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मुजफ्फरनगर दंगों का दंश अब भी झेल रही हैं मासूम बेटियां

Tue, 16 Jun 2015 01:09 AM IST
अतुल भारद्वाज/अमर उजाला, लखनऊ
अतुल भारद्वाज/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 16 Jun 2015 01:09 AM IST
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Crisis for teenaged girls after Muzaffarnagar riots.

केस-1 15 साल की अमीना 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे में परिवार सहित बेघर हो गई। पिछले साल एक सामूहिक विवाह समारोह में उसका निकाह कर दिया गया।

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कुछ महीने बाद उसके ससुराल वालों ने उसे तलाक दिलाकर वापस भेज दिया। ससुराल पक्ष का कहना था कि मुआवजा राशि में से उसके घर वाले दहेज दे सकते थे।

केस-2 शाहपुर निवासी और 16 साल की गजाला भी दंगों में बेघर हुई। सामूहिक विवाह में स्थानीय मौलवी के दबाव में उसकी शादी करा दी गई। मौलवी का कहना था कि बेटी बड़ी हो रही है। राहत शिविर में वह सुरक्षित नहीं है।
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ऐसे में उसका निकाह कर दो। इसके बाद परिवार ने निकाह करा दिया। बाद में पता चला कि उसका शौहर गलत कामों में लिप्त था। अब गजाला अपने घर वापस आ चुकी है।

गलत शौहर का चुनाव भी बड़ा कारण

Crisis for teenaged girls after Muzaffarnagar riots.

मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद केवल अमीना और गजाला ही नहीं उन जैसी बड़ी संख्या में किशोरियां पहले कम उम्र में निकाह और अब तलाक का दंश झेल रही हैं। निकाह टूटने के इन मामलों में दहेज मांगने से लेकर जल्दबाजी में गलत शौहर का चुनाव भी बड़ा कारण बना है।

इनमें से कई लड़कियां तो ऐसी भी हैं जो उम्र के लिहाज से कानूनी रूप से निकाह लायक होने से पहले ही तलाक झेल रही हैं। सोमवार को राजधानी के जयशंकर प्रसाद सभागार में मुजफ्फरनगर से आई अस्तित्व संस्था की कोऑर्डिनेटर व सोशल एक्टिविस्ट रेहाना अदीब ने राहत शिविरों में हो रही इस सामाजिक उथल-पुथल का मुद्दा उठाया।

बाल विवाह और कम उम्र में शादी की समस्या पर यह राज्यस्तरीय सम्मेलन सनतकदा, वनांगना और सद्भावना ट्रस्ट ने आयोजित किया था। रेहाना का कहना था कि अल्पसंख्यक समुदाय की किशोरियां पहले बाल विवाह और अब तलाक का दर्द झेल रही हैं।

एक स्थानीय संस्था जमीते उलेमा-ए-हिंद और स्थानीय मौलानाओं केकहने पर राहत शिविरों में रहने वाले परिवारों के लिए सामूहिक विवाह आयोजित कराए गए। ऐसा करते हुए बेटी की सुरक्षा का दावा भी किया गया। सामाजिक सुरक्षा के नाम पर कम उम्र में हुए इन निकाह का अब विकृत रूप यह है कि लड़कियों का भविष्य ही संकट में पड़ गया है।

दहेज नहीं मिलने पर तोड़ा निकाह

Crisis for teenaged girls after Muzaffarnagar riots.

रेहाना ने बताया कि हर सामूहिक विवाह में 30-40 तक निकाह होते थे। इनमें से ज्यादातर लड़कियां 14-16 साल की थीं। कोई इनके भविष्य के लिए नहीं सोच रहा था। अब हमारे सामने महीने में 3-4 मामले  तलाक के आ रहे हैं।

ज्यादातर मामलों में दहेज नहीं मिलने की शिकायत होती है। कुछ मामलों में जल्दबाजी में गलत शौहर चुनना, कुछ में कम उम्र का शौहर होना रहा।

लड़का-लड़की दोनों के नादान होने की वजह से निकाह आगे नहीं चल सका। निकाह टूटने के मामले में दहेज मांगने की समस्या सबसे आम है। लड़के के परिवार वाले कहते हैं कि दंगे का मुआवजा मिल तो गया। इसमें से लड़की के घरवालों द्वारा उन्हें कुछ तो हिस्सा देना ही चाहिए।

अब शिक्षा दिलाने की कोशिश
रेहाना के अनुसार हमारे वॉलंटियर ऐसी लड़कियों की काउंसलिंग कर उन्हें इस दर्द से उबारने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, हमारा प्रयास है कि कम उम्र में निकाह और फिर तलाक का दर्द झेल रहीं इन लड़कियों को शिक्षा दिलाकर समाज की मुख्यधारा में लाया जाए।

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