छोटे किसानों और भूमिहीनों के लिए सहारा बनीं मनरेगा, लाभार्थी बोले- कम हुईं दुश्वारियां
- लॉकडाउन से पैदा हुई कारोबारी मंदी में छोटे किसानों और भूमिहीनों को मनरेगा से बड़ा सहारा मिल रहा है
- मनरेगा के तहत मिल रही मजदूरी कुछ हद तक आंसू पोंछने का काम कर रही है
- कमोबेश सभी गांवों में मनरेगा का काम शुरू हो चुका है
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कोरोना ने बहुत कुछ बदल दिया। रहन-सहन ही नहीं। खान-पान ही नहीं। पहचान भी! घर छूटा। परिवार छूटा। कमाने परदेस गए। अजनबी शहर में कोई पहचान न थी। बरसों मेहनत से एक नई पहचान मिली। मिस्त्री। सुपरवाइजर। ड्राइवर। ठेकेदार। इस पहचान ने रोटियां दीं। सम्मान से जीने का हक दिया। ...तो समाज में रुतबा भी। पर, अब...? गांव लौटे तो ये पहचान भी खो गई। जिंदगी के लिए फिर से नया संघर्ष। पहचान के लिए संघर्ष। गांवों में काम के नाम पर मनरेगा है। पर, जो हाथ बरसों स्टीयरिंग पर चले अब वो फावड़ा चलाएं भी तो कैसे? ऐसा नहीं कि मनरेगा बदलाव नहीं ला रहा। निश्चित तौर पर ला रहा है। पर, उन्हीं की जिंदगी में जो हमेशा गांव में रहे। जो गांव की माटी, धूप-ताप के अभ्यस्त हैं।
लॉकडाउन से पैदा हुई कारोबारी मंदी में छोटे किसानों और भूमिहीनों को मनरेगा से बड़ा सहारा मिल रहा है। बेमौसम बारिश से किसी का गेहूं खराब हुआ, किसी के खेत में तैयार सब्जी बिक नहीं रही है, पर मनरेगा के तहत मिल रही मजदूरी कुछ हद तक आंसू पोंछने का काम कर रही है। कमोबेश सभी गांवों में मनरेगा का काम शुरू हो चुका है। शासन से सख्त निर्देश भी हैं। यही वजह है कि ग्राम प्रधान डुगडुगी बजवाकर जिनके पास जॉब कार्ड है, उनको काम करने के लिए बुला रहे हैं। हर दिन केरिकॉर्ड की निगरानी भी हो रही है।
काम चल जा रहा, पर बचत नहीं
सीतापुर के गांव सरसौली की आशा देवी के पास दो बीघा जमीन है। वे अपने गांव के बाहर तालाब में मनरेगा का काम करती हुई मिलीं। इस बार उनके खेत में उम्मीद के मुताबिक न गेहूं हुआ और न ही सब्जी उगाना फायदे का सौदा साबित हुआ। बताती हैं, मई में मुझे मनरेगा में कई दिन काम मिल गया। इस बार बारिश के महीनों के लिए कुछ बचत तो नहीं हो पाएगी, पर काम चल जा रहा है। सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से मिले राशन ने भी काफी मदद पहुंचाई है। इसी गांव के किसान मुन्नी लाल बताते हैं कि बाजार में सब्जियां नहीं बिकीं तो उन्होंने मनरेगा में काम करना शुरू कर दिया। इससे परिवार का भरण-पोषण कर ले रहे हैं।
खाली लौटे, तालाब में मिला काम
सीतापुर में ही थोड़ा आगे बढ़ने पर ग्राम पंचायत गंधौली में कई प्रवासी मजदूर तालाब की खोदाई करते मिले। उमेश और प्रदीप दिल्ली में एक होटल में काम करते हैं। वहीं ओमप्रकाश, रामेश्वर, योगेश और अनिल पंजाब व हरियाणा में मजदूरी करते हैं। ये सभी क्वारंटीन का समय पूरा कर चुके हैं। उमेश और उनके साथी बताते हैं कि खर्चे के लिए पैसे नहीं हैं। पिछले तीन दिन से मनरेगा में काम कर रहे हैं। इससे काफी मदद मिल रही है। ग्राम चंद्रा के प्रधान प्रतिनिधि मनोज कुमार बताते हैं कि वे अपने गांव में एक दिन पहले शाम को डुगडुगी बजाकर जॉब कार्ड वालों को सूचना दे देते हैं कि अगले दिन कहां काम के लिए आना है। वर्तमान में 70-100 श्रमिक काम कर रहे हैं। हालांकि, इनमें क्वारंटीन का समय पूरा न कर पाने के कारण अन्य प्रदेशों से लौटे श्रमिक कम ही हैं।
काम शुरू हुआ तो मिली खुशी
