नौकरी के लिए झांसा देकर की करोड़ों की ठगी, खोले 23 आफिस
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निजी संस्था को भारत सरकार का उपक्रम बताकर बेरोजगारों को नौकरी देने का झांसा देकर करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले गिरोह का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। इस गिरोह का जाल यूपी समेत आठ प्रदेशों में फैला था। अकेले यूपी में ही इसने 23 ऑफिस खोल रखे थे। सूबे में इसने 280 बेरोजगारों को अपना शिकार बनाकर साढ़े पांच करोड़ रुपये हड़प लिए।
क्राइम ब्रांच ने बृहस्पतिवार रात लखनऊ के गाजीपुर थानाक्षेत्र से दो जालसाजों को गिरफ्तार कर इसका खुलासा किया। ये जालसाज वायरलेस सेट और मेटल डिटेक्टर से लैस होकर नीली बत्ती लगी सरकारी नंबर वाली एंबेसडर कार से निकलते थे और बेरोजगारों को फांसते थे।
एसएसपी राजेश कुमार पांडेय ने बताया कि क्राइम ब्रांच की टीम ने इंदिरानगर के आम्रपाली बाजार के पास एक मकान की घेराबंदी कर कुशीनगर के हाटा थाने के गांव सुकरौली निवासी काशीनाथ तिवारी व हाथरस के शादाबाद थाने के गढ़ी हरबल निवासी संदीप कुमार सिंह को गिरफ्तार किया।
क्या-क्या हुआ बरामद
तीन वायरलेस हैंडसेट, तीन हैंड हैल्ड मेटल डिटेक्टर, 136 मोहरें, 105 फर्जी प्रवेशपत्र, सौ आवेदनपत्र व भारतीय कृषि शोध अनुसंधान के सौ लेटर पैड, विभिन्न लोगों के 59 शपथपत्र, तीन मोबाइल, 12 सिमकार्ड और सात हजार रुपये के साथ दो कारें बरामद हुईं। इनमें एक सरकारी नंबर एंबेसडर कार पर नीलीबत्ती लगी थी।
कैसे फंसाते थे बेरोजगारों को, जानें पूरी कहानी
राष्ट्रीय कृषि आयात निर्यात परिषद संस्था बनाई, नौकरी के इश्तेहार छपवाए
जालसाजों ने ‘राष्ट्रीय कृषि आयात निर्यात परिषद’ नामक संस्था बना रखी थी। इसके लोगो में अशोक स्तंभ बनवाया था। संस्था को भारत सरकार का उपक्रम बताकर नौकरी के इश्तहार छपवाते और एजेंटों के माध्यम से बेरोजगारों से संपर्क करके आवेदन कराता।
संस्था का निदेशक काशीनाथ तिवारी व मैनेजर आरके सिंह खुद को राजपत्रित अधिकारी बताते थे। हत्थे चढ़े काशीनाथ व संदीप ने कुबूला कि उन्होंने यूपी के विभिन्न जिलों के 280 बेरोजगारों से 5.50 करोड़ की ठगी की है।
जितनी बड़ी नौकरी, उतनी बड़ी रकम
जालसाज जिला विकास अधिकारी, सहायक विकास अधिकारी, विकास अधिकारी, लिपिक व चपरासी के पदों का विज्ञापन छपवाकर नौकरी देने का झांसा देते। पद से हिसाब से 50 हजार से लेकर चार लाख तक की ठगी करते थे।
इंटरव्यू में कम नंबर देकर सौदेबाजी
एएसपी क्राइम ज्ञानप्रकाश चतुर्वेदी ने बताया कि आवेदकों के इंटरव्यू अपने ऑफिस या अच्छे होटल में लेते थे। इसमें ‘आपकी शर्ट में कितने बटन हैं, आप कितनी सीढ़ियां चढ़कर आए हैं, एक साल में कौन-कौन सी फसलें कटती हैं, एक व दो रुपये के नोट में क्या अंतर है?’ जैसे सवाल पूछते और कम नंबर देते थे। बाहर खड़ी टीम आवेदकों से पास कराने के एवज में मोटी रकम वसूलती थी।
दो घंटे में ही मेडिकल व नियुक्तिपत्र
इंटरव्यू खत्म होने के साथ ही आवेदक को रिजल्ट बता दिया जाता था। सौदा पटने पर उसे मेडिकल कराने भेजते और दो घंटे बाद ही नियुक्तिपत्र थमा देते। दो महीने की ट्रेनिंग की बात कहकर ऑफिस में उपस्थिति दर्ज कराने के निर्देश देते थे।
इस दौरान उसे प्रशिक्षणकालीन वेतन के रूप में पांच-छह हजार रुपये महीने के हिसाब से भुगतान भी करते। इसके बाद वेतन में टालमटोल करते और ट्रेनिंग करने वाले युवकों में से ही कई को एजेंट बनाकर उनके माध्यम से नए शिकार तलाशते थे। एजेंट को कमीशन देते थे।
इन प्रदेशों में जाल
यूपी, दिल्ली, मध्यप्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब व उत्तराखंड।
वेबसाइट भी बना रखी थी
www.rkanp.org.in नाम से वेबसाइट बना रखी थी। लुभावनी वेबसाइट बेरोजगारों का ध्यान खींचती थी और वह नौकरी के लिए संपर्क शुरू कर देते थे।