{"_id":"60ff1aa38ebc3e85955a88f8","slug":"emergency-treatment-is-not-available-in-lohiya-institute-lucknow-news-lko588629421","type":"story","status":"publish","title_hn":"लोहिया संस्थान : बेहतरीन डॉक्टर, उपकरण पर इमरजेंसी में नहीं मिलता इलाज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लोहिया संस्थान : बेहतरीन डॉक्टर, उपकरण पर इमरजेंसी में नहीं मिलता इलाज
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बड़ा नाम। बेहतरीन डॉक्टर...। बेहतर संसाधन...। प्रदेश के बड़े चिकित्सा संस्थानों में शुमार लोहिया संस्थान की ये तस्वीरें मरीज को तसल्ली देती हैं। पर, इतने बड़े संस्थान की इमरजेंसी का बुरा हाल है।
इमरजेंसी में आने वाले हार्ट के मरीजों की जान बचाने के लिए जब गोल्डन ऑवर होता है, यहां इलाज नहीं मिलता। सिर्फ रेफर किए जाने का लेटर मिलता है।
सिर में चोट लगी हो तो भी यहां से मरीज को रेफर कर दिया जाता है। जबकि न्यूरो सर्जरी में यहां भारी-भरकम टीम है तो हार्ट के भी बेहतरीन चिकित्सकों की टीम है।
संस्थान की इमरजेंसी में करीब 45 बेड हैं। सुबह से शाम तक औसतन रोजाना 100 मरीज पहुंचते हैं। व्यवस्था है कि इमरजेंसी से मरीज की हालत में सुधार होने पर उसे वार्ड में शिफ्ट किया जाए और नए मरीजों को भर्ती किया जाए।
विज्ञापन
पर, यहां बेड फुल होते ही दूसरे मरीजों को लौटाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। शाम चार बजे के बाद संकाय सदस्य परिसर से चले जाते हैं। इसके बाद इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर और रेजीडेंट डॉक्टर मरीजों को लौटाने पर ही जोर देते हैं।
संस्थान प्रशासन का दावा है कि हार्ट अटैक का मरीज आने पर संबंधित विभाग के डॉक्टर को बुलाने की व्यवस्था बनाई गई है। पर हकीकत यह है कि हार्ट अटैक का मरीज देखते ही इमरजेंसी के डॉक्टर उसे तत्काल रेफर कर देते हैं।
यही स्थिति गैस्ट्रोलॉजी, गैस्ट्रो सर्जरी, नेफ्रोलॉजी विभागों का भी है। दुर्घटना में जख्मी होने के बाद आने वाले मरीजों को यह कह कर लौटा दिया जाता है कि यहां न्यूरो सर्जरी की इमरजेंसी नहीं चलती है। आर्थो के मरीज को भी इमरजेंसी के बजाय अगले दिन ओपीडी में आने की सलाह दी जाती है।
न्यूरो साइंस सेंटर खोलने की तैयारी...पर इमरजेंसी में इलाज नहीं
संस्थान में न्यूरो सर्जरी विभाग में चार संकाय सदस्य हैं। इसी तरह करीब छह रेजीडेंट डॉक्टर हैं। इसके बाद भी इमरजेंसी वाले मरीजों का इलाज नहीं होता है। ये सिर्फ ओपीडी चलाते हैं। यह स्थिति तब है, जब संस्थान में न्यूरो साइंस सेंटर खोलने की तैयारी की गई है। इसके लिए बजट भी आवंटित कर दिया गया है।
जाएं तो जाएं कहां....
