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कर्नाटक के नतीजों में यूपी के लिए संदेश, मजबूत होगी सपा-बसपा सहित भाजपा विरोधियों की दोस्ती!

Wed, 16 May 2018 09:48 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 16 May 2018 09:48 AM IST
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effect of karnataka assembly poll result on uttar pradesh.

उत्तर प्रदेश भले ही कर्नाटक से सैकड़ों किलोमीटर दूर हो पर, राम भक्त हनुमान की जन्मस्थली दक्षिण भारत की इस धरती के विधानसभा चुनाव के नतीजे राम की जन्मस्थली के सियासी समीकरणों पर असर डाले बिना नहीं रहेंगे। इन समीकरणों का लोकसभा चुनाव में तो असर दिखाई ही देगा लेकिन इसी महीने कैराना व नूरपुर के उपचुनाव में भी खासा प्रभाव दिख सकता है।

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बहुजन समाज पार्टी ने अभी तक कैराना और नूरपुर के उप चुनाव में तटस्थ रहने की नीति का संकेत दिया है लेकिन बदली परिस्थितियों में वह रालोद और सपा के पक्ष में खड़े होने का फैसला ले लें तो ताज्जुब नहीं होगा। कारण, गोरखपुर व फूलपुर के उप चुनाव में बसपा ने त्रिपुरा के नतीजों के बाद ही सपा के समर्थन की घोषणा की थी।
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कर्नाटक में 2013 के मुकाबले भाजपा को 64 सीटों की बढ़ोतरी और 2008 के बाद दक्षिण भारत के प्रवेशद्वार कहे जाने वाले इस राज्य में सीटों का आंकड़ा सौ से ऊपर पहुंचना तथा एससी व एसटी बहुल इलाकों में मिली सफलता उपलब्धि और राहत है। पर, कांग्रेस और जनता दल सेकुलर अगर चुनाव के पहले मिल गए होते तो परिणाम बदल सकते थे। इसी संकेत ने उत्तर प्रदेश में भाजपा की चुनौती बढ़ा दी है।

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चुनाव का फोकस मठ और मंदिरों पर केंद्रित रहा

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दरअसल, कर्नाटक में इस बार चुनाव का फोकस मठ और मंदिरों पर केंद्रित रहा। अलग-अलग जातियों को प्रभावित करने वाले मठ, मंदिरों और महंतों के यहां नेताओं ने नतमस्तक होकर जिस तरह समीकरणों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की उससे यूपी में कर्नाटक का चुनाव काफी चर्चा रहा। इसी कारण यूपी के लोगों की वहां को लेकर जिज्ञासा भी बढ़ा दी।

पिछले कई वर्षों से उत्तर प्रदेश जिस तरह जाति और धर्म की राजनीति की प्रयोगशाला बनाया गया उसके चलते भी कर्नाटक के संदेश यहां के लिए ज्यादा प्रासंगिक नजर आ रहे हैं। कर्नाटक के नतीजों के बाद अब राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों के साथ ही सभी दल उत्तर प्रदेश में भी 2019 के लिए अपनी बिसात सजाना शुरू करेंगे।

भाजपा को राहत
गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में बसपा का सपा को समर्थन तथा भाजपा की पराजय के बाद ये निष्कर्ष निकाले जाने लगे थे कि दलितों में भाजपा की पकड़ कमजोर पड़ रही है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अत्याचार निवारण अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के मद्देनजर देश भर में दलितों के संगठनों की तरफ से हुए आंदोलन के बाद मायावती भाजपा पर आक्रामक हुईं।

कहा जाने लगा कि  2014 और 2017 में भाजपा से जुड़ा दलितों का भगवा टोली की रीतनीति से मोह भंग हो गया है। पर, 18 प्रतिशत दलित आबादी वाले कर्नाटक में दलित बहुल लगभग तीन दर्जन सीटों पर भाजपा को मिली बढ़त ने भगवा टोली के रणनीतिकारों को बड़ी राहत दी है। इसको आधार बनाकर वे दलितों के भाजपा के साथ होने की बात प्रचारित कर सकते हैं।

मजबूत होगी विपक्ष की दोस्ती

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एक बात और तय है कि आने वाले दिनों में यूपी में गैर भाजपाई दलों के बीच एकजुटता बढ़ेगी। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कर्नाटक के जनता दल सेकुलर की तरह यहां सपा और बसपा भी मजबूत जातीय गोलबंदी रखते हैं वहीं, पश्चिम में राष्ट्रीय लोकदल का भी प्रभाव है।

भले ही 2014 और 2017 में रालोद को बहुत सफलता नहीं मिली लेकिन गोरखपुर और फूलपुर के उप चुनाव में सपा की जीत के बाद कैराना में उसके और सपा के बीच जिस तरह दोस्ती परवान चढ़ी है उससे साफ है कि वह भी विपक्ष के साथ खड़े होने को तैयार है।

इसी तरह बसपा को भले ही कर्नाटक में एक सीट मिली हो लेकिन विपक्ष के दूसरे दलों को यह संदेश तो मिल ही गया है कि प्रतिशत कम ही सही लेकिन बसपा की रीतिनीति के समर्थन के बीज उत्तर से दक्षिण तक मौजूद हैं।

कैराना व नूरपुर में भाजपा ने झोंकी ताकत
भाजपा ने भी कर्नाटक चुनाव के नतीजों के संदेश को शायद तेजी से समझा है। इसीलिए गोरखपुर और फूलपुर के नतीजों में मात खा चुकी भाजपा ने कैराना और नूरपुर में पूरी ताकत झोंकने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पार्टी के प्रदेश महामंत्री संगठन सुनील बंसल बुधवार को कैराना पहुंच रहे हैं। वह वहां और नूरपुर में चार दिन रुककर मंडल अध्यक्षों तक बात करेंगे। साथ ही बूथ प्रभारियों से भी मिलेंगे।

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