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...तो इसलिए सिर्फ सपा से ही मुकाबला चाहती है भाजपा

Fri, 27 May 2016 02:28 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 27 May 2016 02:28 AM IST
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 BJP wants SP as competitor in UP election.

भाजपा ने सूबे में 2017 के चुनावी समीकरणों के लिए गोटें सजानी शुरू कर दी हैं। मोदी सरकार के दो साल पूरे होने पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का सपा से मुकाबले की बात कहना और सूबे में सपा को मजबूत बताना इसी का हिस्सा है।

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उन्होंने यह बात सोची-समझी रणनीति के तहत कही है। इसमें भगवा रणनीतिकारों की उत्तर प्रदेश में राम मंदिर का नाम लिए बगैर ध्रुवीकरण के आधार पर वोट पाने की बेचैनी तो सपा विरोधी वोटों में सेंध लगाने की बसपा की कोशिशों को रोकने की छटपटाहट छिपी है।
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इन्हें उत्तर प्रदेश के सामाजिक समीकरणों में भाजपा के लिए सपा से ही मुकाबला दिखाना मुफीद लग रहा है। इसीलिए शाह के जरिये इसकी पहल करा दी गई है। इन रणनीतिकारों का आकलन है कि आने वाले दिनों में मुस्लिम-यादव समीकरणों के सहारे जीत की खातिर सपा अपनी मुस्लिम हितैषी छवि को और धार देने की कोशिश करेगी।
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ऐसे में अगर भाजपा की तरफ से भी सपा की मजबूती का संदेश दे दिया जाए तो मुस्लिम मानस की सपा के पक्ष में आवाज और बुलंद हो सकती है, जिसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।

बिना बोले भाजपा की छवि हिंदुत्व हितैषी बनेगी। सपा विरोधी मतदाताओं के बीच अगर यह संदेश चला गया कि सूबे में भाजपा ही सपा को पटकनी दे सकती है तो फ्लोटिंग वोट का लाभ भी उसे मिल जाएगा।

भाजपा के पक्ष में बने माहौल को बनाए रखना है मकसद

 BJP wants SP as competitor in UP election.
अमित शाह

लोकसभा चुनाव में भाजपा को जिस तरह अतिपिछड़ों व अति दलितों का वोट मिला, उससे वह बहुत उत्साहित है। उसकी कोशिश है कि लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में बने सामाजिक समीकरणों को मजबूत बनाए रखा जाए।

लोगों के बीच यदि बसपा की मजबूती का संदेश गया तो भाजपा का गणित गड़बड़ा सकता है। इसीलिए उनकी तरफ से सपा से मुकाबले की बात कही जा रही है।

सपा को भी भाजपा की यह बात शूट करती है क्योंकि इससे अंतत: उसका भी लाभ होता दिख रहा है। तभी तो अतीत में सपा के कई नेताओं ने अलग-अलग मौकों पर सूबे में बसपा के हाशिए पर बताने वाले बयान दिए हैं।

बसपा को लाभ मिलने की संभावना से परेशान है भाजपा

 BJP wants SP as competitor in UP election.
mayawati

समाजशास्त्री प्रो. विमल कुमार कहते भी हैं कि देश में भाजपा के उभार के बाद मुस्लिम मतदाता इस पार्टी के उम्मीदवार को हराने की स्थिति में दिख रही पार्टी व प्रत्याशी को वोट करते हैं तो बसपा के उभरने के बाद दलित उस पार्टी व प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने के लिए जुटने लगे हैं जो उनके हितों की रक्षा कर सके। साथ ही सामाजिक स्तर पर उनके मान-सम्मान को बचा सके।

इसी बात को ध्यान में रखकर शाह ने यह बात कही है, जिससे वोटों की लामबंदी भाजपा और सपा के बीच हो सके। प्रो. कुमार की बात सही भी है। सभी मानते हैं कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की बेदाग छवि के बावजूद सपा सरकार कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर कठघरे में खड़ी है। लोगों में सपा शासन की कानून-व्यवस्था की तुलना बसपा शासन से होने लगी है।

भगवा रणनीतिकारों को लग रहा है कि इस चर्चा का चुनाव में बसपा को लाभ और भाजपा को नुकसान हो सकता है। हर चुनाव में माहौल देखकर मतदान करने वाले 25-30 प्रतिशत फ्लोटिंग वोटर्स को अगर यह लग गया कि सूबे में सपा और बसपा में ही मुकाबला होने के आसार हैं तो फिर भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। इसीलिए शाह ने सपा की मजबूती वाला बयान दिया है।

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