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दिल से बड़े आकार का ट्यूमर निकाल डॉक्टरों ने सिपाही को दी नई जिंदगी
Thu, 09 May 2019 11:35 AM IST
Amulya Rastogi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Thu, 09 May 2019 11:35 AM IST
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डॉक्टरों ने दी नई जिंदगी
- फोटो : अमर उजला
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केजीएमयू डॉक्टरों ने फेफडे़ के ट्यूमर की सर्जरी कर सिपाही की जान बचा ली। ट्यूमर एक किलो का था और उसका आकार दिल से भी बड़ा था। ट्यूमर से दिल पर दबाव पड़ रहा था। इससे दिल को काम करने में दिक्कत हो रही थी।
इलाहाबाद के सुलेमपुर निवासी कांस्टेबल पवन कुमार (24) को तीन साल पहले सीने में भारीपन के साथ ही सांस लेने में दिक्कत हुई। चंद कदम चलने के बाद ही सांसें फूलने लगती थीं। कुछ दिन बाद सीने में दर्द होने लगा। हृदय रोग विशेषज्ञों को दिखाया, दवाएं भी लीं, लेकिन आराम नहीं हुआ।
हालत बिगड़ने पर अप्रैल में केजीएमयू आए तो जनरल सर्जरी विभाग के प्रो. सुरेश कुमार ने जांच की। एक्स-रे में फेफडे़ के दूसरे हिस्से में दिल के बराबर ट्यूमर नजर आया। सीटी स्कैन में ट्यूमर स्पष्ट हो गया। सर्जरी के बाद मरीज की हालत ठीक है।
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इलाहाबाद के सुलेमपुर निवासी कांस्टेबल पवन कुमार (24) को तीन साल पहले सीने में भारीपन के साथ ही सांस लेने में दिक्कत हुई। चंद कदम चलने के बाद ही सांसें फूलने लगती थीं। कुछ दिन बाद सीने में दर्द होने लगा। हृदय रोग विशेषज्ञों को दिखाया, दवाएं भी लीं, लेकिन आराम नहीं हुआ।
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हालत बिगड़ने पर अप्रैल में केजीएमयू आए तो जनरल सर्जरी विभाग के प्रो. सुरेश कुमार ने जांच की। एक्स-रे में फेफडे़ के दूसरे हिस्से में दिल के बराबर ट्यूमर नजर आया। सीटी स्कैन में ट्यूमर स्पष्ट हो गया। सर्जरी के बाद मरीज की हालत ठीक है।
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चार घंटे चली सर्जरी
प्रो. सुरेश ने बताया कि इस ट्यूमर को हर्माटोमा कहते हैं। फेफड़े के भीतर और दिल से नजदीक होने की वजह से यह खतरनाक होता है। 29 अप्रैल को सर्जरी कर छाती के दाहिनी तरफ चिपके ट्यूमर को निकाला गया। सर्जरी चार घंटे चली। इसमें करीब 20 हजार रुपया खर्च हुआ। प्राइवेट में इसका खर्च करीब पांच लाख रुपया आता है।
ये थी चुनौती
ट्यूमर फेफडे़ के भीतरी हिस्से में था, जहां उपकरण पहुंचने में कठिनाई थी। अहम कोशिकाओं के साथ ही नसों के कटने का खतरा था। वक्त पर सर्जरी ने होने से अगर ट्यूमर फट जाए तो मरीज की मौत हो सकती है।
ये रहे सर्जरी टीम में शामिल
प्रो. सुरेश कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर संजीव कुमार, डॉ. निशांत, डॉ. मेरी, एनेस्थीसिया विभाग की डॉ. ज्योत्सना, डॉ अंशू, स्टाफ नर्स फैजान।
ये थी चुनौती
ट्यूमर फेफडे़ के भीतरी हिस्से में था, जहां उपकरण पहुंचने में कठिनाई थी। अहम कोशिकाओं के साथ ही नसों के कटने का खतरा था। वक्त पर सर्जरी ने होने से अगर ट्यूमर फट जाए तो मरीज की मौत हो सकती है।
ये रहे सर्जरी टीम में शामिल
प्रो. सुरेश कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर संजीव कुमार, डॉ. निशांत, डॉ. मेरी, एनेस्थीसिया विभाग की डॉ. ज्योत्सना, डॉ अंशू, स्टाफ नर्स फैजान।