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यूपी जीतने के लिए कल्याण सिंह के ब्लू प्रिंट पर चल रही भाजपा

Sat, 21 Jan 2017 02:32 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 21 Jan 2017 02:32 AM IST
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 BJP strategy to win Uttar pradesh election.
कल्याण सिंह - फोटो : amar ujala

पौत्र व समर्थकों को टिकट दिलाने को लेकर कल्याण सिंह भले ही अपने गृहक्षेत्र में लोगों का विरोध झेल रहे हों, लेकिन भाजपा नेतृत्व उन्हीं की व्यूह रचना पर काम करता दिख रहा है, जिसने 1991 में उनके नेतृत्व में यूपी में बहुमत की सरकार बनवाई थी।

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2017 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा उम्मीदवारों की पहली सूची पर नजर डालें तो यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है।

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि 1991 में भाजपा की जीत में राम मंदिर लहर का बड़ा योगदान  था, लेकिन तथ्यों पर नजर डालें तो जीत के पीछे अगड़ा और अति पिछड़ा गठजोड़ का भी रोल कम नहीं था।
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पिछड़ों में लगभग 19 प्रतिशत हिस्सेदारी वाली यादव जाति के मुलायम सिंह के साथ लामबंद होने के बावजूद भाजपा ने कुल पड़े मतों में 31.45 प्रतिशत वोट के साथ 221 सीटें हासिल कर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।
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राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस जीत में भाजपा से कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री पद का चेहरा और तकरीबन 200 सीटों पर कुर्मी, लोध, काछी, कश्यप, तेली, मौर्य, कुशवाहा, सैनी, कुम्हार, जाट, राजभर व तेली जैसी अति पिछड़ी जातियों को उम्मीदवार बनाने का भी अहम रोल था।

लोकसभा चुनाव में भी काम आया था फॉर्मूला

 BJP strategy to win Uttar pradesh election.

ऐसा लगता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कल्याण फॉर्मूले की सफलता ने भाजपा का हौसला बढ़ा दिया है। गुजरात में 30 प्रतिशत अति पिछड़ी जातियों के सहारे तीन बार सरकार बना चुके नरेंद्र मोदी ने संभवत: प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने के साथ ही यूपी की चुनौती और चेतावनी को पूरी तरह समझ लिया था।

उन्होंने यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि यूपी में अगर मैदान मारना है तो गैर यादव पिछड़े वोटों को भाजपा के पक्ष में लामबंद करना पड़ेगा। शायद इसीलिए उन्होंने चुनाव पूर्व अपनी सभाओं में कल्याण सिंह को मंच पर न सिर्फ महत्वपूर्ण जगह दी थी बल्कि उनके सुझाव पर पार्टी के टिकटों का वितरण भी हुआ था।

लोकसभा की 80 में 17 आरक्षित सीटों के बाद बची 63 सीटों में से 24 पर अति पिछड़ों को टिकट दिए गए थे, जिनमें 23 उम्मीदवार विजयी रहे। लोकसभा चुनाव 2009 की तुलना में भाजपा के वोट प्रतिशत में 24.80 प्रतिशत इजाफा हुआ और यह 42.30 प्रतिशत पहुंच गया।

अभी तक घोषित सीटों में इस तरह दिये ‌टिकट

 BJP strategy to win Uttar pradesh election.

वर्ष 2002 से 2014 तक यूपी में वोटों का सूखा झेल चुकी भाजपा लोकसभा चुनाव में किए गए प्रयोग की सफलता से उत्साहित दिख रही है। भाजपा के 149 उम्मीदवारों की पहली सूची से अगर सुरक्षित 26 सीटें निकाल दें तो भाजपा के अति पिछड़ों को लामबंद करने की रणनीति को और अच्छी तरह समझा जा सकता है।

123 सामान्य सीटों में से 55 पर पार्टी ने पिछड़ों को उम्मीदवार बनाया है। इनमें लोध, जाट, सैनी, गूजर, तेली, मौर्य-शाक्य, कुर्मी कश्यप, निषाद, तेली व गड़रिया जैसी अति पिछड़ी बिरादरी 53 उम्मीदवार हैं। यह हिस्सेदारी कुल घोषित 149 सीटों में 36 प्रतिशत है।

हालांकि, सुरक्षित 26 सीटों को निकाल दें तो बची 123 सीटों में यह भागीदारी लगभग 44 प्रतिशत पहुंच जाती है। पार्टी के 14 उम्मीदवार जाट तो 12 प्रत्याशी लोध बिरादरी से हैं।

इसके अलावा सैनी व गूजर बिरादरी के पांच-पांच प्रत्याशी उतारे गए हैं। यादव के बाद पिछड़ों में अच्छी हिस्सेदारी रखने वाली कुर्मी बिरादरी के सात प्रत्याशी उतारे गए हैं। जिन जातियों को टिकट दिया गया है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी महत्वपूर्ण भागीदारी है।
 

कल्याण के फॉर्मूले पर ही विकास की बात कही थी

 BJP strategy to win Uttar pradesh election.

विधानसभा चुनाव का मैदान सजाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इटावा में गत अक्तूबर में संकल्प रैली करके शुरुआत की थी।

इसमें उन्होंने कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल को न सिर्फ याद किया, बल्कि यह भी कहा कि 2017 में यूपी में भाजपा की सरकार बनी तो कल्याण के नक्शे-कदम पर यूपी का विकास होगा। गुंडों व माफिया की जगह सिर्फ जेल में होगी।

सूत्रों की मानें तो यूपी के टिकटों को लेकर केंद्रीय चुनाव समिति के मंथन में पिछले दिनों शाह ने यूपी से जुडे़ एक केंद्रीय मंत्री के हस्तक्षेप को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कल्याण सिंह के बाद तो भाजपा यूपी में सपा व कांग्रेस के कुछ लोगों के साथ पी.आर. शिप के आधार पर चुनाव लड़ती रही है। इसी वजह से पार्टी अर्श से फर्श पर आ गई। इससे भी कल्याण के प्रभाव के बारे में समझा जा सकता है।

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