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नखलऊवा पंचः क्रांतिकारियों का बम कारखाना जिसे पकड़ न सकी अंग्रेजी हुकूमत

Thu, 18 Apr 2019 03:19 PM IST
Amulya Rastogi अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Amulya Rastogi Updated Thu, 18 Apr 2019 03:19 PM IST
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british rulers could not catch bomb factory of freedom fighters
डेमो
बात 1930 की है। देश की आजादी की लड़ाई चल रही थी। क्रांति के दीवाने हंसते-हंसते मौत को गले लगा रहे थे। उस जमाने में रामाधीन निगम उत्तर प्रदेश में (रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) के संचालक थे और चरखारी नरेश के आग्रह पर रामाधीन निगम ने लखनऊ शहर में बम बनाने वाले वाला कारखाना स्थापित किया।
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एक हुसैनाबाद और दूसरा कश्मीरी मोहल्ले में। दोनों मकान किराए पर थे और मुस्लिम बस्तियों के ठीक बीचों-बीच। इन मकानों में दल के सदस्य मुस्लिम वेशभूषा में रहने लगे। बम बनाने की समस्त सामग्री, कारतूस, रिवॉल्वर, पिस्तौल, साइक्लोस्टाइल मशीन सभी कुछ था।
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उस जमाने में संयुक्त प्रांत गुप्तचर विभाग का प्रधान कार्यालय इलाहाबाद था और लखनऊ में ग्रुप अफसर की हैसियत से तैनात थे सीआईडी इंस्पेक्टर अहमद हुसैन खां। ‘क्रांति आंदोलन: कुछ अधखुले पन्ने’ किताब के प्रसंग से पता चलता है, ‘क्रांतिकारियों के लिए जिस मकान में बम बनते थे उसके बगल में हुसैन के ससुर रहा करते थे। नाम था उनका मुर्तजा हुसैन।
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अंग्रेज हुकूमत ने लाख सिर पटका, लेकिन मकान पर कुछ नहीं मिला

उन्हें शक हुआ तो उन्होंने यह बात दामाद अहमद को बताई। अहमद ने इस दल के एक सदस्य केडी चौधरी को तोड़ लिया, जिससे बातचीत के बाद ससुर की सूचना सही साबित हो गई। इधर निगम को शक हो गया कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ हो गया है। उन्होंने झोले में दो शीशे के बम रखे और रास्ते में खड़े हो गए। साथ ही मकान का सारा सामान हटवा दिया।

कुछ देर बाद निगम को एक तांगा आता दिखा। जिस पर सीआईडी अफसर अहमद हुसैन बैठे थे। निगम ने सिर में तौलिया लपेटा और झाड़ी के किनारे खड़े हो गए। इसी बीच तांगा सामने सड़क से गुजरा। आगे तांगा हांकने वाला बैठा था। पीछे बैठे थे अहमद हुसैन। हुसैन ने निगम को देख लिया। उन्होंने रिवॉल्वर निकालने के लिए शेरवानी में हाथ डाला ही था कि निगम ने एक बम सीधे उन पर मारा। हुसैन के दोनों पैर उड़ गए। अंग्रेज हुकूमत ने लाख सिर पटका, लेकिन मकान पर कुछ नहीं मिला।
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