लखनऊ के युवक ने सुनाया फ्रांस के नीस में आतंकी हमले का मंजर
'सोचा भी नहीं था... बास्टील डे पर फ्रांस के नीस में जश्न मनाने, आतिशबाजी और परेड का हिस्सा बनने के लिए आए लोग लाशों के ढेर बन जाएंगे। एक खिलखिलाते शहर में एकाएक आतंक का ऐसा मंजर छा जाएगा कि सब कुछ छीन जाएगा। उस वक्त मैं एक एनआरआई दोस्त के साथ वहीं पर था।
शाम सात बजे के करीब परेड शुरू हो चुकी थी। सारा शहर खिलखिला रहा था और राष्ट्रीय गौरव का जश्न मना रहा था। इस बीच हमें भूख लगी तो हम पास ही स्थित हार्ड रॉक रेस्त्रां में पहुंचे और अपने दिए ऑडर्र का इंतजार करने लगे। इस बीच बाहर रोड पर आतिशबाजी शुरू हो गई थी। उसे देखने हम बाहर निकल आए।
रात नौ से साढ़े नौ बजे का वक्त था। आतिशबाजी देख हम वापस रेस्त्रां आए। महज पांच से सात मिनट के भीतर अचानक से भगदड़ मच गई और चारों तरफ शोर होने लगा। भीड़ का रेला दहशत और खौफ से भरा रेस्त्रां में घुसता चला आया।
बाहर गोलियों की तड़तड़ाहट साफ सुनाई दे रही थी। हर कोई सहमा था। गोलियां चलते ही लोग चिल्ला उठते। बच्चे रो रहे थे। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हो क्या रहा है। सारे घटनाक्रम से हम महज 50 मीटर दूर थे।
जेहन में थीं पेरिस हमले की यादें
कुछ देर बाद जब हम कुछ समझने की स्थिति में हुए तो अफरातफरी और घबराई भीड़ के साथ खुद को रेस्त्रां के बाथरूम में पाया। बच्चे व कमजोर लोगों का दम घुटने लगा। बहुत से बच्चे रो रहे थे। अब तक इतना समझ आ चुका था कि कोई आतंकी हमला हुआ है और लोग मारे जा रहे हैं। जेहन में पिछले वर्ष नवंबर में हुए पेरिस हमले की यादें ताजा थीं।
कूड़ेदान में छिपकर लोगों ने खुद को बचाया
हम किसी तरह भीड़ से बाहर निकलना चाहते थे। इस कोशिश में पार्किंग स्थल तक पहुंचे। वहां बहुत से लोग कारों के पीछे या उसके नीचे छिपे थे। सड़कों के किनारे कूड़ा डालने के लिए डिब्बे लगे थे। वे इतने बड़े थे कि एक साथ पांच से छह लोग उसमें छिप सकते थे, लोगों ने खुद को डस्टबिन में छिपा लिया था।
बचते-बचाते हम किसी तरह पास के एक होटल में पहुंचे। वहां कई लोग छिपे थे, हमने भी वहां शरण ली। बहुत से लोग भीड़ में कुचल जाने से घायल थे। एक अमेरिकी महिला दर्द से कराह रही थी। इस बीच कुछ और लोग शरण के लिए होटल में आए। उनमें एक मां और बेटी उसी हत्यारी ट्रक के नीचे आ गए थे, मां चोटिल थी, बच्ची सुरक्षित थी।
हम घंटे भर वहां रुके रहे और शांति होने का इंतजार करते रहे। जब माहौल शांत होने लगा तो हम बाहर निकलने लगे। रास्ते चारों ओर से बंद थे। हर तरफ पुलिस, रोते बिलखते परिवारीजन, घायल लोग और लाशें दिख रही थीं। एक पुलिस अधिकारी से हमने मदद मांगी। उसने हमें अपनी टैक्सी उपलब्ध करवाई और सोफिया एंटपोलिस पहुंचने में मदद की।
(लखनऊ की केकेसी कॉलोनी में रहने वाले सौरभ ने फ्रांस से एमबीए किया है और इन दिनों वह सोफिया एंटपोलिस में इंटर्नशिप कर रहे हैं। यह जगह नीस से करीब 25 किलोमीटर दूर है।)