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बहराइच: तबाही के कगार पर महाराजा रणजीत सिंह के वंशजों का किला

Wed, 19 Jul 2017 02:38 AM IST
अतुल अवस्थी/राजेश उपाध्याय/अमर उजाला, बहराइच
अतुल अवस्थी/राजेश उपाध्याय/अमर उजाला, बहराइच Updated Wed, 19 Jul 2017 02:38 AM IST
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fort of ranjeet singh is in danger in   bahraich.
बहराइच में रणजीत सिंह का किला - फोटो : amar ujala

जहां कभी आजादी के आंदोलन की अलख जगाई जाती थी, इंकलाब के नारे बुलंद होते थे। इन नारों की गूंज समेटे पिपरी किले का वजूद मिट्टी में मिलने के कगार पर है। संघर्षों से अंग्रेजों से तो जीत हासिल कर ली, लेकिन अपनों ने उपेक्षित कर दिया। जिसके चलते अब किले की यादों को ईंट के रूप में सहेजने के लिए उस पर हथौड़े चलाए जा रहे हैं।

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कारण, किला और घाघरा नदी के बीच महज 20 मीटर का फासला बचा है। लेकिन इतिहास के इस पन्ने को सुरक्षित करने के लिए अब तक प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया है। किले की ओर घाघरा की लहरों को बढ़ते देख अब किले के वारिस उसकी ईंटों को सुरक्षित करने की कवायद में जुटे हैं।
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वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद वायसराय ने इलाहाबाद में राजे रजवाड़ों की मीटिंग बुला महारानी विक्टोरिया के घोषणा पत्र सुनाया था। इस घोषणा पत्र के बाद अंग्रेेजों ने छीनी गई रियासतों का बंटवारा किया। उसी बंटवारे में बहराइच के पिपरी रियासत के 33 गांव पंजाब के राजा रणजीत सिंह के वंशजों के पाले में आए। इस रियासत पर राजा जगदेव सिंह को कब्जा मिला।
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बाद में उन्होंने अपनी बहन कुंवरि सिंह को पिपरी रियासत दान दे दी। उसी के तहत वर्ष 1867 में किले का निर्माण कराया गया था। लगभग एक एकड़ में किले की प्राचीर है। इसके अलावा किले के आसपास 25 एकड़  जमीन धरोहर का परिसर माना जाता है। यह किला राजा दलजीत सिंह के पिता राजा जगजोत सिंह ने बनवाया था। किले का निर्माण होने के बाद यहां पर भी स्वतंत्रता आंदोलन के तराने गाए जाते थे।

अंग्रेजों के खिलाफ बनती थी आंदोलन की रुपरेखा

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1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद जब स्वतंत्रता आंदोलन का नया दौर शुरू हुआ। तब इस किले में भी अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की रूपरेखा बनती थी।

पिपरी रियासत के वंशज राजा दलबीर सिंह का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन के लिए किले में गुपचुप योजनाएं बनती थीं। उसी के तहत क्षेत्र के लोग अंग्रेजों का सामना करते थे। लेकिन गुलामी की बेड़ियों को काटने की रूपरेखा तय करने के गवाह इस किले का अस्तित्व इस समय खतरे में है।

इस अति प्राचीन धरोहर को घाघरा की लहरें लीलने को बेताब दिख रही हैं। नदी व किले के बीच महज 20 मीटर का फासला बचा है। प्रतिदिन नदी की लहरें कटान करते हुए किले की ओर बढ़ रही हैं। लेकिन अब तक इस धरोहर को सुरक्षित करने के उपाय नहीं किए गए हैं।

अधिकारियों ने नहीं सुना इसलिए चलवा रहे हथौड़ा

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राजा दलजीत सिंह के वारिस भांजे दलबीर सिंह (बायें) - फोटो : amar ujala

राजा दलजीत सिंह के वारिस के रूप में उनके भांजे दलबीर सिंह किले की देखरेख करते हैं। उन्होंने बताया कि राजा दलजीत सिंह रिश्ते में उनके मामा लगते हैं। उन्हीं की ओर से यह किला उनके परिवार को दिया गया था।

इसके अलावा कानपुर और इकौना की रियासत भी उन्हीं के परिवार के नाम है। लेकिन दलबीर प्रशासनिक उपेक्षा से आहत हैं।

उन्होंने कहा कि सात वर्ष से वह अधिकारियों के यहां चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन सुनी नहीं गई, न ही किले के संरक्षण के उपाय किए गए। जिसके चलते अब याद के रूप में ईंटों को सहेजने के लिए किला तोड़ना पड़ रहा है।

किले की सुरक्षा के होंगे उपाय: एसडीएम
महसी के उपजिलाधिकारी नागेंद्र कुमार से जब ऐतिहासिक किले के संरक्षण के बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि घाघरा की कटान में गांव और लोगों के घर कट रहे हैं। ऐसे में आम जन की सुरक्षा के साथ ही किले की सुरक्षा के उपाय करेंगे।

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