UP के नौकरशाह: बजट लेने में हीरो, खर्च में ‘जीरो’
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बजट हजार करोड़ में। खर्च करने का वक्त बीत गया सात महीने से ज्यादा। इस बीच करीब 58 फीसदी बजट खर्च हो जाना चाहिए, मगर भारी-भरकम बजट लेने वाले ‘लीडर’ विभागों में से किसी ने खर्च किया 30 फीसदी तो किसी ने 35 फीसदी। कई विभाग तो 15 से 20 फीसदी पर ही अटके हुए हैं। वहीं, अपेक्षाकृत कम बजट वाले विभागों ने वित्तीय स्वीकृतियां जारी करने में खासी तेजी दिखाई है जिससे कुल बजट खर्च संतुलित नजर आ रहा है।
वित्त वर्ष 2014-15 के सात महीने से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन नगर विकास, आवास, मुस्लिम वक्फ, कृषि, चिकित्सा, समाज कल्याण सहित कई विभाग बजट खर्च में उदासीन बने हुए हैं। इनमें कई विभागों का बजट कई-कई हजार करोड़ रुपये है। अंदाजा लगा सकते हैं कि जब बजट ही समय से जारी नहीं होगा तो जनता को उसका फायदा कैसे मिल सकेगा।
कोषवाणी पर विभागवार स्वीकृत बजट और खर्च का ब्यौरा इन विभागों के कामकाज की हकीकत बयां कर रहा है। हालांकि, वित्त व नियोजन विभाग के अफसरों का कहना है कि वे केवल प्लान मद में आवंटित बजट की वित्तीय स्वीकृतियों पर ही नजर रखते हैं।
राज्य सेक्टर के कुल बजट का 65 फीसदी जबकि केंद्रीय सेक्टर का 44 प्रतिशत खर्च हो चुका है। पिछले वर्षों की अपेक्षा यह उपलब्धि उत्साहवर्धक है। हालांकि कुछ विभागों में सुस्ती जरूर है, लेकिन उसके लिए केंद्र से बजट मिलने में देरी जिम्मेदार है।
जानें, कितना मिला और कितना खर्च हुआ
सरकार ने करीब दो महीने पहले वित्तीय स्वीकृतियां तेजी से जारी कराने के लिए पांच करोड़ तक का अधिकार विभागों को दे दिया था। सामान्यत: कम बजट वाले विभागों में इसका फायदा नजर आने लगा है। कई बड़े विभागों ने भी तेजी से स्वीकृतियां जारी की हैं। पिछले महीने तक काफी कम स्वीकृतियां जारी करने वाले कई विभागों ने अपनी स्थिति में अच्छा सुधार किया है।
प्रमुख विभागों को मिले बजट और खर्च की हकीकत
विभाग - आवास विभाग
बजट - 1238.22 करोड़
खर्च: 35.14%
विभाग - नगर विकास विभाग
बजट - 6586.36 करोड़
खर्च: 15.32%
मुस्लिम वक्फ विभाग
बजट - 2694.91 करोड़
खर्च : 13.17 %
कृषि (सहकारिता)
बजट - 1084 करोड़
खर्च : 28.99 %
चिकित्सा विभाग (परिवार कल्याण)
बजट : 4677.86 करोड़
खर्च - 28.88%
समाज कल्याण (अनुसूचित जातियों के लिए विशेष घटक योजना)
बजट : 16007.15 करोड़
खर्च - 26.94%
समाज, वित्त और खाद्य विभाग में खर्च हुआ बजट
बजट : 5070.96 करोड़
खर्च - 7%
समाज कल्याण (नि:शक्त एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण)
बजट : 1624.28 करोड़
खर्च - 16.38%
वित्त विभाग : ऋण सेवा एवं अन्य खर्च
बजट : 58824.96 करोड़
खर्च - 11.65%
खाद्य तथा रसद
बजट : 8466.65 करोड़
खर्च - 39.12%
व्यवसायिक शिक्षा
बजट : 601 करोड़
खर्च - 36.26%
50 प्रतिशत से ज्यादा बजट खर्च करने वाले प्रमुख विभाग
विभाग--खर्च (प्रतिशत में)
वित्त विभाग (लेखा परीक्षा अल्प बचत)--69.45
माध्यमिक शिक्षा--60.26
प्राथमिक शिक्षा--53.21
उच्च शिक्षा--57.62
आबकारी--83.68
उद्योग भारी एवं मध्यम उद्योग--61.19
पशुधन--79.25
गन्ना विकास-चीनी उद्योग--88.27
गृह विभाग (पुलिस)--74.27
चिकित्सा विभाग (एलोपैथी)--55.72
श्रम विभाग (सेवायोजन)--66.90
श्रम विभाग (श्रम कल्याण)--60.30
वन विभाग--53.23
स्रोत : कोषवाणी (16 नवंबर 2014)
बार-बार बदलने का रवैया भी जिम्मेदार
इस पर लखनऊ विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. मनोज अग्रवाल कहते हैं कि विभागाध्यक्षों को पिछले कई साल से बजट खर्च करने में सुस्ती से गवर्नेंस में कमी साफ नजर आ रही है। बार-बार विभागाध्यक्षों का बदलना भी इसकी एक बड़ी वजह है। जब तक एक अधिकारी कोई रणनीति बनाता है, दूसरा आ जाता है।
जब तक वह कुछ सोचे, उसे भी हटा दिया जाता है। इसका सीधा असर कामकाज पर पड़ता है। बड़े-बड़े विभागों में बजट खर्च होने की सुस्त रफ्तार की वजह से ही सूबे में कई अच्छी योजनाओं और काम के बावजूद सरकार को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा है।
बजट पास करने और योजनाओं का प्रचार करने भर से बात नहीं बन सकती। समय से बजट का उपयोग न होने पर जनता एक समय बाद ऐसे दावों को खोखला मानने लगती है।