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'हां, उमा के लिए पनपा था मेरे दिल में प्रेम'
लखनऊ/ब्यूरो/अखिलेश वाजपेयी
Updated Mon, 12 Aug 2013 02:29 AM IST
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संघ परिवार व भाजपा की रीति-नीति व राजनीति के लंबे समय तक शिल्पकार रहे कोणिपक्कम् नीलमेघाचार्य गोविंदाचार्य (के.एन. गोविंदाचार्य) के दिल व दिमाग में भी प्रेम का भाव पनपा था।
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प्रेम के लिए जिस शख्स की तस्वीर उन्होंने अपने दिल में बैठाई थी, वह और कोई नहीं अब साध्वी हो चुकीं उमा भारती ही थीं।
गोविंदाचार्य स्वीकार करते हैं कि उनके दिल में प्रेम की लहर कुछ वैसी ही उठी थी, जैसी सामान्य मनुष्य के भीतर उठती है। पर, बाद में इस प्रसंग ने जब संघ व भाजपा के रंग में भंग डाल दिया। बखेड़ा खड़ा हो गया।
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तब संगठन के अनुशासन और संघ के संस्कार को प्राथमिकता देते हुए गोविंदाचार्य ने अपने ही हाथ अपने प्रेम को सूली पर टांग दिया। हालांकि इसके पीछे उमा की असहमति भी एक वजह रही। गोविंदाचार्य ने मर्यादा का पालन किया और अपने व उमा के बीच शिष्य व गुरु के रिश्ते को आयाम दे दिया।
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इसका प्रमाण है, इस प्रेम के रिश्ते के चर्चा में आने के लगभग एक दशक बाद गोविंदाचार्य की लखनऊ में ‘अमर उजाला’ से खास बातचीत में यह ईमानदार स्वीकारोक्ति, ‘उमाजी के लिए मेरे दिल में एक समय प्रेम का भाव था। पर, 1992 में उमा के संन्यास के साथ यह रिश्ते बदल गए। उमा जी आज मेरे लिए गुरुतुल्य हैं।’
संन्यास का कारण कहीं ये तो नहीं?
गोविंदाचार्य जो बताते हैं, उससे इस बात के संकेत भी निकलते हैं कि इन रिश्तों के चर्चा में आने के बाद ही उमा भारती ने संन्यास का मार्ग चुन लिया।
गोविंदाचार्य कहते हैं,‘यह बात 1992 से पहले की है। उमा को लेकर मेरे भीतर भी प्रेम की लहर उठी। कोई देवता व ऋषि तो हूं नहीं। मनुष्य ही तो हूं।
रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए हमने अपने मन की बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारियों के सामने रखी। पर, न संघ के अधिकारियों ने अनुमति दी और न उमाजी सहमत हुई।
उमाजी ने 1992 में संन्यास का फैसला ले लिया। मुझे अध्यात्म से प्रेम की प्रेरणा दी। मैने भी अपनी भूमिका बदल ली। संन्यास के साथ उमा मेरे लिए गुरु हो गई। तब से आज तक मैंने उमाजी को उसी रूप में ही देखा है। अब अंतिम सांस तक मेरे लिए गुरुतुल्य ही रहेंगी।
..पर उमा तो कतराती रही हैं
गोविंदाचार्य ने भले ही अपने दिल में उमा भारती के लिए प्रेम-भाव पनपने की बात स्वीकार कर ली हो। पर, उमा आज तक इस तथ्य को स्वीकार करने से कतराती रही हैं। यहां तक कि जब कभी सवाल भी हुआ, तो उन्होंने इसे बकवास तक करार दे दिया।
हालांकि भले उमा ने गोविंदाचार्य के प्रेम को स्वीकार न किया हो लेकिन गोविंदजी के दिल में उमा को लेकर सम्मान जरा भी कम नहीं हुआ। कहते भी हैं, वह बेहतरीन राजनेता हैं। उनकी स्मरणशक्ति और वक्तृत्व शैली बेमिसाल है। उनके भीतर भी गैरबराबरी व गरीबी के खिलाफ संघर्ष की तड़प है।