बाराबंकी के गांव मालिनपुर के श्रवण कुमार आसपास की मंडियों में मजदूरी करते हैं। श्रवण कुमार बताते हैं, लॉकडाउन में सभी काम बंद हो गए तो ऐसा लगने लगा कि बड़े संकट में फंस गए हैं। जॉब कार्ड तो था, पर काफी समय से मनरेगा में काम नहीं मिला। अचानक मई में प्रधान ने मनरेगा का काम शुरू होने की सूचना दी तो खुशी का ठिकाना न रहा। इसी गांव के संतोष कुमार एक फैक्टरी में काम करते थे। वहां 7-8 हजार रुपये महीने कमा लेते थे। लॉकडाउन केकारण यह कमाई एकदम बंद हो गई, तो उन्होंने भी मनरेगा में काम शुरू कर दिया है।
अब चलने लगा है धंधा
फतेहपुर के ब्लॉक तिलियानी के गांव जमालपुर निवासी बुद्धराज पेशे से राजमिस्त्री हैं। बुद्धराज बताते हैं कि ग्राम प्रधान से बात करके उन्होंने भी मनरेगा में काम करने की योजना बनाई थी। लेकिन, अब धीरे-धीरे हालात सुधरने लगे हैं। एक-दो जगह काम भी मिलने लगा है। राज मिस्त्री के काम में मनरेगा से दोगुनी मजदूरी मिलती है, इसलिए वहीं काम करने का फैसला किया है। बुद्धराज कहते हैं, मेरी जगह मनरेगा में कोई और जरूरतमंद काम कर लेगा।
काफी कम हुईं दुश्वारियां
फैजाबाद की तहसील रुदौली के गांव रहीमगंज के जॉब कार्डधारक सुरेश कुमार बताते हैं कि पूरे मई में सड़क पर मिट्टी डालने का काम मिल गया। इससे लॉकडाउन से पैदा हुई दुश्वारियां काफी हद तक कम हो गईं। यहीं के इंटर तक पढ़े विनोद कुमार के पास दो बीघा जमीन है। विनोद बताते हैं कि बेमौसम बारिश व ओलावृष्टि से उनकी गेहूं की फसल को काफी नुकसान पहुंचा। इधर, कई साल से मनरेगा में कोई खास काम नहीं मिल पा रहा था। मई में उन्होंने पूरे 20 दिन मनरेगा के तहत काम किया है।
...तो सूदखोरों के चंगुल में फंस जाते
रायबरेली की ग्राम पंचायत तौधकपुर के युवक शिवम लॉकडाउन से पहले हमीरपुर में काम करते थे। उन्होंने वहां से घर तक का सफर कहीं किसी वाहन से लिफ्ट मांगकर, तो कहीं पैदल ही रास्ता नापकर पूरा किया। उन्हें ग्राम प्रधान कार्तिकेय शंकर वाजपेयी ने मनरेगा के तहत काम देने के लिए कह दिया है। क्वारंटीन का समय भी पूरा हो चुका है। शिवम बताते हैं कि वे अब गांव में ही मनरेगा में काम करेंगे। कोई न कोई ट्रेनिंग लेने का प्रयास करेंगे, ताकि आसपास ही घर चलाने लायक कमा सकें। यहीं की ज्योति देवी खुश होकर बताती हैं कि मई में पूरे 20 दिन काम मिला है।
प्रधान ने बताया है कि जल्दी ही खाते में मजदूरी के रुपये भी आ जाएंगे। उन्नाव के गांव ऊंचगांव के किसान विमलेश और राम सजीवन कहते हैं कि लॉकडाउन के कारण कहीं काम नहीं मिल पा रहा है। थोड़ी सी जमीन में सब्जी की, पर घाटा हुआ। अब मनरेगा में काम कर रहे हैं। शाहजहांपुर के गांव हरदुआ के सीमांत किसान छत्रपाल कहते हैं कि लॉकडाउन के इस खराब दौर में अगर मनरेगा का काम शुरू न करवाया गया होता तो गांवों में लोग सूदखोरों के चंगुल में फंस गए होते। कभी उनका कर्ज ही नहीं उतर पाता।
ऐसी भी स्थिति... काम चाहते हैं, पर जॉब कार्ड नहीं
गोंडा की तहसील तरबगंज के गांव दुर्जनपुर घाट में मुंबई से आए कई मजदूर ऐसे हैं, जो मनरेगा में काम करना चाहते हैं, पर उनके पास जॉब कार्ड ही नहीं है। ये मजदूर बताते हैं कि वे मुंबई में घर-घर कैन से पानी पहुंचाने का काम करते थे। लॉकडाउन के कारण अपने गांव वापस आना पड़ा। इन्हीं में से एक मो. सलमान शाह कहते हैं कि क्वारंटीन के 14 दिन कभी के पूरे कर लिए हैं। कोई बताने वाला नहीं है कि मनरेगा का काम कैसे मिलेगा। मो. कलीम तीन महीने पहले एक शादी के कारण मुंबई से गांव लौटे थे। बकौल, कलीम उन्हें अभी तक न तो एक दिन मनरेगा में काम मिला है और न ही किसी अन्य तरह की कोई सुविधा। सिराज अहमद, मो. अफजल और नुरुल ने भी कमोबेश इसी तरह के हालात बयां किए।
तस्वीर का एक दूसरा पहलू यह भी...
