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जानिए, क्यों आग का गोला बन गया है वेस्ट यूपी?

Mon, 11 Aug 2014 01:11 PM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 11 Aug 2014 01:11 PM IST
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communal cases in West UP

केस-1: मेरठ के सोतीगंज में नौ अगस्त को युवती से छेड़छाड़ को लेकर सांप्रदायिक तनाव हो गया। दोनों पक्षों में मारपीट और पथराव हुआ। आठ अगस्त को इसी क्षेत्र में एक पूर्व मंत्री की प्रपौत्री से छेड़छाड़ पर सिख और मुस्लिम आमने-सामने आ गए थे।

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केस-2: संभल जिले के बहजोई क्षेत्र के राजपुर गांव से आठ अगस्त को चार परिवार पलायन कर गए। इस गांव में ईद के दिन मदरसे में नमाज अदा करने और चबूतरे पर कीर्तन को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। एक अगस्त को पथराव व फायरिंग भी हुई। तभी से सांप्रदायिक तनाव बना हुआ है।
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केस-3: मुरादाबाद के डिलारी क्षेत्र के मलकपुर सैमली गांव में नौ अगस्त को धर्मस्थल के जीर्णोद्धार को लेकर दो पक्ष आमने-सामने आ गए। इस गांव में तीन दिन पहले भी तनाव की स्थिति बनी थी। फिलहाल धर्मस्थल के निर्माण पर रोक लगा दी गई है।
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केस-4: अमरोहा के मेंहदीपुर गांव में 8 अगस्त को पांचवी कक्षा के छात्र की हत्या के बाद तनाव की स्थिति बन गई। ग्रामीणों ने पुलिस को रात भर शव नहीं उठाने दिया। आरोपी दूसरे संप्रदाय के है, इसलिए गांव में फोर्स तैनात कर दी गई।

इस तरह यहां भी हालात बिगड़े

communal cases in West UP
केस-5: बिजनौर जिले के अफजलगढ़ और मंडावर थाना क्षेत्र के गांवों में धर्मस्थलों से मूर्ति गायब करने और दूसरी जगह मूर्ति खंडित कर देने के मामले हुए। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रण में किया।

केस-6: गाजियाबाद जिले के मोदीनगर क्षेत्र के खिंदौड़ा गांव में छह अगस्त को एक धर्मस्थल पर हवन की वीडियोग्राफी कराने पर पुलिस और ग्रामीणों के बीच हिंसक संघर्ष के बाद तनाव बना हुआ है। ईद पर नमाज के दौरान भी मामूली तनाव पैदा हुआ था।

केस-7: बागपत जिले के बालैनी क्षेत्र के मवी खुर्द गांव में दो दिन पहले बच्चों के झगड़े में दो पक्षों में हुए संघर्ष में आधा दर्जन लोग घायल हो गए। चूंकि मामला दो संप्रदायों से जुड़ा था इसलिए पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को संभाला।

गैंगरेप पर आमने-सामने आए समुदाय

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केस-8: बरेली जिले के आंवला क्षेत्र के खटेटा गांव में आठ अगस्त को रात में मदरसे की दीवार गिराने पर सांप्रदायिक माहौल बन गया। इससे पहले कलारी, धौराटांडा, मिलक महमूदपुर, मन्हेरा और दुनका आदि गांवों में सांप्रदायिक तनाव हो चुका है।

केस-9: लखीमपुर खीरी जिले के निघासन क्षेत्र में आठ अगस्त को एक गांव में दलित बच्ची की गैंगरेप के बाद हत्या से आक्रोशित लोगों ने एक आरोपी का घर गिरा दिया। चूंकि मामला दो समुदायों से जुड़ा है इसलिए तनाव को देखते हुए फोर्स तैनात है।

केस-10: मैनपुरी के कुरावली कस्बे में छह अगस्त को दो समुदायों के युवकों के बीच विवाद और मारपीट के बाद आगजनी की अफवाह फैलाकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की गई। सात अगस्त को इस घटना के विरोध में प्रदर्शन हुआ।

कभी भी हो सकती है सांप्रदायिक हिंसा

communal cases in West UP

दो-तीन दिनों की ये चंद घटनाएं वेस्ट यूपी के माहौल को समझने भर के लिए काफी हैं। अगर आप पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाशिंदे हैं तो सांप्रदायिक मामलों को लेकर संवेदनशील हो जाइये। पता नहीं, कौन सी मामूली घटना बड़े तनाव का रूप ले ले।

कभी सौहार्द की मिसाल के तौर पर पेश किया जाने वाला गंगा, यमुना और रामगंगा के इस इलाके का माहौल धीरे-धीरे सांप्रदायिक रंग ले रहा है। केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद 60 दिन के भीतर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव की छोटी-बड़ी 600 घटनाएं हो चुकी हैं।

363 मामले रिकार्ड में हैं। इनमें 71 फीसदी घटनाएं पश्चिमी यूपी की हैं। माहौल में तल्खी पैदा करने वाले एक तिहाई मामले उन क्षेत्रों या उनके आसपास के हैं, जहां आने वाले महीनों में विधानसभा उपचुनाव होने हैं।

