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उम्र के बीच पड़ाव में घरेलू महिलाएं ज्यादा समझौतावादी

Tue, 21 Dec 2021 02:18 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 21 Dec 2021 02:18 AM IST
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Domestic women are more compromising  in the middle of age
रोली खन्ना
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मिड लाइफ यानी उम्र का वह हिस्सा जो युवावस्था व वृद्धावस्था के बीच की अवस्था है। उम्र के इस पड़ाव पर कामकाजी महिलाओं की अपेक्षा घरेलू महिलाएं कहीं ज्यादा अवसादग्रस्त होती हैं।
आर्थिक आत्मनिर्भरता न होने से उन्हें उन्हें छोटी-छोटी बातों के लिए समझौते करने पड़ते हैं। साथ ही ज्यादा अकेलापन इनके हिस्से आता है, जबकि जिम्मेदारियां पूरी करने में घरेलू महिलाएं कहीं ज्यादा आगे होती हैं।
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यह निष्कर्ष सामने आया है कि लखनऊ विश्वविद्यालय के मानसिक रोग विभाग की शोध छात्रा स्वाति रावत और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मानिनी श्रीवास्तव द्वारा किए गए अध्ययन में। शोध में 47 से 58 आयु वर्ष की महिलाओं को शामिल किया गया।
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‘द मिड लाइफ क्राइसिस-हर एक्सपीरियंस’, नामक यह शोध इंटरनेशनल जर्नल ऑफ साइंटिफिक एंड रिसर्च पब्ल्किेशन में प्रकाशित हुआ है। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि इसका उद्देश्य भारत में घरेलू व कामकाजी महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य में अंतर का पता लगाना है।
शोध के नतीजे प्रतिशत में
जीवन के प्रति नजरिया : कामकाजी महिला घरेलू महिला
अच्छा महसूस करती हैं : 50 35.71
सशक्त महसूस करती हैं : 42.86 36.84
खुली विचारधारा वाली : 33.34 21.05
समझौतावादी : 16.67 53.34
सामंजस्य बैठाने में सक्षम : 44.45 13.34
विडंबना : कई मायनों में ज्यादा पर पचास फीसदी भी नहीं
शोध के नतीजों के अनुसार, निर्णय लेने की क्षमता, आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास के मामले में कामकाजी महिलाओं व घरेलू महिलाओं में ज्यादा अंतर नहीं है। ऐसी कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत 38.89 है और घरेलू महिलाओं का प्रतिशत 33.34 है।
महत्वाकांक्षी : थोड़ा है थोड़े की जरूरत है
जीवन में संतुष्टि के स्तर की बात करें तो 57.14 फीसदी कामकाजी महिलाएं संतुष्ट तो हैं, पर 28.57 फीसदी ऐसी हैं, जिन्हें अधूरे ख्वाबों को लेकर टीस भी है। हालांकि, असंतुष्ट कोई भी नहीं। वहीं, 31.82 फीसदी घरेलू महिलाएं असंतुष्ट मिलीं, 27.27 फीसदी ने कहा कि उनकी कई इच्छाएं अधूरी रह गईं, जबकि 22.72 फीसदी ने कहा कि कई इच्छाएं पूरी न हो पाने का मलाल है। 18.19 फीसदी महिलाओं ने जीवन से असंतोष जताया है।

व्यस्त होने का जरिया ढूंढे, खुद के लिए समय निकालें
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मानिनी श्रीवास्तव कहती हैं कि 40 की अवस्था में पहुंचने से पहले ही घर में रहने वाली महिलाओं को खुद से सवाल करना चाहिए कि उन्होंने खुद को कितना वक्त दिया है। एक समय के बाद जब सारी जिम्मेदारियां वे पूरी कर लेंगी तो उनके पास क्या और कौन बचेगा। सबसे बेहतर होगा कि खुद को रचनात्मक कार्यों में लगाएं। अपने शौक को पहचानें, उसे वक्त दें। इससे तनाव और अवसाद व चिंताएं दूर रहेंगी।
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