{"_id":"59eb158c4f1c1bca678b69d9","slug":"cm-yogi-went-to-ramlala-birth-place","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"संतों की शिकायत दूर करने के लिए बदला था सीएम योगी का अयोध्या प्लान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
संतों की शिकायत दूर करने के लिए बदला था सीएम योगी का अयोध्या प्लान
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sat, 21 Oct 2017 04:18 PM IST
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सीएम आदित्यनाथ योगी
- फोटो : डेमो
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योगी आदित्यनाथ के कानों तक शायद अयोध्या के तमाम संतों की यह बात पहुंच चुकी थी कि मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद वह सिर्फ कुछ ही स्थानों तक आते हैं और गिने-चुने लोगों से ही उनकी बात होती है। बाकी से वह मुलाकात नहीं करते। कलियुग में त्रेता युग की दिवाली के सफल आयोजन के बाद उनके पास अयोध्यावासियों की शायद यह कसक भी पहुंच चुकी थी कि इतना सब होने के बावजूद योगी वहां तो गए ही नहीं जहां रामलला जन्मे थे।
शायद इसीलिए उन्होंने बड़ी दिवाली के दिन सुबह ही प्रतीकों के सहारे इस कसक को दूर करने की तैयारी कर ली। प्रात: काल उन्होंने अपने साथ मौजूद अमले को हनुमान गढ़ी चलने को कहा। जहां उन्होंने संतों की इस शिकायत को भी दूर करने का उपक्रम किया कि कुछ संतों की उनसे मुलाकात नहीं हो पाती है। उन्होंने हनुमान गढ़ी के प्रवेश द्वार के पास महंत संतरामदास और फिर महंत रमेश दास से मुलाकात की।
फिर दर्शन-पूजन करके उन्होंने राम जन्मभूमि स्थल का रुख किया। राम जन्मभूमि स्थल से निकलकर वह पास में ही स्थित रंगमहल पहुंचे। जहां से निकलकर वह श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास के स्थल मणिराम दास छावनी गए। यहां के बाद उन्होंने सुग्रीव किला पहुंचकर स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य से मुलाकात की। पुरुषोत्तमाचार्य इस वक्त बीमार हैं। फिर वह बड़ा भक्तमाल गए। इसके बाद अयोध्या आंदोलन का केंद्र रहे दिगंबर अखाड़े पहुंचकर संतों से मुलाकात की।
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शायद इसीलिए उन्होंने बड़ी दिवाली के दिन सुबह ही प्रतीकों के सहारे इस कसक को दूर करने की तैयारी कर ली। प्रात: काल उन्होंने अपने साथ मौजूद अमले को हनुमान गढ़ी चलने को कहा। जहां उन्होंने संतों की इस शिकायत को भी दूर करने का उपक्रम किया कि कुछ संतों की उनसे मुलाकात नहीं हो पाती है। उन्होंने हनुमान गढ़ी के प्रवेश द्वार के पास महंत संतरामदास और फिर महंत रमेश दास से मुलाकात की।
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फिर दर्शन-पूजन करके उन्होंने राम जन्मभूमि स्थल का रुख किया। राम जन्मभूमि स्थल से निकलकर वह पास में ही स्थित रंगमहल पहुंचे। जहां से निकलकर वह श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास के स्थल मणिराम दास छावनी गए। यहां के बाद उन्होंने सुग्रीव किला पहुंचकर स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य से मुलाकात की। पुरुषोत्तमाचार्य इस वक्त बीमार हैं। फिर वह बड़ा भक्तमाल गए। इसके बाद अयोध्या आंदोलन का केंद्र रहे दिगंबर अखाड़े पहुंचकर संतों से मुलाकात की।
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साधे समीकरण, दिए संदेश