चुनाव में हुआ, वोटों का ध्रुवीकरण

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वेस्ट यूपी में लोकसभा चुनाव के दौरान सांप्रदायिक आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण हुआ था। चुनाव में भाजपा को इकतरफा कामयाबी मिली। 25 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण से लेकर 25 जुलाई के बीच की अवधि में इस क्षेत्र में छोटी-छोटी बातें सांप्रदायिक रंग ले रही हैं।

गन्ने की मिठास वाले इलाके में सौहार्द की भावना पर कड़वाहट भारी पड़ रही है। सदियों से बना सामाजिक ताना-बाना छिन्न हो रहा है।

धर्मस्थलों के निर्माण, उनमें लाउडस्पीकर लगाने, महिलाओं से छेड़छाड़, गौकशी, कब्रिस्तान और दूसरी जमीन के विवाद कब फसाद का रूप ले लें, कह नहीं सकते।

हद तो यह है कि 30 ऐसे मामलों को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जहां दो वाहनों में मामूली एक्सीडेंट हुए। बस वजह सिर्फ इतनी थी कि दोनों वाहन स्वामी अलग-अलग धर्मों से जुड़े हुए थे।

विवाद धर्मस्थलों व लाउडस्पीकर को लेकर

communal cases in West UP

सांप्रदायिक तनाव की बढ़ती घटनाओं का विश्लेषण करने पर पता लगता है कि ये विवाद खासतौर पर छह बिंदुओं पर केंद्रित हैं।

सर्वाधिक मामले धर्मस्थलों के निर्माण, जीर्णोद्धार या कब्रिस्तानों के विवाद और लाउडस्पीकर लगाने या बजाने से रोकने को लेकर सामने आए हैं। ऐसे विवादों की संख्या करीब 240 है।

पश्चिमी यूपी की सामाजिक-राजनीतिक समझ रखने वाले एनएएस पीजी कॉलेज के सेवानिवृत्त प्राध्यायक डॉ. अशोक शास्त्री कहते हैं कि सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने वाली घटनाओं में वृद्धि की पहली वजह पुलिस और प्रशासन के पार्ट पर सुनवाई न होना है।

अधिकारी करते लापरवाही

communal cases in West UP

कार्यपालिका को सीआरपीसी में धारा 144, 145, 146 और 107/116, के अधिकार मिले हुए हैं। इनका इस्तेमाल अधिकारी समय रहते नहीं करते।

मसलन, यदि धर्मस्थल, कब्रिस्तान, सड़क, वक्फ आदि की जमीन पर कब्जे को लेकर या किसी अन्य वजह से विवाद है तो दोनों पक्षों के खिलाफ 107/116 की कार्रवाई कर मसले को तय करने के लिए सिविल कोर्ट में भेज दिया जाए।

लेकिन, अधिकारी ऐसा करते नहीं। पुलिस छेड़खानी की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं करना चाहती। यदि किसी लड़की के गायब हो जाने या अपहरण की सूचना दी जाती है तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने के बाद उसके खुद भाग जाने का तर्क देकर पीड़ितों से सहानुभूति नहीं दिखाती।

इससे गुस्सा बढ़ता है और फिर तनाव की स्थिति बन जाती है। मैं मायावती का समर्थक नहीं हूं पर पूर्ववर्ती बसपा सरकार में कानून व्यवस्था पर अपेक्षाकृत ज्यादा त्वरित व निष्पक्ष कार्रवाई होती थी।

मुजफ्फरनगर का इंपेक्ट

communal cases in West UP

डॉ. अशोक शास्त्री कहते हैं कि तनाव के मामले बढ़ने की एक वजह लोकसभा चुनाव के वक्त हुआ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी है। भाजपा को इसका पूरा लाभ मिला।

सेकुलरिज्म के नाम पर सपा के सामने मुस्लिमों को जोड़े रखने की चुनौती है। मुजफ्फरनगर दंगे ने आठ-दस जिलों के बुरी तरह प्रभावित किया है। इस दंगे से आहत दोनों पक्ष के लोगों के मन में अभी भी गुस्सा है।

मन में कही न कहीं बदले की भावना भी है जो माहौल को तनावपूर्ण बना देती है। प. यूपी में बागों को ठेके पर लेने वाले लोग नहीं आए। आने वाले समय में वेस्ट यूपी की पांच सीटों पर होने वाले उपचुनाव भी विवादों से जुड़े मामलों में राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ा रहे हैं।

विवाद के प्रमुख कारण

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-मस्जिद, मदरसा निर्माण या कब्रिस्तान से जुड़े मामले।
-धर्मस्थलों पर लाउडस्पीकर बजाने या लगाने पर असहमति।
-जमीन को लेकर चली आ रहे विवाद या कब्जे की कोशिश।

-गौकशी की बढ़ती घटनाएं।
-युवतियों से छेड़छाड़ और महिला उत्पीड़न के मामले।
-मामूली सड़क दुघर्टनाओं को विवाद का रूप देना।

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