यूपी चुनाव: 500-1000 के नोट रद्दी होने से उड़े उम्मीदवारों के होश
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पांच सौ और हजार रुपये के नोटों का चलन बंद होने से विधानसभा चुनाव के प्रत्याशियों और दावेदारों की बेचैनी बढ़ गई है। एकाएक हुए इस फैसले से उनके रोजमर्रा के कामकाज प्रभावित हो गए हैं। काले धन को सफेद बनाने की चिंता बढ़ गई है।
एक मोटे अनुमान के मुताबिक राजनीतिक दलों के प्रत्याशी हर हल्के में 5 से 10 करोड़ रुपये काले धन का इस्तेमाल करते हैं। पूरे प्रदेश में यह आंकड़ा चार हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का है।
प्रदेश में विधानसभा चुनाव फरवरी-2017 में होने की संभावना है। बसपा ज्यादातर सीटों पर उम्मीदवार तय कर चुकी है। सपा ने हारी हुई सीटों के प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। बाकी सीटों पर उसके विधायक हैं।
भाजपा में हर सीट पर कई-कई दावेदार चुनाव की तैयारी में जुटे हैं। यही स्थिति कांग्रेस व अन्य दलों की है। प्रत्याशी-दावेदारों को अभी से हर रोज चुनाव लड़ना पड़ रहा है। उनके होर्डिंग्स, वॉल पेटिंग्स से शहर, कस्बे ही नहीं, गांवों तक पटे हुए हैं।
वे जनसंपर्क में जुटे हैं, कार्यकर्ताओं के खाने-पीने, रहने की व्यवस्था उनके जिम्मे है। गांव-गांव, मोहल्ले-मोहल्ले तक शुभ आयोजनों ही नहीं, दुखद समाचारों में भी शामिल हो रहे हैं। कहीं शगुन दे रहे हैं तो कहीं मदद कर रहे हैं। कई-कई गाड़ियां चल रही हैं। कुल मिलाकर हर रोज हजारों रुपये खर्च हो रहे हैं।
'इन खर्चों का चुनाव आयोग के ब्यौरे में कोई जिक्र नहीं'
ये सारे खर्च ऐसे हैं, जिनका चुनाव आयोग को दिए जाने वाले खर्च में जिक्र नहीं होता है। यूं भी चुनाव की घोषणा और प्रत्याशी बनाए जाने के बाद ही अधिकृत चुनाव खर्च शुरू होता है।
राजनीति करने वालों की मानें तो सभी प्रमुख दलों के प्रत्याशी चुनाव में औसतन 50 लाख से दो करोड़ रुपये तक खर्च करते हैं। ऐसे भी कुछ उम्मीदवार हैं, जिनका चुनावी खर्च पांच-सात करोड़ रुपये से ऊपर पहुंचेगा। चुनाव में लगने वाले धन में अधिकतर नंबर दो का होता है।
कई जिलों के कलेक्टर रह चुके सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एसपी सिंह कहते हैं कि जिस तरह रियल एस्टेट में काले धन को खपाया जाता है, उसी तरह अब चुनावों में काले धन को लगाया जाने लगा है है। किसी भी राजनीतिक दल की वेबसाइट पर जाकर देख लीजिए, उसके चंदे का सोर्स नहीं मिलेगा। हजारों करोड़ चंदा बेनामी है।
चुनाव से पहले एसयूवी खरीदने वालों से ही आयकर के बारे में पूछ लीजिए, दो नंबर के धन के फ्लों का पता लग जाएगा। उनका कहना है कि नौकरी और खेती के पैसे से चुनाव लड़ना अब नामुकिन हो गया है।
सेवानिवृत्त आईएएस एसपी आर्य तो इससे भी बढ़कर कहते हैं, राजनीति है ही काले धन की ही भूमिका, सफेद धन कहां है? पूरी राजनीति काले धन पर चल रही है। हम भी राजनीति में गए थे। हालात देखकर तीन माह बाद ही खुद को इससे अलग कर लिया।