केजीएमयू का न्यूरो सर्जरी विभाग ओवरलोड
केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में बने न्यूरो सर्जरी विभाग काफी समय से ओवरलोड है। 56 बेड के वार्ड में करीब 70 से अधिक मरीज भर्ती हैं। यहां लोहिया संस्थान, सरकारी अस्पताल व अन्य जनपदों से रोज करीब आठ से दस मरीज पहुंच रहे हैं। इसमें कई मरीजों की इमरजेंसी सर्जरी तक करनी पड़ रही है। केजीएमयू प्रशासन का कहना है कि सिर में लगी गंभीर चोट के मरीजों की भर्ती किसी भी संस्थान में नहीं हो रही है। ऐसे में सभी संस्थानों का लोड केजीएमयू पर बढ़ रहा है।
कोविड अस्पताल बन गया है एपेक्स ट्रॉमा सेंटर
एसजीपीजीआई का एपेक्स ट्रॉमा सेंटर को कोविड अस्पताल में तब्दील कर दिया गया है। ऐसे में यहां आने वाले गंभीर मरीजों को इमरजेंसी के जरिए भर्ती किया जाता है। लेकिन दुर्घटनाग्रस्त मरीजों को ट्रॉमा सेंटर नहीं चलने का हवाला देकर लौटा दिया जाता है। ऐसे में हादसे का शिकार होने वाले मरीजों को उपचार नहीं मिल पाता है।
किसी भी सरकारी अस्पताल में इलाज की सुविधा नहीं
न्यूरो सर्जन नहीं होने से सिविल, लोकबंधु, रानी लक्ष्मीबाई समेत किसी भी सरकारी अस्पताल में हेड इंजरी के मरीजों के इलाज के इंतजाम नहीं हैं। बलरामपुर अस्पताल में एक न्यूरो सर्जन तैनात हैं, पर ओटी व संसाधन कम होने से इमरजेंसी सर्जरी संभव नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि पूरे प्रदेशभर के सरकारी अस्पतालों में एक ही न्यूरो सर्जन हैं।
दावे हैं...दावों का क्या
इमरजेंसी की व्यवस्था सुधारने का वादा भी रस्मी हो गया
लोहिया संस्थान में कार्यभार ग्रहण करने के बाद हर निदेशक का यही दावा होता है कि इमरजेंसी की व्यवस्थाएं सुधारेंगे। लेकिन समय से साथ वे इमरजेंसी को भूल जाते हैं। यानी वादा एक रस्म जैसा हो गया। इमरजेंसी का ये हाल तब है जब यहां की अव्यवस्था कई अफसरों की कुर्सी भी ले चुकी है। पिछले साल जून में मुख्यमंत्री के निरीक्षण के दौरान मिली गड़बड़ी का नतीजा रहा कि निदेशक पर गाज गिरी।
वादे पूरे न होने का दर्द भुगत रहे मरीज
मरीज की जान बचाने का जब गोल्डन ऑवर होता है, उसे टरकाया जाना, संसाधनों के होने के बावजूद उसका दर्द और बढ़ा देता है। हार्ट संबंधी आकस्मिक समस्या को लेकर बहराइच की जोहरा (50) के परिवारीजन सोमवार दोपहर लोहिया संस्थान तो इस उम्मीद में पहुंचे कि उन्हें बेहतर इलाज मिलेगा। पर, यहां मरीज को देखते ही दूसरे सेंटर ले जाने को कहा गया। पूछने पर बेड खाली नहीं होने का हवाला देकर रेफर लेटर बना दिया गया। दोपहर से रात हो गई ऑक्सीजन सपोर्ट पर पड़ीं जोहरा को इलाज नहीं मिल सका। बाराबंकी के इब्राहिमपुर की रामलली (55) की पीड़ा भी कम नहीं। फालिज की शिकार रामलली को जूनियर डॉक्टरों ने केजीएमयू भेज दिया। उनके परिवारीजन भी रात तक एक संस्थान से दूसरे संस्थान चक्कर लगाते रहे। यह केवल सोमवार का ही मामला नहीं। पिछले हफ्ते बुधवार को गोमतीनगर के अधीश पांडेय के सिर में एक हादसे में कांच के टुकड़े घुस गए। पर, इमरजेंसी में प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें लौटा दिया गया।
गेट पर रहता है दलालों का डेरा
लोहिया संस्थान में सुबह जाएं या शाम को। यहां दलालों का डेरा रहता है। वे गंभीर मरीज देखते ही निजी अस्पाल ले जाने की सलाह देते हैं। जब इमरजेंसी से मरीज लौटाया जाता है तो वे उसे घेर लेते हैं। इसमें गेट पर मौजूद रहने वाले गार्ड और पार्किंग कर्मी भी शामिल होते हैं। वह भी इमरजेंसी में बेड नहीं होने की बात कहकर निजी अस्पताल ले जाने की सलाह देते हैं।
संस्थान के पास न्यूरो सर्जरी विभाग के महज 25 बेड हैं, जो हमेशा फुल रहते हैं। ऐेसे में सिर में लगी गंभीर चोट के केेसेज को लेना रात के वक्त आसान नहीं होता है। विभाग में बेड बढ़ाए जाने की तैयारी चल रही है।
- डॉ. श्रीकेश सिंह, प्रवक्ता लोहिया संस्थान
