रिश्ते बिगाड़कर भी भारत से कैसे ‘रिश्ता’ तोड़ पाएगा नेपाल, मुकुट से लेकर मुद्रा तक पर भारत की छाप
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चीन के बहकावे में आकर नेपाल भारत से संबंध खराब कर रहा है। लेकिन क्या नेपाल अपना वह अतीत भुला पाएगा जिसमें नेपाल के मुकुट, मुद्रा व सभ्यता पर आज भी भारत की छाप विद्यमान है। इसे वहां के लोग आज भी सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।
भारत के बिना नेपाल का न तो कभी कोई अतीत रहा है और न ही उनके बेहतर भविष्य की कल्पना ही की जा सकती है। नेपाल भले ही राजनीतिक रूप से एक अलग देश रहा हो, लेकिन धर्म व संस्कृति से वह भारत के साथ जुड़ा रहा है। नेपाल का मुकुट हो या फिर वहां की मुद्रा, सभी पर भारतीय चिह्न हैं। नेपाल के कई प्राचीन वंश भी भारत से ही वहां जाकर फल-फूल रहे हैं, जिन पर आज भी नेपाल को गर्व है। इनके बिना नेपाल की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती है।
कहा जाता है कि गोरखपुर स्थित गोरक्ष मंदिर में महंत के बाद दूसरे व्यक्ति के रूप में नेपाल का राजपरिवार आज भी गोरक्षनाथ को खिचड़ी चढ़ाता है। यह परंपरा नेपाल में माओवादी आंदोलन के दौरान भी बंद नहीं हुई। इस परंपरा के पीछे नेपाल के एकीकरण का इतिहास है।
प्राचीन कथाओं के अनुसार नेपाल के राजा के राजमहल के पास ही गुरु गोरक्षनाथ की गुफा थी। उस समय नेपाल बाईसी और चैबीसी के नाम से 46 छोटी-छोटी रियासतों में विभाजित था। सभी रियासतें अपने-अपने ढंग से राज करती थीं। उस समय के राजकुमार पृथ्वी नारायण शाह को गुरु गोरक्षनाथ ने ही नेपाल के एकीकरण का वरदान दिया था और उन्होंने नेपाल राज्य की स्थापना की थी। तभी से नेपाल नरेश व वहां के लोगों के लिए बाबा गोरक्षनाथ आराध्य देव हैं।
नेपाल के राजा के मुकुट पर गोरक्षनाथ के पदचिह्न
नेपाल राजवंश दशकों से गुरु गोरक्षनाथ की चरण पादुका अपने मुकुट पर लगाकर राज करता आ रहा है। शाह वंशीय राजा पर गुरु गोरक्षनाथ की छाप थी। इसीलिए पृथ्वी नारायण शाह ने अपनी प्रथम मुद्रा पर श्री श्री भवानी व श्री श्री श्री गोरखनाथ लिखा था। बाद के शासकों ने नेपाली मुद्रा पर गोरख पादुका व गोरक्षनाथ की कटार अंकित की। यह वही कटार थी जो बाबा ने पृथ्वी नारायण शाह को शासन चलाने के लिए प्रतीक के तौर पर दी थी।
गुरु गोरक्षनाथ के भक्त कहलाए गोरखा
प्राचीन काल में गुरु गोरक्षनाथ के नाम पर ही नेपाल में गोरखा जिला बसा था। इसी स्थान पर योगी गुरु गोरक्षनाथ पहली बार देखे गए थे। गोरखा जिले में आज भी एक गुफा है, जहां गोरखनाथ का पदचिह्न व मूर्ति है। यहां वैशाख पूर्णिमा को रोट महोत्सव मनाया जाता है। इस स्थान पर रहने वाले सभी लोग गोरक्षनाथ के अनुयायी थे, जिस कारण इन्हें गोरखा कहा जाता है। नेपाल में बहादुरी के लिए यह जाति प्रसिद्ध है।
देवीपाटन में नेपाली पुजारी करते हैं पूजा
51 शक्तिपीठों में से एक देवीपाटन में चैत्र नवरात्र पंचमी के दिन नेपाल के डांग जिले के चैखड़ा से पीर रतननाथ की यात्रा आने के बाद से ही यहां नेपाल से आए हुए पुजारी ही मां पाटेश्वरी के गर्भगृह से लेकर अन्य स्थानों पर पूजन-अर्चन करते हैं। नवमी तक पूजा के दौरान मंदिर के घंटे नहीं बजाए जाते हैं, बल्कि नेपाल से शोभायात्रा के साथ आए नगाडे़ व घंटियां ही बजाई जाती हैं। यह अधिकार नेपाल के पीर रतननाथ को स्वयं मां पाटेश्वरी ने ही दिया था।
श्रावस्ती का नेपाल से 11वीं शताब्दी से ही अटूट संबंध रहा है। श्रावस्ती के राजा सुहेलदेव का राज्य क्षेत्र नेपाल के डांग तक फैला था। उनके पौत्र हरीसिंह देव ने तुर्की के हमलों से परेशान होकर डांग जिसे आज राप्ती अंचल का मुख्यालय कहा जाता है, वहां अपनी राजधानी बनाई थी और ठाकुरी वंश की स्थापना की थी। नेपाल एकीकरण के दौरान यह वंश भी एकीकृत नेपाल का ही हिस्सा बन गया था।
नेपाल राज्य की स्थापना ही गुरु गोरक्षनाथ के आशीर्वाद से हुई थी
एमएलके पीजी कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. एसएन सिंह का कहना है कि नेपाल राज्य की स्थापना ही गुरु गोरक्षनाथ के आशीर्वाद से हुई थी। इसीलिए नेपाल के क्राउन पर उनके पदचिह्न बने हुए हैं। उनकी मुद्रा हो या फिर राष्ट्रीय चिह्न खुफरी, सब कुछ बाबा गोरक्षनाथ से जुड़ा है। ऐसे में नेपाल अपने आपको भारत से कैसे अलग कर पाएगा। क्या बिना गोरक्षनाथ के उसका अस्तित्व संभव है।
माओवादी आंदोलन के दौरान चीन का प्रभाव नेपाल पर पड़ना शुरू हो गया
नेपाल मामलों के जानकार आशीष सिंह का कहना है कि माओवादी आंदोलन के दौरान चीन का प्रभाव नेपाल पर पड़ना शुरू हो गया था। आंदोलनकारी चीन की शह पर भारत का विरोध कर रहे थे। यह क्रम आज तक जारी है, जबकि नेपाल आंदोलन से पहले राजतंत्र में भारत व नेपाल का बहुत ही नजदीकी संबंध रहा है।