बजट: खेती के मोर्चे पर योगी सरकार के सामने हैं पांच बड़ी चुनौतियां, ये हैं विकल्प
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भले ही केंद्र सरकार ने गांवों व किसानों पर दरियादिली दिखाते हुए खेती-किसानी के लिए बजट में काफी कुछ प्रावधान किए हों। पिछली बार की तुलना में धन का इंतजाम 20 प्रतिशत बढ़ाकर कुल 3178 करोड़ रुपये कर दिया हो। किसानों की खुशहाली और खेती को बाजार बनाने की कल्पना साकार करने के लिए ऑपरेशन ग्रीन की घोषणा कर दी हो।
खाद्य प्रसंस्करण के मद में पिछली बार की तुलना में बजट को दोगुना कर 1400 करोड़ रुपये कर दिया हो। भूजल प्रबंधन और सिंचाई व्यवस्था सुधारने के लिए 1000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया हो। लेकिन किसानों और किसानी के मोर्चे पर यूपी की योगी सरकार के दृढ़ इरादों के बिना केंद्र का सपना पूरा होने वाला नहीं।
वैसे तो मुख्यमंत्री योगी खुद गांव और किसान की पृष्ठभूमि से हैं। उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्रनाथ पांडेय सहित सरकार और सत्तारूढ़ दल के ज्यादातर नेता मूल रूप से किसान परिवार से ही आते हैं। फिर भी खेती के मोर्चे पर प्रदेश सरकार के सामने कई चुनौतियां हैं।
किसानों की अपेक्षाएं और समस्याएं इतनी हैं कि उन्हें निपटाना दृढ़ इच्छाशक्ति और केंद्र के बजट के प्रावधानों को प्रदेश में जमीन पर उतारने के संकल्प का संदेश और संकेत देकर ही संभव है। प्रदेश सरकार को राज्य के बजट में इसकी झलक दिखानी ही पड़ेगी। भले ही इसकी वजह राजनीतिक यानी लोकसभा का सामने खड़ा चुनाव ही मान लिया जाए।
केंद्र की हवा का रुख बदल देती है यूपी की करवट
उत्तर प्रदेश को राजनीतिक अर्थशास्त्र का हृदयस्थल कहा जाता है। मतलब उत्तर प्रदेश की करवट केंद्र में हवा का रुख बदल देती है। देश की कुल सकल आय में 16 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र का है। यूपी की आय में कृषि की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत है।
समझा जा सकता है कि प्रदेश की कृषि आय अगर घट जाए तो केंद्र की कुल आमदनी में किस कदर गिरावट आ जाएगी। उत्तर प्रदेश को अनाज का कटोरा कहा जाता है। यहां के 59 प्रतिशत लोगों का जीवन पूरी तरह खेती पर निर्भर है। वर्ष 2000-2001 से 2014-15 तक प्रदेश में कृषि की औसत वार्षिक वृद्धि दर 2.5 प्रतिशत दर्ज की गई।
अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इसे बढ़ाकर 5 प्रतिशत तक पहुंचाया जा सकता है। इस संभावना को साकार करने और राजनीतिक रूप से भी आगे के मोर्चों से निपटने के लिए योगी सरकार को बजट में इरादे जरूर दिखाने होंगे, जिससे मोदी के फैसलों और इरादों का यूपी में लोगों को लाभ मिलने की उम्मीद दिखे।
योगी के सामने हैं ये पांच चुनौतियां
- खेती के क्षेत्र में सभी मोर्चों पर तरक्की के लिए पहली जरूरत सिंचाई की बेहतर सुविधाएं मुहैया कराना है। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशन की मार्च 2017 की रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश का कुल सिंचित क्षेत्रफल का अनुपात 77.9 है। इसमें से कुल 20.17 मिलियन हेक्टेयर भूमि ही सिंचित है।
