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यूपी की जेलों में माफिया राज: जितना बड़ा दबंग, उसे उतनी अच्छी सुविधा

Sat, 24 Dec 2016 02:07 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 24 Dec 2016 02:07 AM IST
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criminals enjoy luxury in UP jails.

जेल और अस्पतालों से माफिया और बाहुबलियों के ऑपरेट करने पर हाईकोर्ट भले चिंतित दिखे, लेकिन इस पर लगाम आसान नहीं। सूबे की जेलों में बंद माफिया अपना पूरा साम्राज्य जेलों से ही चलाते हैं। जेलों से न सिर्फ रंगदारी व फिरौती वसूलते हैं, बल्कि बड़े ठेका-पट्टा दिलाने का काम भी कर रहे हैं।

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रियल एस्टेट का बिजनेस भी इन्हीं की बदौलत फल फूल रहा है। जेलों में हालत यह है कि जो जितना बड़ा दबंग, उसे उतनी ही सुविधा मिलती है। हालांकि हर सुविधा के लिए इन्हें जेब ढीली करनी पड़ती है।
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स्थिति यह है कि जेलों में बंद माफिया मोबाइल के जरिये अपना काम आसानी से कर रहे हैं। इसके लिए उनके पास दर्जनों सिम कार्ड होते हैं। एक कॉल करने के बाद दूसरी कॉल वे दूसरे सिम से ही करते हैं, ताकि फोन की रिकॉर्डिंग न की जा सके। इनके मुलाकाती भी आसानी से जेलों में बेरोक-टोक मिल लेते हैं।
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रसूखदार एवं बड़े माफिया को न तो सामान्य बैरक में रहना पड़ता है न ही मुलाहिजा में लगाया जाता है। अन्य बंदियों से अलग रहते हुए वे घर जैसी सुविधाओं का जेल में ही उपभोग करते हैं।

ऑन डिमांड खाने से लेकर मिलता है सबकुछ

criminals enjoy luxury in UP jails.

ऑन डिमांड खाने से लेकर अन्य सुविधाएं भी इन्हें जेल में आसानी से मिल जाती हैं। ये सुविधाएं कोई और नहीं बल्कि जेल विभाग के ही लोग रुपये लेकर उपलब्ध कराते हैं। रसूखदार व बड़े माफिया भी इन्हें मुंहमांगा पैसा देते हैं, ताकि उनकी सुविधा में किसी तरह की कमी न रह जाए।

पुलिस व प्रशासन के अफसर भी सबकुछ जानते हैं, लेकिन जानकर भी कुछ नहीं कर पाते। जब भी जेलों में रेड पड़ती है तो उसकी जानकारी जेलों में पहले हो जाती है। इसके बाद वहां कुछ नहीं मिलता।

जेल जाते ही अस्पताल पहुंचकर आराम करते हैं रसूखदार
आमतौर पर बड़े माफिया एवं रसूखदार जेल अधिकारियों व डॉक्टरों की मिलीभगत से जेल जाने के फौरन बाद अस्पताल में दाखिल हो जाते हैं।

इसके बाद वे न सिर्फ मनमाने तरीके से वहां रहते हैं, बल्कि सभी प्रकार की सुविधाओं का लाभ उठाते हैं। अस्पतालों से ही अपना काम-धंधा करते रहते हैं। जेल अस्पताल में उनसे मिलने मुलाकाती भी आते हैं और वहां से उनके धंधे भी चलते रहते हैं।

जैमर लगने के बाद भी होती हैं कॉलें

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यूपी की कई जेलों में अब मोबाइल जैमर लग गए हैं, लेकिन इसके बाद भी इनमें से कई जेलों से मोबाइल पर बात हो रही है। सूत्रों के अनुसार वाराणसी, सुल्तानपुर, मिर्जापुर व मुजफ्फरनगर जेल में जैमर तो लगे हैं, लेकिन इनकी फ्रीक्वेंसी 3जी डाटा रोकने की है। अब 4जी फ्रीक्वेंसी आ गई है। इसलिए इन जेलों में 4जी के सिगनल आसानी से मिल रहे हैं।

कई बार जेल अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत से जैमर की फ्रीक्वेंसी कम कर दी जाती है। इस कारण भी आसानी से मोबाइल पर बात हो जाती है।

इन माफियाओं का है जेलों-अस्पतालों में वर्चस्व
जेलों में बंद माफिया वहीं से अपना कारोबार करते रहते हैं। कई बार ऐसी शिकायतें सामने आई हैं कि जेल में बंद रहने के दौरान दबंग व माफिया बाहर लोगों को धमकी दे रहे हैं। उनसे अवैध वसूली भी करते हैं।

