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Lucknow News: विध्वंस आदेश के खिलाफ भवन मालिक की याचिका खारिज
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हाईकोर्ट।
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लखनऊ। हाईकोर्ट ने अलीगंज अग्निकांड मामले में इमारत के मालिक की याचिका पर सुनवाई से इन्कार कर दिया है। याचिका में लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) के विध्वंस आदेश और बाद की कार्रवाई को चुनौती दी गई थी। न्यायालय ने भवन के सह-मालिक बीरेंद्र प्रसाद शुक्ला को कानून के तहत उपलब्ध अपील का वैधानिक उपाय अपनाने की अनुमति दी है। शुक्ला ने एलडीए के 10 जुलाई के विध्वंस आदेश, 25 जुलाई को हुए विध्वंस और 26,14,210 रुपये की लागत की मांग को चुनौती दी है।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 27(2) के तहत वैकल्पिक वैधानिक उपाय उपलब्ध है। न्यायालय ने याचिकाकर्ता को विध्वंस आदेश के विरुद्ध एक सप्ताह के भीतर अपील दायर करने की अनुमति दी है। इससे उसे कानून के तहत अनुमत राहत प्राप्त हो सकेगी। कोर्ट ने कहा कि अपील को समय सीमा या विलंब के आधार पर खारिज नहीं किया जाएगा।
याचिकाकर्ता के तर्क
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि विध्वंस आदेश के बाद मालिक को स्वयं भवन ध्वस्त करने के लिए 15 दिन का समय मिलना चाहिए। यह अवधि विध्वंस नोटिस की तामील की तारीख से गिनी जाती है। याचिकाकर्ता के अनुसार, आदेश 10 जुलाई को जारी हुआ और 13 जुलाई को तामील किया गया था, लेकिन 15 दिन की अवधि समाप्त होने से पहले ही 25 जुलाई को इमारत ध्वस्त कर दी गई। वहीं, उसे शुरुआत में विध्वंस आदेश की प्रमाणित प्रति भी नहीं दी गई थी।
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एलडीए का पक्ष
एलडीए के वकील ने बताया कि धारा 27(1) के तहत नोटिस 23 जून को जारी हुआ था। आपत्तियां 8 जुलाई को दर्ज की गईं और 10 जुलाई को विध्वंस आदेश पारित हुआ। आदेश परिसर में चिपकाया गया था और उसकी एक प्रति 13 जुलाई को याचिकाकर्ता को दी गई। एलडीए ने बताया कि आदेश चिपकाने की तारीख से 15 दिन इंतजार करने के बाद 25 जुलाई को इमारत ध्वस्त की गई।
न्यायालय की टिप्पणी
न्यायालय ने कहा कि विध्वंस से पहले अपील दायर करना बेहतर होता। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि इमारत गिराए जाने के बावजूद, वैधानिक अपील दायर होने पर विध्वंस आदेश की वैधता पर विचार हो सकता है। यदि विध्वंस आदेश अवैध पाया जाता है, तो उसे रद्द किया जा सकता है। याचिकाकर्ता आवश्यकता पड़ने पर एलडीए या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध उचित न्यायालय में राहत मांग सकता है। न्यायालय ने यह प्रश्न खुला रखा कि क्या विध्वंस आदेश कानून के अनुसार तामील हुआ था।
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न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 27(2) के तहत वैकल्पिक वैधानिक उपाय उपलब्ध है। न्यायालय ने याचिकाकर्ता को विध्वंस आदेश के विरुद्ध एक सप्ताह के भीतर अपील दायर करने की अनुमति दी है। इससे उसे कानून के तहत अनुमत राहत प्राप्त हो सकेगी। कोर्ट ने कहा कि अपील को समय सीमा या विलंब के आधार पर खारिज नहीं किया जाएगा।
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याचिकाकर्ता के तर्क
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि विध्वंस आदेश के बाद मालिक को स्वयं भवन ध्वस्त करने के लिए 15 दिन का समय मिलना चाहिए। यह अवधि विध्वंस नोटिस की तामील की तारीख से गिनी जाती है। याचिकाकर्ता के अनुसार, आदेश 10 जुलाई को जारी हुआ और 13 जुलाई को तामील किया गया था, लेकिन 15 दिन की अवधि समाप्त होने से पहले ही 25 जुलाई को इमारत ध्वस्त कर दी गई। वहीं, उसे शुरुआत में विध्वंस आदेश की प्रमाणित प्रति भी नहीं दी गई थी।
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एलडीए का पक्ष
एलडीए के वकील ने बताया कि धारा 27(1) के तहत नोटिस 23 जून को जारी हुआ था। आपत्तियां 8 जुलाई को दर्ज की गईं और 10 जुलाई को विध्वंस आदेश पारित हुआ। आदेश परिसर में चिपकाया गया था और उसकी एक प्रति 13 जुलाई को याचिकाकर्ता को दी गई। एलडीए ने बताया कि आदेश चिपकाने की तारीख से 15 दिन इंतजार करने के बाद 25 जुलाई को इमारत ध्वस्त की गई।
न्यायालय की टिप्पणी
न्यायालय ने कहा कि विध्वंस से पहले अपील दायर करना बेहतर होता। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि इमारत गिराए जाने के बावजूद, वैधानिक अपील दायर होने पर विध्वंस आदेश की वैधता पर विचार हो सकता है। यदि विध्वंस आदेश अवैध पाया जाता है, तो उसे रद्द किया जा सकता है। याचिकाकर्ता आवश्यकता पड़ने पर एलडीए या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध उचित न्यायालय में राहत मांग सकता है। न्यायालय ने यह प्रश्न खुला रखा कि क्या विध्वंस आदेश कानून के अनुसार तामील हुआ था।