नोट बंद होते ही होश उड़े, धड़कनें तेज
चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार और दावेदार बजट की व्यवस्था सबसे पहले करते हैं। बड़ी तादाद में काला धन खपाया जाता है। टिकट के लिए लॉबिंग, टिकट लेने से लेकर टिकट को बचाने तक में मोटा पैसा खर्च होता है। ऐसे में प्रत्याशियों के होश उड़ गए हैं, उनकी धड़कनें तेज हो गई हैं।
असल सवाल यह नहीं है कि तात्कालिक जरूरतों को कैसे पूरा किया जाए। जोर इस बात पर है कि काले धन को सफेद कैसे किया जाएगा। काला धन, सफेद हुए बिना चुनाव जीतने की संभावनाओं पर असर पड़ेगा। गौरतलब है कि सियासी दल व प्रत्याशी चुनाव में नकद लेन-देन ही करते हैं।
राजनीति में काले धन, भ्रष्टाचार पर लगेगा अंकुश
पीसीएस एसोसिएशन के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे बाबा हरदेव सिंह भी कहते हैं कि राजनीति में काले धन का अकूत प्रयोग होने लगा है। भारत निर्वाचन आयोग इस पर नियंत्रण करने में नाकाम रहा है। एक पूर्व सीईसी ने इसे स्वीकार भी किया।
उनका कहना है कि काले धन के शीर्ष स्तर पर पहुंच जाने से प्राकृतिक नियम के मुताबिक इसे नीचे आना ही है। पीएम नरेंद्र मोदी ने जो कदम उठाए हैं, उससे काले धन पर बहुत हद तक नियंत्रण लगेगा।
नई करेंसी के इफरात से सर्कुलेशन में आने में सालों का समय लगेगा। उम्मीद है कि चुनाव में काले धन का इस्तेमाल काफी कम हो जाएगा और भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी।
पहले आठ हजार में जीते थे चुनाव अब
8 हजार में जीत गया था कैंट से चुनाव : गुप्त
लखनऊ कैंट के पूर्व विधायक और चौधरी चरण सिंह व त्रिभुवन नारायण सिंह की सरकार में मंत्री रह चुके 91 वर्षीय सच्चिदानंद गुप्त राजनीति में काले धन के चलन से दुखी हैं।
कहते हैं, पहले और आज के दौर में बड़ा बदलाव आ गया है। पहले ईमानदारी थी, अब भ्रष्टाचार है। पहले समाजसेवा थी अब धनोपार्जन है। 1969 में मैं 8 हजार रुपये में चुनाव जीत गया था। अब प्रत्यशी दो-तीन करोड़ रुपये खर्च करते हैं।
आम आदमी के लिए चुनाव लड़ना अब आसान नहीं रह गया है। विधायक निधि भ्रष्टाचार की जननी बन गई है। बतौर विधायक हमें 300 रुपये मिलते थे और अब तनख्वाह व भत्ते लाखों में पहुंच गए हैं।
न गाड़ी-घोड़े की डिमांड थी, न शराब की
अलीगढ़ जिले की अतरौली सीट से 1980 में भाजपा के कल्याण सिंह को चुनाव हराने वाले 80 वर्षीय अनवार अहमद कहते हैं कि राजनीति में पहले से बहुत फर्क आ गया है। करप्शन बहुत बढ़ गया है।
मैंने 1980 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री कल्याण सिंह को हराया था। उस चुनाव में 50 हजार रुपये खर्च हुए थे। चुनाव प्रचार में दो-तीन गाड़ियां होती थीं। कार्यकर्ता साइकिल से प्रचार करते थे।
न शराब की मांग होती और न ही पैसा और साधनों की। अब तो हालात एकदम बदल गए हैं। चुनाव में धन की भूमिका बहुत खास हो गई है। नंबर दो का पैसा खूब इस्तेमाल हो रहा है।