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उपचुनाव में सपा ने आजम से किया किनारा!

Thu, 04 Sep 2014 11:26 AM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 04 Sep 2014 11:26 AM IST
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bypoll in UP will show the formula of success in election.

विधानसभा की 11 सीटों पर उपचुनाव के नतीजे प्रदेश की राजनीति के लिए नजीर बन सकते हैं। सपा जहां फायर ब्रांड नेता आजम खां से दूरी बनाकर चुनाव लड़ रही है, वहीं भाजपा का सारा दारोमदार वोटों के ध्रुवीकरण पर है।

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इसके लिए ‘लव जेहाद’ मुद्दे को भी जोर-शोर से उछाला जा रहा है। नतीजों से साबित होगा कि कौन सी धारा इक्कीस पड़ती है। इन उपचुनावों में जिस दल का प्रयोग सफल रहेगा, उसे आने वाले विधानसभा चुनावों में दोहराया जा सकता है।
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सूबे में विधानसभा की जिन 11 सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं, उनमें 10 भाजपा और एक उसके सहयोगी अपना दल विधायक के इस्तीफे से खाली हुई हैं। ये सभी सांसद चुन लिए गए हैं।

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भावनात्मक मुद्दों पर ध्रुवीकरण करेगी भाजपा

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मैनपुरी लोकसभा सीट सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के इस्तीफे से खाली हुई है। सपा ने विधानसभा की 11 और लोकसभा की मैनपुरी सीट पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। सपा नहीं चाहती कि भाजपा को उपचुनावों में वोटों के ध्रुवीकरण का कोई मौका मिले। इसीलिए मुस्लिमों को कम टिकट दिए गए हैं।

वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री आजम खां को भी पार्टी ने उपचुनाव में अहम जिम्मेदारी से अलग कर रखा है। आजम ने खुद भी उपचुनाव वाले किसी भी क्षेत्र में अभी तक सक्रियता नहीं दिखाई है।

इसके विपरीत भाजपा पूरी तरह ध्रुवीकरण की लाइन पर काम कर रही है। उपचुनावों में गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ को आगे किया जा रहा है। वे भाजपा की गरमपंथी लाइन के हैं। ‘लेव जेहाद’ और मुस्लिमों की ज्यादा आबादी वाले क्षेत्रों में दंगे को लेकर उनके हाल के बयान चर्चा में हैं।

एक तरह से भाजपा ने साफ कर दिया है कि वह भावनात्मक मुद्दों से वोटों का ध्रुवीकरण करेगी। प्राय: सभी सीटों पर भाजपा और सपा के बीच सीधा मुकाबला माना जा रहा है। नतीजे जिस दल के अनुकूल रहेंगे, वे आने वाले समय में इन उपचुनावों के अनुभव और रणनीति का उपयोग करेंगे।

सपा ने उतारा केवल एक मुस्लिम प्रत्याशी

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सपा ने उपचुनावों में प्रत्याशियों के चयन में खास सावधानी बरती है। उसने केवल ठाकुरद्वारा विधानसभा सीट पर मुस्लिम प्रत्याशी उतारा है। वर्ष 2012 में सपा ने सहारनपुर, बलहा और निघासन में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। बिजनौर, सहारनपुर जैसी सीटें, जहां 30-40 फीसदी मुस्लिम वोट हैं, सपा ने हिंदू प्रत्याशी को वरीयता दी है।

विधानसभा की इन सीटों पर हो रहा उपचुनाव
लखनऊ (पूर्वी), बिजनौर, सहारनपुर, नोएडा, ठाकुरद्वारा, निघासन, चरखारी, महोबा, बलहा, सिराथू, रोहनिया।

राजनीति में बोली जा रही दो भाषाएं

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लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एसके द्विवेदी कहते हैं कि आजादी के इतने बरसों बाद भी अवसरवादी राजनीति चल रही है। जाति-धर्म के नाम पर वोटों का ध्रुवीकरण दुर्भाग्यपूर्ण है। भाजपा चाहती है कि हिंदू वोटों का बंटवारा न हो लेकिन सपा की नजर मुस्लिमों के साथ हिंदू वोटों पर भी है। आजम खां बनाम कल्बे जव्वाद से सपा को कुछ नुकसान हो सकता है।

इसकी भरपाई के लिए उसकी रणनीति हिंदू वोट के एक हिस्से को प्रभावित करने की है। शायद मुस्लिम प्रत्याशी कम उतारने की वजह भी यही है। चुनाव के दौरान योगी आदित्यनाथ के विवादित बयान सामने आए हैं। यह उचित नहीं है। क्या उन्होंने कोई शोध किया है कि जहां मुस्लिमों की आबादी 10 फीसदी से ज्यादा है, वहां दंगे होते हैं?

भारत में राजनीति की दो भाषाएं हैं, पारंपरिक और आधुनिक। पारंपरिक भाषा में जाति, धर्म, संप्रदाय को ध्यान में रखा जाता है और आधुनिक भाषा में स्वतंत्रता, समानता और पंथनिरपेक्षता की बात आती है। दुर्भाग्य से अभी पारंपरिक भाषा ही बोली जा रही है।

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