टेक्नोलॉजी का अधिक इस्तेमाल आपके बच्चों को समय से पहले कर रहा जवान
18 साल की उम्र से पहले फोन का अधिक इस्तेमाल दिमाग के विकास को प्रभावित कर सकता है। क्योंकि 18 साल तक की उम्र ब्रेन डेवलपमेंट का क्रिटिकल पीरियड होता है।
इस उम्र तक ही ब्रेन का विकास होता रहता है। इसमें टेक्नोलॉजी के अधिक इस्तेमाल से ब्रेन के विकास पर बुरा असर पड़ता है। टेक्नोलॉजी के अधिक इस्तेमाल के कारण शरीर में मौजूद कुछ हार्मोंस में तेजी से बदलाव होने लगते हैं, जिसके कारण किशोर किशोरियां समय से पहले ही मेच्योर हो जाते हैं।
यही वजह है कि पहले के मुकाबले आजकल 11 साल ही उम्र में यह रिप्रोडक्टिव एज तक पहुंच रहे हैं। जबकि मानसिक विकास अपनी उम्र से ही होता है। यह जानकारी बैंगलोर के प्रो. बीएस शंकर नारायण राव ने शनिवार को केजीएमयू के फिजियोलॉजी विभाग के 107वें स्थापना दिवस के मौके पर आयोजित प्रो. आरसी शुक्ला ब्याख्यान में दी।
उन्होंने बताया कि ऐसी स्थिति से बचाव के लिए जरूरी है कि 18 साल की उम्र तक बच्चों को गैजेट्स से पूरी तरह से दूर रखा जाए। खासकर आठ साल तक के बच्चों को मोबाइल का इस्तेमाल कतई न करने दें, ताकि उनका ब्रेन ठीक तरह से डवलप हो सके।
प्रो. बीएस शंकर नारायण राव ने बताया कि ब्रेन डिस्ऑर्डर की समस्या आजकल आम हो गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह तनाव है। अगर अधिक समय तक तनाव रहे तो यह कुछ समय बाद ब्रेन डिस्ऑर्डर का रूप ले लेता है।
मानसिक समस्याओं में वातावरण की खास भूमिका
आसपास के माहौल का मानसिक जीवन पर बड़ा असर है। डॉ. राव ने बताया कि अलग-अलग वातावरण में जो भी जानकारी होती है वो हमारे दिमाग में स्टोर हो जाती है। उसके बाद जो भी आगे की जानकारी मिलती है उसके अनुसार हमारा दिमाग पुरानी जानकारी को बदलता रहता है।
दिमाग में केमिकल रिलीज होते रहते हैं। ब्रेन में मौजूद डोपोमिन नाम का केमिकल अधिक डिक्रीज होने से शरीर पैरालाइज्ड भी हो सकता है। दिमाग में केमिकल बढ़ जाता तो व्यक्ति उत्तेजित होने लगता है और उसका मानसिक संतुलन खो जाता है।
फिजियोलॉजी विभाग की एचओडी प्रो. सुनीता तिवारी ने बताया कि अगर हर रोज कुछ देर खुली हवा में टहला जाए तो काफी हद तक स्ट्रेस से निजात मिल सकती है। खुली हवा में टहलने से एंडारफिंस नाक का केमिकल रिलीज होता है, जो सकारात्मक सोच पैदा करता है।