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सीतापुर खेल एडवायजरी
Updated Tue, 29 Aug 2017 12:49 AM IST
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...एकलव्य की आस में खेल विभाग
महज दो ही प्रशिक्षक, अन्य खेल भगवान भरोसे
सीतापुर। खेल विभाग के पास अपना स्टेडियम है और खेल सीखने के इच्छुक बच्चे भी हैं। मगर इनके हुनर को तराशने वाले प्रशिक्षक नहीं हैं। प्रशिक्षित कोचों की कमी से यहां खेल प्रतिभाएं निखर नहीं पा रही हैं। हालांकि जिम्मेदार शासन से नए प्रशिक्षक मिलने की आस लगाए बैठे हैं। उनका कहना है कि जल्द ही विभाग को खेल प्रशिक्षक मिल जाएंगे।
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के नाम पर यहां स्टेडियम मौजूद है। वर्ष 1996 में इस स्टेडियम को शुरू किया गया था। मंशा यह थी कि यहां पर प्रशिक्षण लेकर बेहतर क्रिकेटर, धावक, फुटबॉलर, पहलवान, वेट लिफ्टर, बॉक्सर आदि निकलेंगे और देश से विदेश तक अपना और जिले का नाम रोशन करेंगे। मगर सरकार ने ही इन सपनों पर पानी फेर दिया। सरकार ने जिले को स्टेडियम तो दे दिया, लेकिन प्रशिक्षकों की आज भी कमी है। यही वजह है कि शहर से लेकर गांव तक बच्चे खेलों में बेहतर प्रदर्शन करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें सही ट्रेनिंग नहीं मिल पाती है। ऐसे में उनका स्पोर्ट्स कॅरिअर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता है। खेल विभाग के अधिकारियों का कहना है कि प्रशिक्षक शासन तैनात करता है। जब प्रशिक्षक मिलेंगे, तो खिलाड़ियों को सेवाएं मिलनी शुरू हो जाएंगी।
इन खेलों के प्रशिक्षक नहीं
हॉकी, क्रिकेट, बैडमिंटन, दौड़, लॉन्ग जंप, हाई जंप, वेट लिफ्टर, डिस्कस थ्रो, जैबलिंग, हैमर, कुश्ती, कबड्डी, पोलवार्ड, खो-खो आदि खेलों के प्रशिक्षक ही स्टेडियम में मौजूद नहीं हैं। नतीजा बच्चे बेहतर खिलाड़ी तो बनना चाहते हैं, लेकिन उन्हें बेहतर प्रशिक्षण नहीं मिल पाता है।
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चंद खेलों तक सीमित
प्रशिक्षक की बात करें तो यहां स्टेडियम में ताइक्वांडो, फुटबॉल व तैराकी के प्रशिक्षक ही मौजूद हैं। इनमें भी तैराकी के प्रशिक्षक को अनुबंध पर लेकर प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
जल्द आएंगे प्रशिक्षक
बहुत जल्द ही हॉकी व वेटलिफ्टिंग के प्रशिक्षण जिले को मिल जाएंगे। शासन ने दोनों प्रशिक्षकों की तैनाती सीतापुर जिले में की है। अन्य प्रशिक्षकों के लिए शासन को पत्र लिखा गया है। जैसे ही प्रशिक्षक आएंगे, बच्चों को उसका लाभ दिया जाने लगेगा।
नरेश चंद्र यादव, जिला खेल अधिकारी
स्टेडियम भी हो रहा जर्जर
वर्ष 1996 से संचालित स्टेडियम अब जर्जर होने लगा है। इसकी दीवारें जगह-जगह से टूट रही हैं। भवन का भी बुरा हाल है। बारिश में छतें टपक रही हैं, शौचालय से लेकर कमरों तक सब खस्ताहाल हैं। खेल विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बजट मिलते ही स्टेडियम की खामियों को दुरुस्त किया जाएगा।
नहीं मिल सका बेहतर प्रशिक्षण
रामकृष्ण पुरी निवासी धर्मेंद्र सिंह कहते हैं कि मेरे दिल में आज भी टीस है कि मैं राष्ट्रीय स्तर खेल में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सका। मैने फूड फेडरेशन की ओर से आयोजित राष्ट्रीय स्तर की 200 मीटर दौड़ में 2007 में हिस्सा लिया। उस दौरान मेरा पांचवां रैंक आया। अगर बेहतर प्रशिक्षण मिला होता, तो शायद जीत मेरी ही होती।
क्रिकेट कोई नहीं सिखाता
आजाद नगर निवासी विपिन विश्वकर्मा कहते हैं कि मुझे ही नहीं, इस जिले के हर बच्चे को प्रशिक्षक की जरूरत है। मैं क्रिकेट खेलता हूं, बेहतर खिलाड़ी बनना चाहता हूं, लेकिन यहां प्रशिक्षक ही मौजूद नहीं हैं। घर की आर्थिक स्थित इतनी मजबूत नहीं है कि मैं कहीं बाहर जाकर कोचिंग करूं, इसलिए छोटे-मोटे टूर्नामेंट में हिस्सा लेकर ही खुश हो लेता हूं।
प्रशिक्षकों की जरूरत
हाल ही में लखनऊ सैनिक स्कूल में आयोजित मंडलीय ताइक्वांडो प्रतियोगिता में अपना लोहा मनवाने वाली जिले की सौम्या त्यागी का कहना है कि बेहतर खिलाड़ी बनने के लिए बेहतर प्रशिक्षक का होना जरूरी है। सौम्या ने अंडर 19 बालिका वर्ग की 52 किलो वेट कैटेगरी में गोल्ड मेडल झटका था। सौम्या ने इस जीत का श्रेय अपने प्रशिक्षक सुरेंद्र कुमार लाल व जिला क्रीड़ा अधिकारी को दिया है।
