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Lucknow News: बाहर के मुकाबले ज्यादा घातक है घर में जमी धूल
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डॉ. अमिताभ दास शुक्ला।
लखनऊ। प्रयागराज के डॉ. अमिताभ दास शुक्ला के मुताबिक, घरों में जमी धूल बाहर के मुकाबले ज्यादा घातक है। इसलिए इससे बचने की ज्यादा जरूरत है। डॉ. अमिताभ शनिवार को केजीएमयू के अटल बिहारी वाजपेयी साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर में आयोजित एलर्जी अस्थमा की राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे।
डॉ. अमिताभ ने बताया कि घरों में परदों, कालीन, सामान पर जमी धूल लंबे समय से रहती है। इस वजह से इसके कण काफी भारी होते हैं। ये कण सांस के माध्यम से फेफड़ों में पहुंचकर अस्थमा और एलर्जी की वजह बनते हैं। वहीं, बाहर की धूल अपेक्षाकृत हल्की होती है, इसलिए यह कम नुकसान पहुंचाती है। उन्होंने कहा कि परदों और कालीन को झाड़ने से बचना चाहिए। परदों को सीधे धुलना चाहिए और कालीन को वैक्यूम क्लीनर से साफ करना चाहिए।
केजीएमयू में पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो. वेदप्रकाश के मुताबिक, शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण और बदलती जीवनशैली के कारण सांस के रोगी तेजी से बढ़ रहे हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, एलर्जी की दवाइयों में लगभग चार हजार करोड़ रुपये का खर्च सालाना आता है। अस्थमा पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ज्यादा होता है। मौके पर डॉ. सुरेश कूलवाल, डॉ. एबी सिंह, डॉ. ए.के. जनमेजा, प्रो. रूबी पवनकर उपस्थित रहे।
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डॉ. अमिताभ ने बताया कि घरों में परदों, कालीन, सामान पर जमी धूल लंबे समय से रहती है। इस वजह से इसके कण काफी भारी होते हैं। ये कण सांस के माध्यम से फेफड़ों में पहुंचकर अस्थमा और एलर्जी की वजह बनते हैं। वहीं, बाहर की धूल अपेक्षाकृत हल्की होती है, इसलिए यह कम नुकसान पहुंचाती है। उन्होंने कहा कि परदों और कालीन को झाड़ने से बचना चाहिए। परदों को सीधे धुलना चाहिए और कालीन को वैक्यूम क्लीनर से साफ करना चाहिए।
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केजीएमयू में पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो. वेदप्रकाश के मुताबिक, शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण और बदलती जीवनशैली के कारण सांस के रोगी तेजी से बढ़ रहे हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, एलर्जी की दवाइयों में लगभग चार हजार करोड़ रुपये का खर्च सालाना आता है। अस्थमा पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ज्यादा होता है। मौके पर डॉ. सुरेश कूलवाल, डॉ. एबी सिंह, डॉ. ए.के. जनमेजा, प्रो. रूबी पवनकर उपस्थित रहे।
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