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नसीमुद्दीन के जाने से मुस्लिमों के बीच कमजोर होगी बसपा की जमीन!

Fri, 12 May 2017 01:47 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 12 May 2017 01:47 AM IST
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BSP to be weak among muslims in uttar pradesh.
- फोटो : अमर उजाला

बसपा सुप्रीमो मायावती भले ही नसीमुद्दीन सिद्दीकी को निकालने से संगठन की सेहत पर कोई फर्क न पड़ने का दावा कर रही हों, लेकिन जमीनी सच्चाई उनके दावे की पोल खोल रहा है।

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सामाजिक धरातल पर पार्टी की सेहत गड़बड़ा गई है। थोड़ा पीछे जाएं और बसपा से जुदा हुए चेहरों के आधार पर आकलन करें तो हकीकत साफ दिखती है।

नसीमुद्दीन के बाहर होने से मुस्लिम वोटों के बीच बसपा की पकड़ व पहुंच मजबूत करने के लिए पार्टी को बहुत मेहनत करनी होगी।

नसीमुद्दीन लंबे अरसे से बसपा के मुस्लिम चेहरे थे। उन्हें पास सबसे अहम जिम्मेदारियां थी। टिकट वितरण में उनकी राय को सबसे ज्यादा तरजीह मिलती थी। मुस्लिमों के मामले में उनकी राय आखिरी थी।

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सपा को पहली पसंद मानते हैं मुस्लिम

BSP to be weak among muslims in uttar pradesh.
सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव - फोटो : amar ujala

उन्होंने जिस तरह से मायावती पर मुसलमानों को गद्दा कहने, दाढ़ी वालों का अपमान करने के आरोप लगाए हैं, उसका कुछ तो असर होगा। यूं भी मुसलमान यूपी में बसपा के बजाय सपा को पहली पसंद मानते रहे हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में सर्वाधिक टिकट देने, मुसलमानों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने के बावजूद उन्हें मुस्लिम समाज का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका।

नसीमुद्दीन के आरोपों के बाद मायावती को फिर सफाई देनी पड़ेगी। चुनाव के दौरान मेरठ की रैली की एक कई साल पुरानी आडियो क्लिप खूब वायरल हुई थी।

इसमें मुसलमानों के प्रति कथित प्रतिकूल टिप्पणी को लेकर बसपाइयों को सफाई देनी पड़ी थी। इस लिहाज से मुस्लिम वोटों की लामबंदी को बसपा को काफी पापड़ बेलने पड़ेंगे।

चुनाव में दूर हुए अति पिछड़ों

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बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : amar ujala

यदि वर्ष 2012 से अब तक बसपा से स्वामी प्रसाद मौर्य, बाबू सिंह कुशवाहा, जुगुल किशोर, दीनानाथ भाष्कर, दद्दू प्रसाद, आरके चौधरी जैसे प्रमुख नेता अलग हो चुके हैं।

इन चेहरों का आकलन अगर जातियों के आधार पर करें तो स्थिति काफी हद तक साफ हो जाती है।

2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा को अति पिछड़ी और अति दलित जातियों के बीच नुकसान हुआ है।

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