केजीएमयू पर मरीजों का बहुत अधिक लोड है। यहां आने वाले हर मरीज को प्राथमिकता से इलाज मुहैया कराए जाने की कोशिश की जाती है। मरीजों के अनुपात में ट्रॉमा में बेड की कमी है। सभी संस्थान पूरी क्षमता से मरीज लेना शुरू करें तो बेड की मारामारी नहीं होगी।
- डॉ. संदीप तिवारी, ट्रॉॅमा सीएमएस
लोहिया संस्थान की इमरजेंसी में मरीज की मौत
चिनहट के सरांय निवासी रवि तिवारी ने बताया कि पिता विजय तिवारी (55) को सोमवार दोपहर सांस लेने में तकलीफ हुई तो कार से उन्हें नजदीकी अस्पताल ले गए, जहां से लोहिया संस्थान रेफर कर दिया गया। रास्ते में कार अचानक खराब हो गई तो सरकारी एंबुलेंस सेवा पर कॉल किया, मगर वह नहीं मिली। हालत बिगड़ती देख पिता को ई-रिक्शा में बैठाकर दोपहर करीब एक बजे इमरजेंसी पहुंचे। जहां पहले जूनियर डॉक्टर इधर-उधर दौड़ाते रहे। इस बीच मरीज की सांसें उखड़ने लगीं तो बेटे ने विरोध जताया। तब तक करीब आधा घंटा बीत चुका था। डॉक्टर ने इंजेक्शन लगवाने संग ऑक्सीजन मास्क लगाया, पर मरीज की जान नहीं बचाई जा सकी। आरोप है कि इलाज देरी से शुरू होने के चलते मरीज की मौत हो गई।
जांच के इंतजार में उखड़ गईं सांसें
लोहिया संस्थान की ओपीडी में सोमवार को रूटीन इलाज के लिए पहुंचे मरीज की इंतजार में जान चली गई। बाराबंकी के रामकुमार शुक्ला (50) दूरसंचार विभाग में कार्यरत थे। उनका संस्थान से इलाज चल रहा था। सुबह करीब नौ बजे वह इलाज के लिए पहुंचे थे। ओपीडी में डॉक्टर को दिखाने बाद जांच के लिए कतार में लगे थे। इस बीच मरीज गश खाकर गिर गया। तीमारदार मरीज को अस्पताल ब्लॉक में बनी इमरजेंसी में ले गए, जहां डॉक्टरों ने मरीज को मृत घोषित कर दिया। आरोप था कि मरीज के गिरने के बाद स्टाफ ने मदद नहीं की।
तीमारदारों के आरोप बेबुनियाद
तीमारदारों के आरोप बेबुनियाद हैं। इमरजेंसी में आने वाले सभी मरीजों को प्राथमिकता से डॉक्टर देखते हैं। तीमारदार शिकायत करें तो मामले की जांच कराई जाएगी।
- डॉ. श्रीकेश सिंह, प्रवक्ता, लोहिया संस्थान
विज्ञापन
इमरजेंसी में आने वाले हार्ट के मरीजों की जान बचाने के लिए जब गोल्डन ऑवर होता है, यहां इलाज नहीं मिलता। सिर्फ रेफर किए जाने का लेटर मिलता है।
सिर में चोट लगी हो तो भी यहां से मरीज को रेफर कर दिया जाता है। जबकि न्यूरो सर्जरी में यहां भारी-भरकम टीम है तो हार्ट के भी बेहतरीन चिकित्सकों की टीम है।
विज्ञापन
संस्थान की इमरजेंसी में करीब 45 बेड हैं। सुबह से शाम तक औसतन रोजाना 100 मरीज पहुंचते हैं। व्यवस्था है कि इमरजेंसी से मरीज की हालत में सुधार होने पर उसे वार्ड में शिफ्ट किया जाए और नए मरीजों को भर्ती किया जाए।
विज्ञापन
पर, यहां बेड फुल होते ही दूसरे मरीजों को लौटाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। शाम चार बजे के बाद संकाय सदस्य परिसर से चले जाते हैं। इसके बाद इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर और रेजीडेंट डॉक्टर मरीजों को लौटाने पर ही जोर देते हैं।
संस्थान प्रशासन का दावा है कि हार्ट अटैक का मरीज आने पर संबंधित विभाग के डॉक्टर को बुलाने की व्यवस्था बनाई गई है। पर हकीकत यह है कि हार्ट अटैक का मरीज देखते ही इमरजेंसी के डॉक्टर उसे तत्काल रेफर कर देते हैं।
यही स्थिति गैस्ट्रोलॉजी, गैस्ट्रो सर्जरी, नेफ्रोलॉजी विभागों का भी है। दुर्घटना में जख्मी होने के बाद आने वाले मरीजों को यह कह कर लौटा दिया जाता है कि यहां न्यूरो सर्जरी की इमरजेंसी नहीं चलती है। आर्थो के मरीज को भी इमरजेंसी के बजाय अगले दिन ओपीडी में आने की सलाह दी जाती है।
न्यूरो साइंस सेंटर खोलने की तैयारी...पर इमरजेंसी में इलाज नहीं
संस्थान में न्यूरो सर्जरी विभाग में चार संकाय सदस्य हैं। इसी तरह करीब छह रेजीडेंट डॉक्टर हैं। इसके बाद भी इमरजेंसी वाले मरीजों का इलाज नहीं होता है। ये सिर्फ ओपीडी चलाते हैं। यह स्थिति तब है, जब संस्थान में न्यूरो साइंस सेंटर खोलने की तैयारी की गई है। इसके लिए बजट भी आवंटित कर दिया गया है।
जाएं तो जाएं कहां....
