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सवाल-जवाब: लोकतंत्र के चारों खंभों के बीच गड़बड़ाया शक्ति संतुलन का सिद्धांत, बता रहे हैं पूर्व मंत्री प्रवीन सिंह ऐरन
Mon, 06 Dec 2021 10:58 AM IST
ishwar ashish
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Mon, 06 Dec 2021 10:58 AM IST
सार
पूर्व मंत्री प्रवीन सिंह ऐरन ने राजनीति में आए बदलावों और टिकट वितरण कैसे होता है जैसे मुद्दों पर चर्चा की। पढ़ें एक रोचक व महत्वपूर्ण बातचीत:
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पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रवीन सिंह ऐरन
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रवीन सिंह ऐरन कहते हैं कि लोकतंत्र के चारों खंभों के बीच शक्ति संतुलन का सिद्धांत गड़बड़ा गया है। देश-प्रदेश की राजनीति में यह सबसे चिंतनीय विषय है। एक-दूसरे को नियंत्रित करने और संतुलन की संविधान की मूल अवधारणा के विपरीत यह आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2010 के बाद बड़े पैमाने पर इसमें बदलाव देखे जा रहे हैं। हमारे लोकतंत्र के लिए यह कोई शुभ संकेत नहीं है। प्रस्तुत है ऐरन से बातचीत के प्रमुख अंश...
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सवाल- राजनीति में किस तरह का बदलाव देखते हैं ?
जवाब- देखिए, जाति और धर्म का प्रयोग भारतीय राजनीति में शुरू से होता रहा है। मैं भारत की समकालीन राजनीति में बदलाव नवंबर 2010 से मानता हूं, जब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत भ्रमण के बाद स्वदेश लौटे। उसके बाद राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदला। टूजी घोटाला, निर्भया कांड, कॉमनवेल्थ गेम व हेलीकॉप्टर घोटाला, अन्ना हजारे का आंदोलन और जनलोकपाल जैसे मुद्दे सामने आए। सबसे खास बात है कि लोकतंत्र के चारों खंभों के बीच नियंत्रण और संतुलन के सिद्धांत का सामंजस्य गड़बड़ाया। संविधान का यह मूल तत्व मद्धिम पड़ने लगा। मीडिया के बड़े हिस्से पर देशी-विदेशी कुछ बड़ी पूंजीवादी ताकतों का कब्जा हो गया। साथ ही कांग्रेस की क्षरण की प्रक्रिया भी प्रारंभ हुई। कांग्रेस की मध्य मार्ग की लाइन धूमिल करते हुए आर्थिक विषमता बढ़ाने वाली नीतियां लागू की गईं। इतना ही नहीं उन्हें अच्छी तरह से आम लोगों के दिलो-दिमाग में बैठाया भी गया। आने वाले वक्त में आर्थिक विषमता बढ़ेगी। निर्णय लेने और चुनावी नतीजे प्रभावित करने की शक्ति कुछ देशी-विदेशी पूंजीवादी हाथों तक केंद्रित होकर रह जाएगी।
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सवाल- टिकट वितरण में क्या अंतर अब पाते हैं?
जवाब- 45 वर्ष के राजनीतिक अनुभव में टिकट के वितरण में एक मापदंड जरूर देखा। जब पार्टी की लहर होती है तो सीटों के एक महत्वपूर्ण हिस्से पर वो अपने वफादार और यसमैन को टिकट देती है। जब ऐसा नहीं होता तो जातीय एवं अन्य समीकरणों को ध्यान में रखते हुए जिताऊ नेता को प्रत्याशी बनाया जाता है। कहा जा सकता है कि काफी हद तक यहां मांग और आपूर्ति का सिद्धांत लागू होता है।
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सवाल- साझा करने लायक कोई अविस्मरणीय घटना?
जवाब- बात 70 के दशक की है। तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा बरेली आए थे। तत्कालीन डीएम विश्वनाथ प्रसाद भी उनके साथ गाड़ी में बैठे हुए थे। कोतवाली के सामने उन्हें अचानक युवाओं की भीड़ ने घेर लिया। जिस जीप में वो बैठे हुए थे, उसका संतुलन बिगड़ गया। मैंने अपने तीन-चार साथियों के साथ बहुगुणाजी को थाना कोतवाली के अंदर पहुंचाया। लेकिन, उनके अंदर पहुंचते ही पीएसी ने मेरे ऊपर भी लाठियां बरसाईं। मुझे जेल भी भेजा। इस घटना को कभी नहीं भूल पाता।
सवाल- आप राजनीति में कैसे आए?
जवाब- स्कूली शिक्षा के दौरान ही मैं राजनीति में रचने-बसने लगा था। इस्लामिया इंटर कॉलेज में कक्षा-11 में प्रीमियर का चुनाव लड़ा। वह चुनाव मेरे जीवन की महत्वपूर्ण घटना थी। उसके बाद एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस में सक्रिय रहा। कांग्रेस के कद्दावर नेता राम सिंह खन्ना को चुनाव भी लड़ाया करता था। लेकिन, इमरजेंसी के दौरान कुछ समय के लिए कांग्रेस को छोड़ा। तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा बरेली आए तो उस दौरान हुए युवाओं के आंदोलन में मुझे भी पुलिस ने पकड़कर जेल भेज दिया। इस घटना ने मुझे राजनीति में और भी शिद्दत से बने रहने के लिए प्रेरित किया।
80 के दशक के आखिरी वर्षों में बोफोर्स घोटाले का मुद्दा सामने आया, तो मैंने वीपी सिंह के साथ जाना ज्यादा उचित समझा। क्योंकि, मैं भ्रष्टाचार के सदैव खिलाफ रहा। 1989 के चुनाव में कैंट विधानसभा से कांग्रेस प्रत्याशी इस्लाम साबिर को हराकर विधायक बना। 1993 में सपा के टिकट पर पुन: विधानसभा चुनाव जीता। 1994 में बसपा सरकार में मंत्री भी बना। 2009 में बरेली की जनता ने लोकसभा में पहुंचाया।