- केंद्र सरकार ने बजट में हर खेत को पानी का संकल्प व्यक्त किया है। योगी सरकार को इस सिलसिले में आगे बढ़ने का इरादा दिखाना होगा। कारण, प्रदेश में सिंचाई की व्यवस्था को दुरुस्त किए बगैर न तो कृषि उपज बढ़नी है और न ऑपरेशन ग्रीन सफल रहने वाला।
- पिछले दिनों आलू को लेकर प्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज रही। किसानों की तरफ से बार-बार यह सवाल भी उठता रहा है कि तमाम व्यवस्थाओं के बावजूद नौकरशाही और सरकारी मशीनरी किसानों तक सरकार की योजनाओं का पूरा लाभ नहीं पहुंचने देती। आलू में तो किसानों को लागत मूल्य की आधी कीमत भी नहीं मिल पाती। भंडारण को लेकर भी काफी परेशानी उठानी पड़ती है। इसी वर्ष काफी किसानों ने कोल्ड स्टोर से अपना आलू इसलिए नहीं उठाया क्योंकि किराया आलू की कीमत से अधिक हो रहा था।
- गन्ना किसानों की भी शिकायत है कि उन्हें भी लागत मूल्य के हिसाब से पैसा नहीं मिल पाता। कुछ दिन ठीक रहकर भुगतान की स्थिति फिर बिगड़ गई। सब्जियों की खेती और बागवानी करने वालों की परेशानी है कि वे अगर अपनी उपज को सुरक्षित रखकर उसे बाजार में अच्छा भाव मिलने पर बेचना चाहें तो भंडारण के पर्याप्त प्रबंध नहीं हैं।
- केंद्र सरकार ने किसानी और बागवानी पर फोकस करने के साथ मंडियों की व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने की मंशा बजट में दिखाई है। इसकी झलक 42 मेगा फूड पार्क और हाटों को कृषि बाजार बनाने के संकल्प से दिखती है। योगी को बजट में इन संकल्पों पर भी सरोकार के रंग भरने होंगे।
सिर्फ भारी धन देने से ही नहीं पूरा होगा काम
अर्थशास्त्री प्रो. एपी तिवारी कहते हैं कि केंद्र सरकार की तरफ से बजट में खेती-किसानी, बागवानी और सिंचाई के लिए भारी धन की व्यवस्था कर देने से ही काम नहीं हो जाएगा।
प्रदेश सरकार को केंद्र के बजट के अनुसार अपने बजट में भी उन पर प्रावधान करके आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति दिखानी होगी। साथ ही अन्य कई परीक्षाओं पर भी उत्तीर्ण होकर दिखाना होगा क्योंकि उत्तर प्रदेश का खास महत्व है।
अगर यहां वादों को इरादों में बदलने की संकल्प शक्ति में कमी दिखी तो नतीजा केंद्र और राज्य सरकार को लेकर जनता की नाराजगी के रूप में सामने आ सकता है।
ये है एकमात्र विकल्प
बकौल प्रो. तिवारी प्रदेश में जिस तरह भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, खेती की मौजूदा पद्धति से काम नहीं बनने वाला। इसका विकल्प एकमात्र प्राकृतिक और शून्य लागत खेती यानी गौवंश व गोबर आधारित कृषि ही है। इस पद्धति से पानी की खपत में 90 प्रतिशत कमी लाई जा सकती है। आंध्र प्रदेश इसका उदाहरण है जहां के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने पूरे प्रदेश में प्राकृतिक पद्धति से खेती कराने का फैसला किया है।
मोदी के संकल्प के अनुसार 2022 तक किसानों की आय अगर दोगुनी करनी है तो उसका एक ही तरीका है कि प्राकृतिक खेती से उसकी लागत को घटाकर आधा कर दिया जाए।
प्रदेश सरकार को इस सिलसिले में अपने बजट में संदेश देने की चुनौती स्वीकार करनी पड़ेगी। उम्मीद है कि सरकार ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी पद्धतियों से सिंचाई की व्यवस्था तो हर खेत तक पहुंचाने का प्रबंध बजट में करेगी ही जिससे पानी की खपत घटे।