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सवाल- जवाब: पूर्व केंद्रीय मंत्री रामजीलाल सुमन बोले- अब तो राजनीति व्यापार हो गई... पूरा जोर जज्बात को भुनाने पर है
Mon, 13 Dec 2021 11:30 AM IST
ishwar ashish
अमर उजाला, अलीगढ़
अमर उजाला, अलीगढ़
Published by: ishwar ashish
Updated Mon, 13 Dec 2021 11:30 AM IST
सार
पूर्व केंद्रीय मंत्री व सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामजीलाल सुमन का कहना है कि आज की राजनीति का पूरा जोर जज्बातों को भुनाने पर है। सपा भावनाओं के आधार पर राजनीति नहीं करना चाहती है।
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पूर्व केंद्रीय मंत्री रामजीलाल सुमन।
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
पूर्व केंद्रीय मंत्री व सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामजीलाल सुमन कहते हैं, पिछले 10-15 वर्षों में भावना प्रधान राजनीति हो रही है। इस दौर में जज्बात को भुनाने का ही काम किया गया। सच्ची राजनीति भावनाओं से नहीं होती। लोग चाहते हैं कि उनके जीवन में कुछ बदलाव आए। बेबस और लाचार लोगों को सहारा मिले। बेरोजगारों को रोजगार मिले। समाजवादी पार्टी भावनाओं के आधार पर राजनीति नहीं करना चाहती। पेश है, उनसे मनोज माहेश्वरी की बातचीत के प्रमुख अंश...
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सवाल - राजनीति में कैसे आना हुआ?
जवाब- जब मैं आगरा में बीए में पढ़ता था तो समाजवादी आंदोलन के वहां के जो नेता थे, उनके संपर्क में आया। ऐसे में विद्यार्थी जीवन से ही समाजवादी विचारों का प्रभाव मेरे जीवन पर रहा। आपातकाल के दौरान आगरा में सबसे पहले मेरी ही गिरफ्तारी हुई थी। जब मैं जेल में गया तब तक मेरे लॉ के चार सेमेस्टर पूरे हो चुके थे। जेल से छूटकर आया तो पांचवें सेमेस्टर के लिए आगरा के किसी भी कॉलेज में दाखिला नहीं मिला। तदुपरांत मुरादाबाद के एक कॉलेज में पांचवें सेमेस्टर में दाखिला हुआ। जब छठवां सेमेस्टर आया, तब तक चुनाव आ गए और मुझे जनता पार्टी से फिरोजाबाद संसदीय सीट से टिकट मिल गया। इस चुनाव में मुझे जीत हासिल हुई।
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सवाल - राजनीति में अब क्या बदलाव महसूस करते हैं?
जवाब- हम उसूलों के साथ राजनीति में आए थे। डॉ. लोहिया, जयप्रकाश जी, आचार्य नरेंद्र देव को अपना आदर्श माना। तब राजनीति में आने वाले लोगों की वैचारिक प्रतिबद्धता होती थी। राजनीति को हम सामाजिक परिवर्तन का हथियार मानते थे। अब तो राजनीति को लोगों ने व्यापार बना लिया है। भूख, प्यास, बेबसी, लाचारी जैसे मुद्दे राजनीति से गायब हैं। अब तो ऐसे मुद्दों पर राजनीति होने लगी है जिनका आम आदमी की जिंदगी से कोई रिश्ता नहीं है।
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सवाल - सपा किन मुद्दों पर चुनाव मैदान में उतरने जा रही है?
जवाब- समाजवादी पार्टी जनता की समस्याओं को अच्छी तरह से जानती है। सपा के घोषणापत्र में इन समस्याओं के निराकरण का वादा होगा। पिछले 10-15 साल में भावना प्रधान राजनीति ही हुई है। लोगों के जज्बात को भुनाने का काम किया गया है। आज लोग चाहते हैं कि उनके जीवन में बदलाव आए। बेरोजगारों को रोजगार मिले। सपा भावनाओं के आधार पर राजनीति नहीं करना चाहती। सपा चाहती है कि प्रदेश के लोगों को समस्याओं से निजात मिले।
सवाल - आपने मुलायम सिंह और अखिलेश यादव दोनों के साथ काम किया है। दोनों की कार्यशैली में क्या अंतर पाते हैं?
जवाब- नेताजी ने जो हासिल किया, वह अपने संघर्ष से हासिल किया है। वर्ष 1977 में जब प्रतिपक्ष की सभी पार्टियां मिल गईं और जनता पार्टी बन गई तो हिंदुस्तान में समाजवादी आंदोलन खत्म हो गया। मुलायम के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण काम यह रहा कि 1992 में उन्होंने सभी पुराने समाजवादियों को इकट्ठा करके समाजवादी पार्टी बनाई। जब भी समाजवादी आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा, मुलायम सिंह के जिक्र के बिना वह पूरा नहीं होगा। अखिलेश नई पीढ़ी के नौजवान हैं। उनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक है। एक परिपक्व और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ का जो विचार होता है, उसे अखिलेश के जीवन में देखा जा सकता है।
सवाल - राजनीतिक जीवन का कोई दिलचस्प किस्सा..?
जवाब- वर्ष 1977 में जब मुझे जनता पार्टी से टिकट मिला तो पार्टी के नेताओं ने कहा, जाओ चुनाव लड़ने का इंतजाम करो। उस समय मैं 26 साल का था। कुछ ने कहा कि अपने पिताजी से बात करो। पर, गांव पहुंचा तो पिताजी लट्ठ लिए तैयार बैठे थे। उन्होंने कहा, मैं तो यह समझता था कि इसे पढ़ने के लिए भेजा है, लेकिन यह तो मेरी जमीन बिकवाने का काम कर रहा है। वह काफी नाराज हुए। मुझे घर में घुसने नहीं दिया। जैसे-तैसे मैंने उन्हें समझा-बुझाकर राजी किया। तब उन्होंने अपने दो परिचितों से 18 हजार रुपये का इंतजाम करके मुझे चुनाव लड़ने के लिए दिया। उस चुनाव को मैंने करीब दो लाख वोटों से जीता था।