क्षेत्रीय दलों से भी कमजोर हो गई कांग्रेस, 'अपने' भी चले गए दूर
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उत्तर प्रदेश की सत्ता से करीब 27 साल से दूर रहने वाली कांग्रेस का इस विधानसभा चुनाव में शर्मनाक प्रदर्शन ने उसकी हालत और खराब कर दी है। पार्टी महज सात विधानसभा सीटों में सिमट कर रह गई है।
उसकी स्थिति कुछ जिलों तक सिमटे क्षेत्रीय दलों से भी बदतर हो गई है। कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज नेता भी चुनाव हार गए हैं। इससे पार्टी के कार्यकर्ता पूरी तरह टूट गए हैं। अब पार्टी के लिए अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा उठाना एक बड़ी चुनौती है। पार्टी के लिए संगठन को चुस्त-दुरुस्त करना आसान नहीं है।
फिलहाल स्थिति यह है कि अगर समय पर ध्यान न दिया तो वर्ष 2019 के चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी को सूबे से बड़ी निराशा हाथ लगेगी। इसके लिए पार्टी को नए सिरे से संगठन को ठीक करना होगा।
पार्टी आलाकमान को अपने कार्यकर्ताओं यह विश्वास पैदा करना होगा कि कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है, जो भाजपा का विकल्प बन सकती है। मगर, इसके लिए सूबे में संगठन को मजबूत करना होगा। यह तभी संभव होगा, जब सूबे में कमान किसी मजबूत नेता को सौंपी जाए।
गुलाम नबी व राज बब्बर दोनों ही फेल
कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी व राष्ट्रीय महासचिव गुलाम नबी आजाद व प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर दोनों ही इस चुनाव में फेल हो गए।
आजाद इससे पहले भी प्रदेश प्रभारी रह चुके हैं। वे जब-जब प्रभारी रहे, तब-तब प्रदेश में कांग्रेस ही हालत और खस्ता हो गई। इस बार तो कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा है।
आजाद राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं। इसलिए वे यूपी के बजाय अधिकतर समय दिल्ली में ही रहे। सूबे के संगठन को मजबूत करना तो दूर, वे संगठन के नेताओं को ही ढंग से समझ नहीं पाए।
वहीं, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर भी कुछ नहीं कर पाए। हालांकि वह अपनी सभाओं में भीड़ तो एकत्रित कर लेते थे, लेकिन उसे पार्टी के पक्ष में वोटों में तब्दील नहीं कर पाए।