आग की लपटों को चीरती हुई बचाव दल तक पहुंची मां, बोली- मेरी बच्ची को बचा लो, वो मर जाएगी
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एसएसजे इंटरनेशनल होटल आग का गोला बन चुका था। वो आग की लपटों से घिरी थी। तकरीबन 85 फीसदी झुलस चुकी थी। मुंह सूखा जा रहा था, सांसें उखड़ रही थीं। कानपुर की 25 वर्षीय युवती रानी बदहवास हालत में जलती हुई ग्राउंड फ्लोर पर मौजूद बचाव दल के सामने पहुंची। बोली, ‘...मेरी बच्ची मेहर। वो ऊपर फंसी है। ...पहली मंजिल पर। प्लीज उसे बचा लो। ...प्लीज जल्दी करो। वो मर जाएगी।’ बस यही उसके आखिरी शब्द थे अपनी डेढ़ वर्ष की मासूम बच्ची की जिंदगी बचाने के लिए।
याचना के वे कातर स्वर सुनकर वहां मौजूद पुलिस व अग्निशमन दल के भी होश उड़ गए। बचाव दल फुर्ती से पहली मंजिल पर पहुंचा तो मासूम मेहर कमरे के बाहर औंधे मुंह पड़ी थी। उसे उठाकर बाहर लाया गया। लेकिन, तब तक वह जिंदगी को अलविदा कह चुकी थी। मां रानी गंभीर हालत में सिविल अस्पताल में भर्ती है।
दरअसल एसएसजे इंटरनेशनल होटल में भीषण आग के दौरान रानी अपनी डेढ़ साल की बच्ची को सीने से चिपकाकर भागी। नीचे जाती सीढ़ियों पर आग और धुएं की वजह से रास्ता नजर नहीं आया और इस बीच पहली मंजिल पर ठोकर लगने से बच्ची हाथ से छिटक गई। धुएं में लाख कोशिश के बावजूद उसे बच्ची नहीं नजर आई तो वह सीढ़ियों को टटोलते हुए आग के शोलों को चीरकर किसी तरह से नीचे पहुंची। यहां पहुंचकर उसने पुलिस व अग्निशमन कर्मियों को बच्ची के बारे में बताया और बेहोश होकर गिर गई। बच्ची के फंसे होने की सूचना ने खाकी के होश उड़ा दिए।
दरोगा-सिपाही भीतर जाने के लिए आगे बढ़े लेकिन लपट ने झुलसा दिया। इस बीच मुख्य अग्निशमन अधिकारी ने चेहरे पर मास्क चढ़ाया और लपटों को चीरते हुए सीढ़ियों से पहली मंजिल पर पहुंच गए। उन्हें आगे चलते देख अग्निशमनकर्मी भी मास्क लगाकर पीछे दौड़े। पहली मंजिल पर पहुंची मुख्य अग्निशमन अधिकारी को मेहर गैलरी में पड़ी दिख गई। उसे उठाकर नीचे लाया गया। हालांकि, तब तक मासूम दम तोड़ चुकी थी। इस बीच होटल में फंसे लगभग सभी लोग ऊपर वाली मंजिल पर जा चुके थे। चीख-पुकार मचाते लोगों की जान बचाने के लिए पुलिस और अग्निशमन विभाग के लोग भी ऊपर पहुंच गए।
सूचना पर पांच-सात मिनट में ही पहुंच गई पुलिस
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आग लगने की सूचना मिलने के सात-आठ मिनट बाद ही पुलिस मौके पर पहुंच गई थी। पांच-सात मिनट के बाद फायर ब्रिगेड भी आ गई। चारबाग चौकी प्रभारी चंद्रमोहन सिंह के अलावा दरोगा वैभव सिंह, नाका कोतवाली के वरिष्ठ उपनिरीक्षक ए. सिद्दीकी, सिपाही मोहर अली सहित मुख्य अग्निशमन अधिकारी अभय भान पांडेय व उनकी टीम जब मौके पर पहुंची तो चार मंजिला होटल नीचे से ऊपर तक लपटों से दहक रहा था। इसी बीच एक महिला सीढ़ियों से नीचे जलती हुई आई और बचाव दल के सामने ही गिर पड़ी। पुलिसकर्मियों और अग्निशमनकर्मियों को देखकर वह चीखी। बोली, मेरी बच्ची मेहर ऊपर फंसी है। ...पहली मंजिल पर। उसे बचा लो। ...प्लीज बचा लो। वह मर जाएगी। यह कहते हुए महिला बेहोश हो गई।
‘भाई को लखनऊ में बसानी थी नई गृहस्थी, उसकी दुनिया ही उजड़ गई’
