सीबीआई के सामने आया पुलिस का झूठ, जला दिए गए आईएएस अनुराग के कपड़े
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
यही नहीं, पुलिस आईएएस के परिवारीजनों से कपड़े सुरक्षित रखे होने की बात भी करती रही। सीबीआई ने जब कपड़ों के बारे में पड़ताल की तो पता चला कि पोस्टमार्टम हाउस के कर्मचारियों ने उन्हें जला दिया था।
अब अनुराग के कपड़ों को लेकर पुलिस और आईएएस के परिवारीजन आमने-सामने आ गए हैं। मौत की जांच कर रही सीबीआई ने जब कपड़ों के बारे में पूछा तो हजरतगंज कोतवाली की पुलिस बगलें झांकने लगी।
पहले तो काफी देर तक यह तय नहीं हो सका कि कपड़े सुरक्षित रखे गए हैं या नहीं? अगर सुरक्षित हैं तो कहां हैं? किसके पास हैं? पुलिस ने कपड़ों की तलाश की लेकिन कुछ पता नहीं लगा।
पोस्टमार्टम हाउस पर छानबीन की गई तो खुलासा हुआ कि परिवारीजनों को शव सौंपने के बाद कर्मचारियों ने कपड़े जला दिए थे। आईएएस अफसर के कपड़े उनकी मौत की जांच में अहम भूमिका निभा सकते थे।
पुलिस पर गुमराह करने का आरोप
कुर्ते में लगे खून, पसीने अथवा अन्य प्रकार के स्पॉट की फोरेंसिक जांच में कोई नया रहस्य खुल सकता था। अनुराग के लोवर में यूरीन के निशान से भी घटनाक्रम में रोशनी पड़ती। सीबीआई ने कपड़े नष्ट करने पर कड़ी नाराजगी जताई है।
यह जानकारी अनुराग के परिवारीजनों को मिली तो वे भी भड़क गए। बड़े भाई मयंक ने पुलिस पर गुमराह करने का आरोप लगाया। कहा कि पोस्टमार्टम के बाद ही उन्होंने पैनल में शामिल डॉक्टरों से कपड़ों के लिए पूछा था।
इस पर डॉक्टरों ने कपड़े और पोस्टमार्टम रिपोर्ट एसएसपी ऑफिस भेजने की जानकारी दी थी। बकौल मयंक, 19 मई को उसने हजरतगंज इंस्पेक्टर आनंद कुमार शाही को बहराइच से फोन कर कपड़ों के बारे में पूछा तो उन्होंने कपड़े सुरक्षित रखे होने की बात कही।
इसके बाद जब परिवारीजन एफआईआर कराने लखनऊ आए और एसएसपी दीपक कुमार से मिले तब भी कपड़ों के बारे में बातचीत हुई। मयंक का कहना है कि एसएसपी ने कपड़े पुलिस के पास रखे होने की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि अगर परिवार चाहे तो कपड़े ले जा सकता है।
इस पर मयंक ने कपड़ों के पुलिस के पास ही ज्यादा सुरक्षित होने की बात कहते हुए इन्कार कर दिया था। अब कपड़ों के पोस्टमार्टम के बाद ही नष्ट करने की बात से परिवार को झटका लगा है। मयंक का कहना है कि कपड़े अगर नष्ट कर दिए गए थे तो पुलिस को पहले ही बता देना चाहिए था।
पुलिस उन्हें गुमराह करती रही जिससे यह शक हो रहा है कि कहीं अनुराग की हत्या की साजिश में लखनऊ पुलिस भी तो शामिल नहीं है। मयंक ने कहा, आखिर पुलिस किसे बचाना चाहती है?
पुलिस और डॉक्टरों की लापरवाही से नष्ट हुए कपड़े
लेकिन पंचनामा के कागजात में पुलिस ने कपड़े सुरक्षित रखने की बात नहीं लिखी। इसके बाद भी अगर पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों को लगता है कि जांच के लिए कपड़े सुरक्षित रखने चाहिए तो वह इस बाबत निर्देश देते हैं।
पर, इस मामले में पुलिस ने न तो लिखकर दिया, न ही डॉक्टरों ने इसकी आवश्यकता जताई। नतीजतन पोस्टमार्टम हाउस के कर्मचारियों ने कपड़े जला दिए। मयंक ने कहा, विसरा की जांच लखनऊ के अलावा किसी अन्य लैब से कराने की मांग पर एसएसपी दीपक कुमार ने दो लैब से अलग-अलग जांच कराने की बात कही थी।
हालांकि, उन्होंने सिर्फ चंडीगढ़ की सेंट्रल लैब में ही विसरा भेजकर खानापूरी कर ली। अगर जांच दो लैब से कराई जाती तो नतीजे अलग आते। एसएसपी को अपनी मर्जी से जांच करानी थी तो परिवारीजनों से विसरा के नमूने दो लैब भेजने की बात क्यों कही थी?
साजिश की आशंका
उनकी गर्दन ट्रक के पहिये से चंद सेंटीमीटर दूर थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने अनुराग की हत्या कर अथवा बेहोशी की हालत में ट्रक के पहिये के सामने फेंक दिया हो। शव ऐसी अवस्था में पड़ा था कि ट्रक में बैठे ड्राइवर व अन्य लोगों को नजर नहीं आता।
ऐसे में अगर ड्राइवर ट्रक स्टार्ट करके आगे बढ़ता तो नीचे उनका शरीर कुचल जाता। सीबीआई को आशंका है कि आईएएस का शव सोची-समझी साजिश के तहत डाला गया था।
ऐसा होने पर पुलिस और जांच एजेंसियां इसे साधारण हादसा मानते हुए जांच करतीं। सूत्रों के अनुसार, ट्रक जवाहर भवन की कैंटीन आया था। रात को नो एंट्री खुलने पर ट्रक किसी वक्त श्रीराम टॉवर से होते हुए जवाहर भवन के पहले ही सड़क किनारे रुक गया था।