यूपी की जेलों में बंद बबलू श्रीवास्तव, मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, मुन्ना बजरंगी, खान मुबारक, सुभाष ठाकुर, डॉ. उदयभान, मुकीम काला, योगेश भदौड़ा, उधम सिंह करनावन, विनोद बावला, धनंजय राय, रणदीप भाटी, अनिल दुजाना आदि का पूरा साम्राज्य सलाखों के पीछे से ही संचालित हो रहा है। आला अफसरों को भी इसकी पुख्ता जानकारी है कि जेलों में रहने बाद भी इनका अपने-अपने क्षेत्रों में छोटे-बड़े ठेकों में पूरा दखल रहता है।

मुलाकात में भी होता है पूरा खेल

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जेलों में बंद माफिया से मुलाकात में भी खेल होता है। बड़े माफिया से मिलने वालों की पर्चियां कई बार उस जेल में बंद दूसरे कैदियों के नाम से बनाई जाती थीं। ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि पुलिस या एसटीएफ माफिया से मिलने वालों पर यदि निगरानी रख रही है तो उन्हें इसकी कोई भनक न लगे।

सब कुछ मैनेज होता है
एक वरिष्ठ अधिकारी इस बात को स्वीकार करते हैं कि जेल के अधिकारियों-कर्मचारियों का नेक्सस ऐसा संगठित हो चुका है कि यहां सब कुछ मैनेज हो जाता है। एसटीएफ ने कुछ वर्षों पूर्व इस नेक्सस को तोड़ने की कोशिश की थी, पर कामयाबी नहीं मिल सकी।

कभी-कभी कोई जेल अधिकारी इस नेक्सस में शामिल नहीं होता है और रसूखदारों या माफिया पर सख्ती करने पर आमादा हो जाता है। ऐसे में उसे रास्ते से हटाने में भी ये लोग पीछे नहीं रहते। पूर्व में कई जेल अधिकारियों को इसी वजह से अपनी जान गंवानी पड़ी।

दो से लेकर 10 गुना तक करना होता है भुगतान

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जेल में सुविधाओं के लिए दो गुना से लेकर 10 गुना तक भुगतान करना पड़ता है। बैरक बदलने से लेकर मुलाहिजा कटवाने, मनचाहा भोजन करने या किसी अन्य सुविधा के लिए सभी के अलग-अलग रेट हैं।

यदि जेल में एक पैकेट सिगरेट चाहिए तो उसके लिए तीन से चार गुना पैसा देना होता है। यदि बाहर से 10 हजार रुपये मंगाना है तो उसके लिए 20 हजार रुपये भुगतान होगा।

जेलों को नहीं बनने देंगे अपराध का अड्डा
अपर पुलिस महानिदेशक कारागार गोपाल लाल मीणा कहते हैं कि जब से हमने विभाग की कमान संभाली है, सभी जेल अधीक्षकों को साफ निर्देश दिए हैं कि जेलों से अपराध हुआ तो उसके जिम्मेदार जेल के अफसर माने जाएंगे। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी। जेलों को अपराध का अड्डा नहीं बनने देंगे।

जहां-जहां से शिकायतें मिल रही हैं, तत्काल कार्रवाई हो रही है। जेल अधिकारियों से भी साफ कहा गया है कि दबाव है तो बताइए। हम कार्रवाई करेंगे। निडर होकर काम करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि जेल में अपराध बगैर अधिकारियों की मिलीभगत के नहीं हो सकता है। इसलिए जहां भी ऐसे मामले मिलेंगे, वहां के जेल अधिकारियों के खिलाफ एक्शन लिया जाएगा।

चुनाव आयोग के निर्देश का होगा शत-प्रतिशत पालन

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गोपाल लाल मीणा कहते हैं कि चुनाव आयोग ने जो भी निर्देश दिए हैं, उसका शत-प्रतिशत पालन होगा। उन्होंने कहा कि जनवरी में जेलों में जैमर पूरी तरह काम करने लगेंगे।

अभी प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, गाजियाबाद, आगरा, लखनऊ, गोरखपुर जेलों सहित कुल 12 जेलों में जैमर लगने का काम चल रहा है। यहां 10 जनवरी तक काम पूरा होगा।

कई जेलों में जहां जैमर लगे हैं, वहां फ्रीक्वेंसी की दिक्कत आई थी, उसे भी दूर किया जा रहा है। सुल्तानपुर जेल में एक मोबाइल कंपनी के सिगनल काम कर रहे थे। उसे दूर किया गया है।

इसके अलावा जेलों में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। इनसे भी निगरानी रखी जाएगी।

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