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उत्तर प्रदेश में बैसाखी तलाश रही कांग्रेस
अनिल श्रीवास्तव/लखनऊ
Updated Wed, 11 Dec 2013 10:30 PM IST
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दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में सूपड़ा साफ होने से घबराई कांग्रेस यूपी में किसी ऐसे सहयोगी की तलाश में जुट गई है जिसके बलबूते वह लोकसभा चुनाव में अपनी नाक बचा सके।
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लोकसभा चुनाव के सेमीफाइनल में हार के बाद कांग्रेस गठबंधन की संभावनाएं तलाशने में जुट गई है।
चार राज्यों के नतीजों ने कांग्रेस को न सिर्फ बैकफुट पर धकेल दिया है बल्कि पार्टी के सामने ऐसे हालात बन गए हैं कि उसे सहयोगी दल की शर्तों पर ही गठबंधन करना होगा।
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फिलहाल पार्टी ने सपा और बसपा दोनों से ही गठजोड़ का विकल्प खुला रखा है। बसपा के साथ कांग्रेस की खिचड़ी पहले से ही पक रही थी लेकिन सपा ने राज्यसभा की एक सीट परोसकर कांग्रेस पर अपने पाले में खड़ा होने का दबाव भी बढ़ा दिया है।
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बदले राजनीतिक परिदृश्य में इतना तो साफ है कि कांग्रेस अब कम से कम यूपी में अपने दम पर तो लोकसभा चुनाव में उतरने का साहस नहीं दिखाएगी। किसी बैसाखी के सहारे ही वह चुनावी समर में उतरेगी।
प्रदेश में कांग्रेस की हालत पहले से दयनीय है और चार राज्यों में मिली करार हार ने नेताओं व कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़कर रख दिया है।
कांग्रेसी तो अब दबी जुबान यहां तक सवाल उठाने लगे हैं कि सपा-बसपा के समर्थन के बगैर रायबरेली और अमेठी सीट भी निकलेगी या नहीं?
फिलहाल तो पार्टी हार के कारणों पर आत्ममंथन कर रही है। जहां तक यूपी का सवाल है तो यहां संगठन तक नहीं है।
डॉ. रीता बहुगुणा जोशी के प्रदेश अध्यक्ष रहने तक तो प्रदेश कांग्रेस कुछ सक्रिय भी नजर आती थी लेकिन निर्मल खत्री के बागडोर संभालने के बाद से लगातार गिरावट ही आई है।
अपना संगठनात्मक ढांचा न होने की वजह से इस बार कांग्रेस को अपने परंपरागत वोटरों को भी बूथो पर पहुंचाने में पसीने छूटेंगे।
संगठनात्मक कमजोरियों को देखते हुए पार्टी ऐसी किसी राजनीतिक बैसाखी की तलाश में है जिसके सहारे चुनाव में इज्जत बचाई जा सके।
प्रदेश में कांग्रेस 1989 से सत्ता से बाहर है। उसका प्रभाव क्षेत्र भी सिकुड़ता जा रहा है। यूपी में ही सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें हैं। सपा और बसपा ने यूपी में अपना दबदबा बना रखा है।
मोदी फैक्टर भी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है। महंगाई व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों ने कांग्रेस की मुश्किल और बढ़ा दी है।
2004 में जब कांग्रेस केंद्र में वापस लौटी तब उसे यूपी में 10 सीटें मिली थीं। हालांकि 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने यूपी में 22 सीटें जीतीं पर 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ 30 सीटों पर ही सिमट कर रह गई।
कांग्रेस की यह हालत तब हुई थी जब राहुल गांधी ने खुद यूपी में धुआंधार चुनाव प्रचार किया था।
राजनीतिक विश्लेषक इस बार यूपी में कांग्रेस की सीटें और घटने की बात कह रहे हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति में लगातार गिरावट आई है।
कांग्रेस अभी असमंजस में है और यह तय नहीं कर पा रही है कि यूपी में वह सपा के पीछे खड़ी हो या बसपा के।
आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में दोनों दलों के सुप्रीमो और उनके परिवार को राहत देकर उसने जो दांव चला है उसका कितना अनुकूल परिणाम होगा यह कहना कठिन है लेकिन अभी दोनों ही दलों ने चुनावी दृष्टि से कांग्रेस से दूरी बना रखी है।
उसके खिलाफ अभियान चला रखा है। अगर चुनावी समझौते की स्थिति बनती है तो कांग्रेस को ही झुकना पड़ेगा।
कांग्रेसियों का भी मानना है कि अब न तो 2009 जैसी स्थिति है और न ही स्थितियां उसको लाभ पहुंचाने वाली हैं। इसलिए उसे जीत नहीं वरन एक सम्मानजनक हार के लिए तैयार रहना होगा।