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महज दो ही प्रशिक्षक, अन्य खेल भगवान भरोसे
सीतापुर। खेल विभाग के पास अपना स्टेडियम है और खेल सीखने के इच्छुक बच्चे भी हैं। मगर इनके हुनर को तराशने वाले प्रशिक्षक नहीं हैं। प्रशिक्षित कोचों की कमी से यहां खेल प्रतिभाएं निखर नहीं पा रही हैं। हालांकि जिम्मेदार शासन से नए प्रशिक्षक मिलने की आस लगाए बैठे हैं। उनका कहना है कि जल्द ही विभाग को खेल प्रशिक्षक मिल जाएंगे।
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के नाम पर यहां स्टेडियम मौजूद है। वर्ष 1996 में इस स्टेडियम को शुरू किया गया था। मंशा यह थी कि यहां पर प्रशिक्षण लेकर बेहतर क्रिकेटर, धावक, फुटबॉलर, पहलवान, वेट लिफ्टर, बॉक्सर आदि निकलेंगे और देश से विदेश तक अपना और जिले का नाम रोशन करेंगे। मगर सरकार ने ही इन सपनों पर पानी फेर दिया। सरकार ने जिले को स्टेडियम तो दे दिया, लेकिन प्रशिक्षकों की आज भी कमी है। यही वजह है कि शहर से लेकर गांव तक बच्चे खेलों में बेहतर प्रदर्शन करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें सही ट्रेनिंग नहीं मिल पाती है। ऐसे में उनका स्पोर्ट्स कॅरिअर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता है। खेल विभाग के अधिकारियों का कहना है कि प्रशिक्षक शासन तैनात करता है। जब प्रशिक्षक मिलेंगे, तो खिलाड़ियों को सेवाएं मिलनी शुरू हो जाएंगी।
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इन खेलों के प्रशिक्षक नहीं
हॉकी, क्रिकेट, बैडमिंटन, दौड़, लॉन्ग जंप, हाई जंप, वेट लिफ्टर, डिस्कस थ्रो, जैबलिंग, हैमर, कुश्ती, कबड्डी, पोलवार्ड, खो-खो आदि खेलों के प्रशिक्षक ही स्टेडियम में मौजूद नहीं हैं। नतीजा बच्चे बेहतर खिलाड़ी तो बनना चाहते हैं, लेकिन उन्हें बेहतर प्रशिक्षण नहीं मिल पाता है।
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चंद खेलों तक सीमित
प्रशिक्षक की बात करें तो यहां स्टेडियम में ताइक्वांडो, फुटबॉल व तैराकी के प्रशिक्षक ही मौजूद हैं। इनमें भी तैराकी के प्रशिक्षक को अनुबंध पर लेकर प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
जल्द आएंगे प्रशिक्षक
बहुत जल्द ही हॉकी व वेटलिफ्टिंग के प्रशिक्षण जिले को मिल जाएंगे। शासन ने दोनों प्रशिक्षकों की तैनाती सीतापुर जिले में की है। अन्य प्रशिक्षकों के लिए शासन को पत्र लिखा गया है। जैसे ही प्रशिक्षक आएंगे, बच्चों को उसका लाभ दिया जाने लगेगा।
नरेश चंद्र यादव, जिला खेल अधिकारी
स्टेडियम भी हो रहा जर्जर
वर्ष 1996 से संचालित स्टेडियम अब जर्जर होने लगा है। इसकी दीवारें जगह-जगह से टूट रही हैं। भवन का भी बुरा हाल है। बारिश में छतें टपक रही हैं, शौचालय से लेकर कमरों तक सब खस्ताहाल हैं। खेल विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बजट मिलते ही स्टेडियम की खामियों को दुरुस्त किया जाएगा।
नहीं मिल सका बेहतर प्रशिक्षण
रामकृष्ण पुरी निवासी धर्मेंद्र सिंह कहते हैं कि मेरे दिल में आज भी टीस है कि मैं राष्ट्रीय स्तर खेल में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सका। मैने फूड फेडरेशन की ओर से आयोजित राष्ट्रीय स्तर की 200 मीटर दौड़ में 2007 में हिस्सा लिया। उस दौरान मेरा पांचवां रैंक आया। अगर बेहतर प्रशिक्षण मिला होता, तो शायद जीत मेरी ही होती।
क्रिकेट कोई नहीं सिखाता
आजाद नगर निवासी विपिन विश्वकर्मा कहते हैं कि मुझे ही नहीं, इस जिले के हर बच्चे को प्रशिक्षक की जरूरत है। मैं क्रिकेट खेलता हूं, बेहतर खिलाड़ी बनना चाहता हूं, लेकिन यहां प्रशिक्षक ही मौजूद नहीं हैं। घर की आर्थिक स्थित इतनी मजबूत नहीं है कि मैं कहीं बाहर जाकर कोचिंग करूं, इसलिए छोटे-मोटे टूर्नामेंट में हिस्सा लेकर ही खुश हो लेता हूं।
प्रशिक्षकों की जरूरत
हाल ही में लखनऊ सैनिक स्कूल में आयोजित मंडलीय ताइक्वांडो प्रतियोगिता में अपना लोहा मनवाने वाली जिले की सौम्या त्यागी का कहना है कि बेहतर खिलाड़ी बनने के लिए बेहतर प्रशिक्षक का होना जरूरी है। सौम्या ने अंडर 19 बालिका वर्ग की 52 किलो वेट कैटेगरी में गोल्ड मेडल झटका था। सौम्या ने इस जीत का श्रेय अपने प्रशिक्षक सुरेंद्र कुमार लाल व जिला क्रीड़ा अधिकारी को दिया है।