‘...ऊपरवाले। यह क्या कर डाला। अभी तो मेरे भाई की कच्ची गृहस्थी थी। क्यों उजाड़ दी। क्या गलती कर दी हमने जो ऐसा दिन दिखाया। अब बहू और मासूम प्रत्यक्षा को कैसे बताऊंगा कि अनहोनी हो गई...।’ प्रियांक का शव देखकर उसके बड़े भाई अधिवक्ता रोहित के मुंह से यह शब्द निकले तो पोस्टमार्टम हाउस में मौजूद लोगों की आंखें डबडबा गईं। साले सौरभ ने कंधे पर हाथ रखकर ढांढस बंधाने की कोशिश की तो उनका भी गला रुंध गया।
सौरभ ने बताया कि प्रियांक शर्मा मूलरूप से अलीगढ़ के अतरौली खत्रीपाड़ा के रहने वाले थे और नोएडा की नेक्स्ट एजूकेशन कंपनी में बतौर क्षेत्रीय प्रबंधक कार्यरत थे। वह नोएडा में ही किराए का मकान लेकर पत्नी सुरक्षा और चार साल की बेटी प्रत्यक्षा के साथ रह रहे थे। कंपनी ने उनका तबादला लखनऊ कर दिया था। इसी सिलसिले में वह रविवार को लखनऊ आए और होटल एसएसजे इंटरनेशनल में कमरा संख्या 502 में रुक गए। बड़े भाई रोहित ने बताया कि दो दिन के दौरान उसने दफ्तर की औपचारिकताएं पूरी करने के साथ ही किराए का मकान देखा था। मंगलवार सुबह ही उसे नोएडा लौटना था। बातचीत करते-करते वह कई बार फफक पड़े। भर्राए गले से उन्होंने कहा, ‘मेरे भाई को लखनऊ में नई गृहस्थी बसानी थी। वह पत्नी-बेटी को लेने के लिए नोएडा जा रहा था। इससे पहले ही उसकी दुनिया उजड़ गई।’
उस रात भी सपने में बेटे को खाकी में देखा होगा
किसान गणेश सिंह का सपना था कि उनका बेटा खाकी वर्दी पहनकर देश की सेवा करे। यह सपना वो दिन-रात देखते थे। इसके लिए उन्होंने हर जतन किया। सुबह उठकर बेटे अविनाश को खेतों में दौड़ाते थे। उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही की भर्ती का आवेदन उन्होंने ही भरकर अपने हाथों से जमा किया था। आखिरकार परीक्षा का दिन भी नजदीक आ गया। बेटे को वर्दी में देखने का सपना लिए गणेश सिंह सोमवार रात सोए तो जरूर लेकिन सुबह होटल विराट उनकी और अविनाश की चिता बन गया। गणेश और अविनाश अपना सपना आंखों में लिए दुनिया से रुखसत हो गए।
अग्निकांड में जान गंवाने वाले बिहार निवासी 55 वर्षीय किसान गणेश सिंह के बड़े भाई भीमसेन ने बताया कि भाई-भतीजे के झुलसने की खबर सुनते ही वह बिहार से भागे चले आए। बोले, ‘गणेशी का सपना था कि बेटा खाकी वर्दी पहने। अपना यह सपना आंखों में लिए ही वह दुनिया से चला गया।’ भीमसेन भागे चले आए। बताया कि गणेश सिंह किसानी करते थे। उसके परिवार में पत्नी मंजू के अलावा बेटी प्रियंका, सपना व बेटे अविनाश, रितिक और छोटू हैं।
‘क्या पता था कि अब उन दोनों की सुबह कभी नहीं होगी’
बकौल भीमसेन, गणेशी कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था इसलिए अविनाश को भर्ती परीक्षा दिलवाने के लिए लखनऊ आ गया। यहां विराट होटल में उसने कमरा बुक कराया। मंगलवार सुबह अविनाश की परीक्षा होनी थी। बोले कि, ‘क्या पता था कि अब उन दोनों की सुबह कभी नहीं होगी।’
उधर, अग्निकांड में मरने वाला निजी कंपनी का कर्मचारी संतोष महाराष्ट्र के पुणे से यहां आया था। वह भी विराट होटल में ही ठहरा था। पुलिस का कहना है कि संतोष यहां कब और किस काम से आया था? इस बारे में जानकारी नहीं मिल सकी है। उसके परिवारीजनों से संपर्क हो गया है। वह लखनऊ के लिए चल चुके हैं। उनके आने के बाद ही बाकी जानकारियां मिलेंगी।