केजीएमयू का न्यूरो सर्जरी विभाग ओवरलोड
केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में बने न्यूरो सर्जरी विभाग काफी समय से ओवरलोड है। 56 बेड के वार्ड में करीब 70 से अधिक मरीज भर्ती हैं। यहां लोहिया संस्थान, सरकारी अस्पताल व अन्य जनपदों से रोज करीब आठ से दस मरीज पहुंच रहे हैं। इसमें कई मरीजों की इमरजेंसी सर्जरी तक करनी पड़ रही है। केजीएमयू प्रशासन का कहना है कि सिर में लगी गंभीर चोट के मरीजों की भर्ती किसी भी संस्थान में नहीं हो रही है। ऐसे में सभी संस्थानों का लोड केजीएमयू पर बढ़ रहा है।
कोविड अस्पताल बन गया है एपेक्स ट्रॉमा सेंटर
एसजीपीजीआई का एपेक्स ट्रॉमा सेंटर को कोविड अस्पताल में तब्दील कर दिया गया है। ऐसे में यहां आने वाले गंभीर मरीजों को इमरजेंसी के जरिए भर्ती किया जाता है। लेकिन दुर्घटनाग्रस्त मरीजों को ट्रॉमा सेंटर नहीं चलने का हवाला देकर लौटा दिया जाता है। ऐसे में हादसे का शिकार होने वाले मरीजों को उपचार नहीं मिल पाता है।
किसी भी सरकारी अस्पताल में इलाज की सुविधा नहीं
न्यूरो सर्जन नहीं होने से सिविल, लोकबंधु, रानी लक्ष्मीबाई समेत किसी भी सरकारी अस्पताल में हेड इंजरी के मरीजों के इलाज के इंतजाम नहीं हैं। बलरामपुर अस्पताल में एक न्यूरो सर्जन तैनात हैं, पर ओटी व संसाधन कम होने से इमरजेंसी सर्जरी संभव नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि पूरे प्रदेशभर के सरकारी अस्पतालों में एक ही न्यूरो सर्जन हैं।
दावे हैं...दावों का क्या
इमरजेंसी की व्यवस्था सुधारने का वादा भी रस्मी हो गया
लोहिया संस्थान में कार्यभार ग्रहण करने के बाद हर निदेशक का यही दावा होता है कि इमरजेंसी की व्यवस्थाएं सुधारेंगे। लेकिन समय से साथ वे इमरजेंसी को भूल जाते हैं। यानी वादा एक रस्म जैसा हो गया। इमरजेंसी का ये हाल तब है जब यहां की अव्यवस्था कई अफसरों की कुर्सी भी ले चुकी है। पिछले साल जून में मुख्यमंत्री के निरीक्षण के दौरान मिली गड़बड़ी का नतीजा रहा कि निदेशक पर गाज गिरी।
वादे पूरे न होने का दर्द भुगत रहे मरीज
मरीज की जान बचाने का जब गोल्डन ऑवर होता है, उसे टरकाया जाना, संसाधनों के होने के बावजूद उसका दर्द और बढ़ा देता है। हार्ट संबंधी आकस्मिक समस्या को लेकर बहराइच की जोहरा (50) के परिवारीजन सोमवार दोपहर लोहिया संस्थान तो इस उम्मीद में पहुंचे कि उन्हें बेहतर इलाज मिलेगा। पर, यहां मरीज को देखते ही दूसरे सेंटर ले जाने को कहा गया। पूछने पर बेड खाली नहीं होने का हवाला देकर रेफर लेटर बना दिया गया। दोपहर से रात हो गई ऑक्सीजन सपोर्ट पर पड़ीं जोहरा को इलाज नहीं मिल सका। बाराबंकी के इब्राहिमपुर की रामलली (55) की पीड़ा भी कम नहीं। फालिज की शिकार रामलली को जूनियर डॉक्टरों ने केजीएमयू भेज दिया। उनके परिवारीजन भी रात तक एक संस्थान से दूसरे संस्थान चक्कर लगाते रहे। यह केवल सोमवार का ही मामला नहीं। पिछले हफ्ते बुधवार को गोमतीनगर के अधीश पांडेय के सिर में एक हादसे में कांच के टुकड़े घुस गए। पर, इमरजेंसी में प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें लौटा दिया गया।
