यूपी के लिए भाजपा तलाश रही नया चेहरा
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भाजपा ने विधानसभा व विधान परिषद में पार्टी का नेतृत्व करने के लिए नए चेहरों की तलाश शुरू कर दी है।
पर समीकरण समस्या बने हुए हैं। कहीं जातीय गणित आड़े आ रही है तो कहीं संबंधित व्यक्ति के तेवर फैसला लेने से रोक रहे हैं।
कहीं वरिष्ठता व कनिष्ठता का रोड़ा फैसला लेने की राह में मुसीबत बनी हुई है। कोई वरिष्ठ तो है लेकिन सभी विधायकों का समर्थन प्राप्त करने में असफल है।
हुकुम सिंह और नैपाल सिंह की जगह खाली
दरअसल, विधानसभा में भाजपा विधायक दल के नेता हुकुम सिंह और परिषद में पार्टी के नेता डॉ. नैपाल सिंह, दोनों लोग सांसद चुन लिए गए हैं।
इसके चलते पार्टी को इनके स्थान पर नए चेहरों का चयन करना है। विधानसभा में दावेदार तो कई हैं लेकिन कहीं सामाजिक समीकरण तो कहीं अनुभव का संकट खड़ा हो रहा है।
विधानसभा में सतीश महाना इस समय भाजपा विधायक दल के उप नेता हैं। इस नाते उनका नेता पद पर दावा भी बन रहा है।
पर, कुछ का तर्क है कि दोनों सदनों में पिछड़े वर्ग के हाथ में नेतृत्व होने के कारण किसी पिछड़े को कमान सौंपनी चाहिए।
इन नामों की चर्चा
तर्क दिया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में जिस तरह पिछड़ों व अति पिछड़ों का वोट मिला है, उसके चलते इस समीकरण की अनदेखी करना ठीक नहीं होगा।
पार्टी का नेतृत्व ब्राह्मण चेहरा डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के हाथ है। इसलिए भी विधानसभा में नेता का पद पिछड़े वर्ग के किसी व्यक्ति को दिया जाना चाहिए।
उमा भारती व केशव मौर्य बेहतर विकल्प हो सकते थे। पर, यह दोनों भी सांसद चुने जा चुके हैं। एक चेहरा धर्मपाल सिंह का भी है लेकिन कई कारणों से विधायकों के बीच उनके नाम पर सहमति बना पाना पार्टी के लिए मुश्किल हो रहा है।
पार्टी का एक वर्ग किसी वैश्य को यह पद सौंपने की पैरोकारी कर रहा है। इसका तर्क है कि वैश्य वोट भी भाजपा का प्रतिबद्ध वोट हैं।
इस सिलसिले महाना को पदोन्नति देकर नेतृत्व सौंपने के साथ पार्टी के कोषाध्यक्ष राजेश अग्रवाल, पार्टी के मुख्य सचेतक डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल और सुरेश खन्ना के नामों की भी चर्चा है।
नैपाल सिंह के इस्तीफे के बाद बचे छह सदस्य
विधान परिषद में पार्टी के पास बहुत सीमित विकल्प हैं। डॉ.नैपाल सिंह के त्यागपत्र के बाद परिषद में पार्टी के सिर्फ छह सदस्य ही बचे हैं।
इनमें पिछड़े वर्ग का कोई नेता नहीं है। ऐसे में पूर्व संसदीय कार्यमंत्री हृदयनारायण दीक्षित व कई बार से चुनकर आ रहे डॉ. यज्ञदत्त शर्मा की प्रबल दावेदारी बनती है।
पर, शर्मा का प्रदेश संगठन के साथ बहुत तालमेल दिखाई नहीं देता। विनोद पांडेय पार्टी के राष्ट्रीय सचिव हैं। महेंद्र सिंह को पार्टी ने संगठनात्मक कार्यों में लगा रखा है।
केदारनाथ सिंह भी दावेदार हो सकते हैं, पर अब तक उनकी सदन में भूमिका बहुत सक्रिय नहीं दिखी है। इसलिए दीक्षित की संभावना ज्यादा दिख रही है।