग इन झीलों को पाटते जा रहे हैं जिससे गोमती का जलस्रोत घटता जा रहा है।
पंपिंग स्टेशन पर ही ओवरफ्लो हो रहे नाले
एसटीपी में पानी पहुंचाने से पहले पंपिंग स्टेशन जरूरत के मुकाबले कम क्षमता होने के कारण पीक ऑवर में सुबह आठ से 11 बजे के बीच रोजाना नाले ओवरफ्लो होकर बिना शोधित हुए गोमती में मिलते हैं।