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पहले ही दम तोड़ रहा भाजपा का संकल्प
अखिलेश वाजपेयी/लखनऊ
Updated Mon, 07 Oct 2013 02:33 AM IST
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भाजपा नेता अतीत से सबक लेते नहीं दिख रहे हैं। दागियों को गले न लगाने का ऐलान व संकल्प लोकसभा चुनाव आते-आते दम तोड़ने लगा है।
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विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में लेने के फैसले पर पश्चाताप पार्टी नेताओं को याद नहीं रहा।
शायद यही वजह है कि लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी के रणनीतिकार फिर उसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। कई मामलों में आरोपी चंद्रभद्र सिंह उर्फ सोनू सिंह से लेकर अशोक दोहरे तक को भाजपा ने गले लगा लिया है। कुछ अन्य के लिए लाल कालीन बिछाने की तैयारी हो रही है।
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इस बारे में बात चलने पर पार्टी के एक पूर्व महामंत्री चुटकी लेते हैं, ‘अरे भाई! कमल तो कीचड़ में ही खिलता है। इसलिए हमारे नेता गलत क्या कर रहे हैं।’ यह बात भले ही चुटकी में कही गई हो लेकिन पार्टी के भीतर दोहरे को लेकर खींचतान मची हुई है।
पार्टी की इटावा जिला इकाई में विद्रोह जैसी स्थिति खड़ी हो गई है। एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि भाजपा को कभी दागियों का लाभ नहीं मिला। भाजपा की पहचान ऐसे लोगों के विरोध के लिए है।
पार्टी जब इस पहचान के विपरीत काम करती है तो फायदा के बजाय नुकसान ही होता है। विधानसभा चुनाव में बाबू सिंह कुशवाहा को लेकर पार्टी को हुआ नुकसान इसका प्रमाण है।
पार्टी के भीतर ही इतना विरोध हुआ कि चुनाव का एजेंडा नीचे हो गया। खुद को पाक-साफ साबित करने का एजेंडा आ गया। पूर्व मंत्री डी.पी. यादव से लेकर बाबू सिंह कुशवाहा तक ऐसे ही उदाहरण सामने दिखाई दे रहे हैं।
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यह याद दिलाते हैं कि डी.पी. यादव को भाजपा में लेने पर दिल्ली से लेकर लखनऊ तक इतना बवाल मचा कि भाजपा को अपना फैसला पलटना पड़ा।
भुगत चुके हैं परिणाण
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष की बात सही दिखती है। विधानसभा के पिछले चुनाव में भाजपा ने मुख्य एजेंडा भ्रष्टाचार सेट किया था।
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चुनाव से एक साल पहले से भाजपा नेता तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती पर आरोप लगा रहे थे। पर, अचानक न जाने क्या हुआ कि भाजपा बाबू सिंह कुशवाहा पर बदल गई।
कुशवाहा को जेल भेजने की मांग करने वाली भाजपा ने 24 घंटा के भीतर कुशवाहा को गले लगा लिया। उन्हें निर्दोष व साजिश का शिकार बताने लगी।
कुशवाहा के साथ वह बादशाह सिंह को भाजपा ने अपना लिया जो कुशवाहा की तरह ही कई आरोपों में घिरे थे। जिनकी गिरफ्तारी की तैयारी चल रही थी। बादशाह सिंह ने मंत्री न बन पाने पर नाराज होकर पार्टी छोड़ दी थी।
बाबू सिंह कुशवाहा को गले लगाने पर भाजपा के भीतर व बाहर ऐसा बवाल मचा कि कुशवाहा की सदस्यता को 48 घंटे के भीतर ही स्थगित करना पड़ा। पर, कुशवाहा के कहर से पार्टी मुक्त नहीं हो पाई।
बादशाह सिंह और उनके साथ बसपा सरकार में मंत्री रहे अवधेश वर्मा और दद्न मिश्रा को चुनाव लड़ाने का जो फैसला पार्टी को महंगा पड़ा। पार्टी नेताओं को पश्चाताप तब हुआ जब नतीजे सामने आए।
पर, सबक लेने को तैयार नहीं
पर, चुनाव नजदीक आते ही भाजपा अपनी गलतियों को भूलती दिख रही है। मई में सोनू सिंह पार्टी में आ चुके हैं। उन पर भी पार्टी के भीतर बवाल व विरोध हो चुका है। अब भी सोनू सिंह को लेकर पार्टी के भीतर सहज स्थिति नहीं है।
सेवाकाल में विवादास्पद छवि के लिए पहचाने जाने वाले और घोटाले के आरोपी रिटायर आईएएस आर.के. सिंह को उनकी पत्नी पूर्व मंत्री ओमवती के साथ भाजपा में जगह देकर पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह अतीत के अनुभव से सबक नहीं लेने वाली।
आर.के. सिंह के बाद वह अशोक दोहरे भी भाजपा में आ चुके हैं। जिन पर मायावती सरकार में औरैया और आसपास भाजपा कार्यकर्ताओं को जबरदस्त उत्पीड़न का ही आरोप नहीं है बल्कि घपलों व घोटालों में लिप्त होने के कारण मायावती ने अपने करीबी दोहरे को बरखास्त कर दिया था।
अभी बस नहीं
पर, दोहरे के साथ दागियों को भाजपा में जगह देने का सिलसिला समाप्त नहीं होने वाला। कई के लिए लाल कालीन बिछाने की तैयारी हो रही है।
कभी भाजपा के सहयोगी जद (यू) के टिकट पर सांसद व विधायक रह चुके एक बाहुबली भी किसी दिन भगवा चोला ओढ़े दिखाई दे सकते हैं। बुरे दिन में पार्टी को छोड़ गए और भाजपा के एक नेता की हत्या में संदेह के घेरे में आए एक सांसद भी जल्द ही भाजपा को मजबूत बनाने का दावा करते दिख सकते हैं।
संगीन मामलों में आरोपी और भाजपा के साथ रह चुके सूबे के एक और प्रभावी नेता व पूर्व मंत्री भी भाजपा के साथ संपर्क में होने की चर्चा है।
हालांकि भाजपा प्रवक्ता डा. मनोज मिश्र कहते हैं कि भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता के चलते तमाम लोग भाजपा में शामिल हो रहे हैं। किसी को अभी टिकट देने का वादा नहीं किया गया है।