डेमो
- फोटो : डेमो
योगी का अयोध्या भ्रमण रहा तो लगभग दो घंटे का ही। पर, इसमें उन्होंने प्रतीकों के सहारे समीकरण साधने और संदेश देने की भरपूर कोशिश की। हनुमान गढ़ी के बाद रामलला के दरबार में हाजिरी लगाकर उन्होंने उन लोगों का मुंह बंद करने की कोशिश की जो यह सवाल उठा रहे थे कि राम जन्मभूमि भाजपा के लिए सिर्फ सत्ता हासिल करने का एजेंडा है।
साथ ही समर्थकों को यह संदेश देने की भी कोशिश की कि सत्ता में आने के बावजूद भाजपा टस से मस नहीं हुई है। न्यायालय में मामला होने के कारण भले ही पार्टी के नेता और सरकार में बैठे लोग आपसी सहमति और न्यायालय के फैसले की बात कर रहे हों लेकिन भव्य मंदिर निर्माण उनके एजेंडे में पहले की तरह ही है।
आस्था भी पूर्ववत है। रही बात खुलकर बोलने की तो उसके लिए सही वक्त का इंतजार किया जा रहा है। जहां तक हनुमान गढ़ी की यात्रा का सवाल है तो उसकी दो वजहें रहीं। एक तो संतों को यह संदेश देना कि भाजपा और उसकी सरकार के लिए संपूर्ण हिंदू समाज सम्मानित है।
वह सभी संतों को हिंदुत्व के सरोकारों का संरक्षक मानती है। इसी के साथ हनुमान जयंती पर भी अयोध्या में होते हुए भी हनुमान गढ़ी न जाने पर उठने वाले सवालों पर विराम लगाना। रही बात अन्य स्थलों व संतों से मुलाकात की तो योगी ने इनकी शिकायतें दूर करने के साथ ही भविष्य के समीकरणों को भी संतुलित बनाने का प्रयास किया है। दरअसल, जल्द ही नवगठित अयोध्या नगर निगम का चुनाव होना है।
जाहिर है कि भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि कोई ऐसी स्थिति खड़ी हो जिसका लाभ उठाकर विपक्षी पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश करें। दूसरे जिस तरह मंदिर निर्माण पर अगले साल तक कोई सार्थक पहल होने की चर्चाएं भी में हैं। योगी का अयोध्या दौरा इन जरूरतों को भी पूरा करता दिख रहा है।
साथ ही समर्थकों को यह संदेश देने की भी कोशिश की कि सत्ता में आने के बावजूद भाजपा टस से मस नहीं हुई है। न्यायालय में मामला होने के कारण भले ही पार्टी के नेता और सरकार में बैठे लोग आपसी सहमति और न्यायालय के फैसले की बात कर रहे हों लेकिन भव्य मंदिर निर्माण उनके एजेंडे में पहले की तरह ही है।
आस्था भी पूर्ववत है। रही बात खुलकर बोलने की तो उसके लिए सही वक्त का इंतजार किया जा रहा है। जहां तक हनुमान गढ़ी की यात्रा का सवाल है तो उसकी दो वजहें रहीं। एक तो संतों को यह संदेश देना कि भाजपा और उसकी सरकार के लिए संपूर्ण हिंदू समाज सम्मानित है।
वह सभी संतों को हिंदुत्व के सरोकारों का संरक्षक मानती है। इसी के साथ हनुमान जयंती पर भी अयोध्या में होते हुए भी हनुमान गढ़ी न जाने पर उठने वाले सवालों पर विराम लगाना। रही बात अन्य स्थलों व संतों से मुलाकात की तो योगी ने इनकी शिकायतें दूर करने के साथ ही भविष्य के समीकरणों को भी संतुलित बनाने का प्रयास किया है। दरअसल, जल्द ही नवगठित अयोध्या नगर निगम का चुनाव होना है।
जाहिर है कि भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि कोई ऐसी स्थिति खड़ी हो जिसका लाभ उठाकर विपक्षी पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश करें। दूसरे जिस तरह मंदिर निर्माण पर अगले साल तक कोई सार्थक पहल होने की चर्चाएं भी में हैं। योगी का अयोध्या दौरा इन जरूरतों को भी पूरा करता दिख रहा है।