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मासूमों ने समझाया, बोझ नहीं होते मां-बाप
नीरज 'अम्बुज'/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Tue, 24 Jun 2014 11:06 AM IST
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बुजुर्ग मां-बाप की सेवा बोझ नहीं बल्कि हमारा फर्ज है। उनकी दुश्वारियां बढ़ाने के बजाय उन्हें वृद्धावस्था में पलकों पर बैठाना हमारी जिम्मेदारी है।
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यह संदेश मासूमों ने चबूतरा थियेटर फेस्टिवल के तहत मंचित नाटक ‘फर्ज या बोझ’ में दिया।
मदर सेवा संस्थान की ओर से संचालित चबूतरा थियेटर में सोमवार को प्रियदर्शनी कॉलोनी के बच्चों ने नाट्य प्रस्तुति दी।
बुजुर्गों को बेइज्जत करना बड़े शहरों में आम बात है। विजय और उसकी पत्नी अपनी बूढ़ी मां से घर के काम करवाते हैं।
हालात कुछ ऐसे होते हैं कि वे बुजुर्ग मां-बाप को कुंभ छोड़ आते हैं, जहां भगदड़ में उनकी मौत हो जाती है।
इसकी खबर मिलने पर पोते अरु और आयुष अपने मां-बाप को ही दोषी मानते हुए घर छोड़कर चले जाते हैं। ढुंढाई होती है, पर बच्चे मां-बाप के पास वापस आने से मना कर देते हैं।
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बच्चों से बेहतरीन अभिनय कराने में निर्देशक महेश चंद्र देवा सफल रहे। उनके निर्देशन में कसावट व परिपक्वता नजर आई।
वहीं, बच्चों ने जनवादी गीत ‘नफस-नफस’ व ‘उठा है तूफान जमाना बदल रहा’ और ‘तू जिंदा है जिंदगी की जीत पर यकीन कर’ शलभ श्रीराम, कांति मोहन ने सुनाया।
‘राधा कैसे न जले...’, ‘जो भेजी थी दुआ...’ व ‘तुझमें रब दिखता है..’ फिल्मी गीतों पर बच्चों ने नृत्य भी पेश किया।