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क्या भीड़ को वोट में बदल पाएंगे मोदी?

Mon, 21 Oct 2013 01:39 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/लखनऊ Updated Mon, 21 Oct 2013 01:39 PM IST
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challenges in front of modi and bjp in uttar pradesh

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी कानपुर आए और पार्टी के लिए पूरे सूबे में माहौल बना गए।

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अभी उन्हें नौ सभाएं और करनी हैं, पर यूपी में भाजपा के सामने भीड़ को वोट में बदलने की चुनौती बरकरार है।

भाजपा नेताओं के दावों को छोड़ दें तो भीड़ को वोटों में तब्दील करने की क्षमता अब भी पार्टी के भीतर नहीं दिख रही है। संगठनात्मक ढांचा अब भी बहुत मजबूत नहीं है।

कभी नहीं आई थी इतनी भीड़

भाजपा की किसी रैली में पहली बार इतनी भीड़ नहीं आई है। इससे पहले भी पार्टी की सभाओं में भीड़ जुटी, पर मौका जब मतदान का आया तो लाभ नहीं मिल सका। कानपुर में जुटी भीड़ और उससे बना माहौल यूपी में मोदी के सहारे भाजपा की सीटों का आंकड़ा कहां तक पहुंचा पाएगा, इस बार भी असल सवाल यही है।
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हालांकि, भाजपा नेताओं का दावा है कि पहले और इस बार की स्थिति में बहुत अंतर है। इसलिए मोदी की रैली से बना माहौल और जुटी भीड़ वोट में बदलेगी।

भाजपा नेताओं का दावों की हकीकत तो चुनाव नतीजे बताएंगे, लेकिन अतीत पर नजर डालें तो बात बहुत उत्साहित करने वाली नहीं दिखती।

भाजपा के सत्ता से हटने के बाद पिछले एक दशक में हुई रैलियों पर नजर डाली जाए तो 24 दिसंबर 2006 को लखनऊ में तत्कालीन अंबेडकर मैदान में हुई रैली भीड़ के लिहाज से कानपुर में मोदी की विजय शंखनाद रैली से कमजोर नहीं थी।

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अंबेडकर मैदान में जुटी भीड़ देखकर न सिर्फ भाजपाइयों ने बल्कि राजनीतिक समीक्षकों ने भी यूपी में भाजपा की वापसी की भविष्यवाणी कर दी थी।

भाजपा ने तोड़ा था मिथक
एक मिथक बन गया था कि लगभग पांच लाख की क्षमता वाले अंबेडकर मैदान को भरने की क्षमता सिर्फ बसपा में ही है, लेकिन 2006 में अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर हुई रैली में यह मैदान पट गया था।

खुद अटल भी सभा में मौजूद थे, पर उसके कुछ महीने बाद ही 2007 के विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा 88 से 50 सीटों के आसपास ही सिमट कर रह गई।

इससे पहले 2003-04 में भी आडवाणी की भारत उदय यात्रा के दौरान लखनऊ के अलावा प्रदेश में अन्य स्थानों पर आयोजित रैलियां भीड़ के लिहाज से काफी सफल रही थीं। पर, चुनाव नतीजे आए तो भाजपा यूपी में लोकसभा की सिर्फ 10 सीटों पर ही सिमटकर रह गई।

पिछली बार भी जुटी थी भीड़
2009 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा की सभाओं में भीड़ जुटी लेकिन वोट नहीं मिले। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले भी भाजपा ने भ्रष्टाचार व कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर लोगों में बसपा की राज्य सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा करने के लिए पांच महासंग्राम रैलियां कीं।

सभी रैलियां भीड़ के लिहाज से सफल रहीं। भाजपा नेताओं का दावा था कि पार्टी के पक्ष में अंडर करंट है, लेकिन नतीजे आए तो फिर पार्टी परास्त व लस्त-पस्त दिखी।

आपसी गुटबाजी से होता है नुकसान

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता तर्क देते हैं कि चुनाव के मौके पर टिकटों को लेकर खींचतान, गुटबाजी व अंतर्कलह सारे किए-कराए पर पानी फेर देती है। इस बार भी मोदी की रैली में जुटी या आगे जुटने वाली भीड़ तब तक पार्टी की सफलता की गारंटी नहीं बन सकती जब तक पार्टी नेता इन गलतियों से सबक नहीं लेते।

बदली हैं स्थितियां
यह सही है कि इस बार स्थितियां बदली हुई हैं। मोदी ने कानपुर की रैली में यूपी के लिए एजेंडा सेट कर दिया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि सपा को कानून-व्यवस्था पर घेरना है तो कांग्रेस को भ्रष्टाचार पर। यूपीए को सत्ता बनाम विपक्ष की लड़ाई पर घेरना है।

भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक तर्क भी देते हैं कि मोदी ने सीधे जनता से सवाल किए और जवाब मांगा। जनता के जवाब उसके भीतर उफान मार रहे गुस्से को उजागर करने वाले हैं।


मोदी की रैली से कांग्रेस और सपा कितने दबाव में हैं, इसका प्रमाण खुद कानपुर रैली के बाद सामने आई प्रतिक्रियाएं हैं।

कांग्रेस ने किसी सटीक तर्क के साथ रैली की आलोचना के बजाय सर्कस जैसे ऊल-जुलूल शब्द से तुलना करके तो सपा ने यह कहकर कि 10 करोड़ रुपये खर्च करके भी भाजपा रैली में आम लोगों को नहीं जुटा पाई, अपनी-अपनी खिसियाहट मिटाई है।

यूपी के सियासी हलके में क्या है हलचल, जानिए यहां

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