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लोकतंत्र का उत्सव : सिर्फ एक चेहरे और एमवाई फैक्टर से सत्ता तक पहुंचना नामुमकिन, कारगर नहीं हुई अखिलेश की रणनीति
Thu, 10 Mar 2022 04:46 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
अजित बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ
अजित बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Thu, 10 Mar 2022 04:46 PM IST
सार
सत्ता तक पहुंचने के लिए सपा के जाति-धर्म के समीकरण साधने के प्रयास अखिलेश की उम्मीद के मुताबिक छाप न छोड़ सके। पुरानी पेंशन स्कीम और 300 यूनिट बिजली फ्री देने का उनका वादा भी बेअसर रहा।
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अखिलेश यादव, मायावती व प्रियंका गांधी वाड्रा।
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
विधानसभा चुनाव के नतीजे जहां योगी आदित्यनाथ के ‘शासन और राशन’ की नीति पर मुहर लगा गए, वहीं विपक्षी दलों के लिए सबक भी दे गए। मुस्लिम और यादव (एमवाई) मतदाताओं में अन्य जातियों का वोट जोड़ने की सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की रणनीति ज्यादातर सीटों पर कारगर नहीं हुई। हालांकि यह जरूर कहा जाएगा कि मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर सपा मजबूती से लड़ी। चुनाव नतीजों से जहां बसपा और उसकी प्रमुख मायावती की जनता से दूरी की पुष्टि हुई। वहीं प्रियंका गांधी के रूप में कांग्रेस का ट्रंप कार्ड भी धराशायी हो गया।
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शायद ही किसी को संदेह हो कि भाजपा की लाभार्थीपरक योजनाओं और बेहतर कानून-व्यवस्था ने उसकी जीत की पटकथा लिखी। सत्ता तक पहुंचने के लिए सपा के जाति-धर्म के समीकरण साधने के प्रयास अखिलेश की उम्मीद के मुताबिक छाप न छोड़ सके। पुरानी पेंशन स्कीम और 300 यूनिट बिजली फ्री देने का उनका वादा भी बेअसर रहा। जबकि चुनाव से पहले विश्लेषक इसे अत्यधिक प्रभावी मुद्दा बता रहे थे। इस लिहाज से सपा के लिए सबसे नकारात्मक पक्ष रहा- पार्टी में ‘वन मैन शो’। भाजपा में जहां दिग्गज प्रचारकों की फौज रही, वहीं सपा के प्रचार में अखिलेश के अलावा कोई दूसरा प्रमुख चेहरा नहीं दिखा। यहां तक कि उनके चाचा और अच्छे संगठनकर्ता माने जाने वाले शिवपाल यादव भी नहीं दिखे।
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अखिलेश शुरू से ही मानकर चल रहे थे कि एमवाई फैक्टर उनके साथ है। इसलिए उन्होंने सपा के सिंबल पर अधिकतर गैर मुस्लिम और गैर यादव प्रत्याशी दिए। इसके पीछे रणनीति यह थी कि ये गैर मुस्लिम और गैर यादव प्रत्याशी अपनी-अपनी जातियों का और अपना जनाधार ‘प्लस’ करके सपा को बढ़त दिलाएंगे। लेकिन नतीजों से साफ हो गया कि अन्य जातियों में पैठ बनाने के लिए सपा के अब तक के प्रयास पर्याप्त नहीं है। साथ ही अन्य जातियों को जोड़े बिना सपा का सत्ता पाने का सपना पूरा भी नहीं होगा। स्थानीय स्तर पर सपा का कमजोर सांगठनिक ढांचा भी उसकी हार के लिए कम जिम्मेदार नहीं माना जाएगा। इस चुनाव में सपा के मत प्रतिशत और जीती सीटों से यह भी स्पष्ट हो गया कि जो मतदाता भाजपा से दूर हैं, उनमें से अधिकांश की पसंद सपा ही है।
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कांग्रेस के चुनावी इतिहास का सबसे खराब नतीजा
कांग्रेस के लिए नतीजे उसके चुनावी इतिहास का सबसे खराब अनुभव साबित हुए। पार्टी के लिए यह चुनाव वर्ष 2017 के चुनाव से भी निराशाजनक रहा। मत प्रतिशत और सीटों के लिहाज से कांग्रेस पिछली बार से भी नीचे आ गई। यहां लोकसभा चुनाव से ही कांग्रेस ने प्रियंका गांधी वाड्रा को उतारा था। उनका ‘लड़की हूं-लड़ सकती हूं’ अभियान, रोजगार देने और मुफ्त स्मार्ट फोन व स्कूटी देने का वादा एकदम बेअसर रहा। जनादेश ने यह साबित कर दिया कि कांग्रेस के बड़े नेताओं का राजनीतिक पर्यटन यूपी में उसे मजबूत नहीं कर सकता। अगर वे यहां अपनी जमीन तैयार करना चाहते हैं तो उन्हें यहां टिककर जनता के बीच रहना होगा। कानून-व्यवस्था से जुड़े चुनिंदा मुद्दों पर संघर्ष करने के लिए आना और फिर चले जाना मतदाताओं को रास नहीं आ रहा है। कांग्रेस ने पुराने नेताओं को जिस तरह से साइड लाइन किया, उससे उनका पुराना परंपरागत वोट बैंक तो खिसका ही, नया नेतृत्व कुछ खास नहीं कर पाया। कांग्रेस के नेता भी स्वीकार करते हैं कि प्रियंका से मिलने के लिए ‘सिंगल प्वाइंट एंट्री’ यानी एक ही व्यक्ति के माध्यम से मिलने की व्यवस्था ने भी कांग्रेस को रसातल में पहुंचा दिया।
दलित वोटरों ने ढूंढे़ दूसरे ठिकाने
चुनाव नतीजों से यह भी स्पष्ट हो गया कि बसपा सुप्रीमो मायावती अपना दलित वोट बैंक भी बचाने में नाकाम रहीं। बसपा की कमजोर होती ताकत आम दलित मतदाता भी महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव में इसके एक बड़े हिस्से ने भाजपा या सपा में अपना नया ठिकाना ढूंढ़ा।