प्रवासी श्रमिकों में कई ऐसे हैं जो स्किल्ड हैं। धूप में काम करने के आदी नहीं हैं। बेरोजगारी का दंश तो है, मगर दूसरी तरफ मनरेगा में काम करने के लिए वे शारीरिक और मानसिक तौर पर तैयार नहीं हैं। मनरेगा के तहत किए जाने वाले काम शारीरिक मेहनत के हैं, जो उन्होंने किए नहीं। ऐसे में वे मनरेगा में काम करने के लिए मन से तैयार नहीं हो पा रहे। लखनऊ के इलाकों के हाल:
काम कर भी लें तो गुजारा कैसे होगा?
मलिहाबाद इलाके के बिराहिमपुर के रवि कुमार चंडीगढ़ में फिल्म यूनिट की एसी बस चलाते थे। बीस हजार रुपये तनख्वाह मिल जाती। पर, अब गांव में मनरेगा में मजदूरी कर रहे हैं। कहते हैं दो सौ रुपये में काम करना पड़ रहा है। मन नहीं लग रहा। कुछ ऐसा ही दर्द मवई फत्तेपुर निवासी छत्रपाल का भी है। छत्रपाल 15 साल पहले गुजरात गए। वहां कंस्ट्रक्शन कंपनी में सेफ्टी ऑफिसर बन गए। बताते हैं कि 31,150 रुपये हर महीने मिल जाते थे। पर अब? गांव आकर बेरोजगार हैं। कहते हैं- मनरेगा में तो मुझसे काम नहीं हो पाएगा। कर भी लें तो क्या उससे गुजारा हो पाएगा? गांवों ऐसे सवाल हर जगह हैं।
मलिहाबाद विकास खंड की 67 ग्राम पंचायतों में मनरेगा के तहत काम कराए जा रहे हैं। मनरेगा के अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी अनुरुद्ध केलकर बताते हैं चार हजार मजदूर काम कर रहे हैं। निगरानी समिति की रिपोर्ट के मुताबिक 1267 मजदूरों की अन्य प्रदेशों से घर वापसी हुई है। पर, इनमें से महज 400 ही मनरेगा में काम के लिए आए।
जॉब कार्ड ही नहीं बना तो काम कैसे मिले
मोहनलालगंज इलाके के भावा खेड़ा के नीरज, इंद्रकुमार व जितेंद्र बताते हैं कि वे मुंबई में शटरिंग का काम करते थे। गांव लौटने पर उनके लिए कोई काम नहीं है। गांव से बाहर अभी जा नहीं सकते हैं और मनरेगा के लिए अब तक जॉब कार्ड नहीं बन सका। गांव में दूसरा कोई भी काम नहीं मिल पा रहा। ऐसे में गुजारा कैसे हो? यही समस्या जबरौली के ललित कश्यप, आशीष, लक्ष्मण की भी है। ये सभी मुंबई में कारखाने में काम करते थे। कहते हैं, इलाके में कोई कारखाना तो है नहीं जहां काम कर सकें। मनरेगा में काम कर पेट भरना चाहें तो अब तक जॉब कार्ड ही नहीं बन पाया। मोहनलालगंज में 190 लोग अन्य प्रदेशों से आए हैं। इनमें से 95 लोगों का ही जॉब कार्ड बना है।
छांव में काम करते थे, धूप सही नहीं जाती
निगोहां इलाके के हरिहरपुर पटसा में दिल्ली से आए कौशल, सतीश और जीतू मिले। बताते हैं कि दिल्ली में फैक्टरी के अंदर ठंडे में काम करते थे। शरीर उसी की अभ्यस्त हो गई। यहां मनरेगा में धूप में काम करने पर तो जान पर बन आती है। मनरेगा में 203 रुपये दिहाड़ी मिलती है, वह भी हफ्तेवार मिल जाए तो गनीमत। ऐसे में खर्च चले तो कैसे? दिल्ली में 10 हजार या इससे अधिक प्रतिमाह की पगार मिलती थी, यहां ऐसा कुछ भी नहीं है।
अभी तो ज्यादातर क्वारंटीन ही हैं
बख्शी का तालाब ब्लॉक की 103 ग्राम पंचायतों में 31 मई की शाम तक 672 लोग बाहर से आए हैं। इनमें से अब तक महज 120 लोगों को मनरेगा के तहत काम मिला है। खंड विकास अधिकारी अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि जो लोग बाहर से आए हैं अभी उनमें से ज्यादातर क्वारंटीन हैं। क्वारंटीन पूरा होने के बाद अगर वे मनरेगा में काम करना चाहते हैं तो उनको काम दिलाया जाएगा।