गेट पर रहता है दलालों का डेरा
लोहिया संस्थान में सुबह जाएं या शाम को। यहां दलालों का डेरा रहता है। वे गंभीर मरीज देखते ही निजी अस्पाल ले जाने की सलाह देते हैं। जब इमरजेंसी से मरीज लौटाया जाता है तो वे उसे घेर लेते हैं। इसमें गेट पर मौजूद रहने वाले गार्ड और पार्किंग कर्मी भी शामिल होते हैं। वह भी इमरजेंसी में बेड नहीं होने की बात कहकर निजी अस्पताल ले जाने की सलाह देते हैं।
संस्थान के पास न्यूरो सर्जरी विभाग के महज 25 बेड हैं, जो हमेशा फुल रहते हैं। ऐेसे में सिर में लगी गंभीर चोट के केेसेज को लेना रात के वक्त आसान नहीं होता है। विभाग में बेड बढ़ाए जाने की तैयारी चल रही है।
- डॉ. श्रीकेश सिंह, प्रवक्ता लोहिया संस्थान
केजीएमयू पर मरीजों का बहुत अधिक लोड है। यहां आने वाले हर मरीज को प्राथमिकता से इलाज मुहैया कराए जाने की कोशिश की जाती है। मरीजों के अनुपात में ट्रॉमा में बेड की कमी है। सभी संस्थान पूरी क्षमता से मरीज लेना शुरू करें तो बेड की मारामारी नहीं होगी।
- डॉ. संदीप तिवारी, ट्रॉॅमा सीएमएस
लोहिया संस्थान की इमरजेंसी में मरीज की मौत
चिनहट के सरांय निवासी रवि तिवारी ने बताया कि पिता विजय तिवारी (55) को सोमवार दोपहर सांस लेने में तकलीफ हुई तो कार से उन्हें नजदीकी अस्पताल ले गए, जहां से लोहिया संस्थान रेफर कर दिया गया। रास्ते में कार अचानक खराब हो गई तो सरकारी एंबुलेंस सेवा पर कॉल किया, मगर वह नहीं मिली। हालत बिगड़ती देख पिता को ई-रिक्शा में बैठाकर दोपहर करीब एक बजे इमरजेंसी पहुंचे। जहां पहले जूनियर डॉक्टर इधर-उधर दौड़ाते रहे। इस बीच मरीज की सांसें उखड़ने लगीं तो बेटे ने विरोध जताया। तब तक करीब आधा घंटा बीत चुका था। डॉक्टर ने इंजेक्शन लगवाने संग ऑक्सीजन मास्क लगाया, पर मरीज की जान नहीं बचाई जा सकी। आरोप है कि इलाज देरी से शुरू होने के चलते मरीज की मौत हो गई।
जांच के इंतजार में उखड़ गईं सांसें
लोहिया संस्थान की ओपीडी में सोमवार को रूटीन इलाज के लिए पहुंचे मरीज की इंतजार में जान चली गई। बाराबंकी के रामकुमार शुक्ला (50) दूरसंचार विभाग में कार्यरत थे। उनका संस्थान से इलाज चल रहा था। सुबह करीब नौ बजे वह इलाज के लिए पहुंचे थे। ओपीडी में डॉक्टर को दिखाने बाद जांच के लिए कतार में लगे थे। इस बीच मरीज गश खाकर गिर गया। तीमारदार मरीज को अस्पताल ब्लॉक में बनी इमरजेंसी में ले गए, जहां डॉक्टरों ने मरीज को मृत घोषित कर दिया। आरोप था कि मरीज के गिरने के बाद स्टाफ ने मदद नहीं की।
तीमारदारों के आरोप बेबुनियाद
तीमारदारों के आरोप बेबुनियाद हैं। इमरजेंसी में आने वाले सभी मरीजों को प्राथमिकता से डॉक्टर देखते हैं। तीमारदार शिकायत करें तो मामले की जांच कराई जाएगी।
- डॉ. श्रीकेश सिंह, प्रवक्ता, लोहिया संस्थान