यूपी में भाजपा को एक और तगड़ा झटका, शर्मनाक हार
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फरेंदा विधानसभा उपचुनाव में भी सपा ने जीत दर्ज की। सपा प्रत्याशी विनोद मणि ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के वीरेंद्र चौधरी को 9,231 मतों से हराया।
जबकि यहां से विधायक रहे भाजपा के बजरंग बहादुर सिंह तीसरे स्थान पर रहे। विनोद मणि को 64,878, वीरेंद्र चौधरी को 55,647 और भाजपा के बजरंग बहादुर सिंह को 41,247 वोट मिले।
सपा की इस जीत से अनुमान लगाया जा रहा है कि यूपी में भाजपा का मिशन 2017 और कमजोर पड़ गया है और मोदी लहर तो अब कहीं अस्तित्व में ही नहीं है।
कांग्रेस की भी बांछे खिल गईं
उपचुनाव में लगातार हार का सामना कर रही भाजपा को फरेंदा विधानसभा सीट के उपचुनाव के नतीजे ने एक और करारा झटका दिया है। दो बार से यहां निर्वाचित हो रहे भाजपा के बजरंग बहादुर न सिर्फ सपा के विनोद मणि से चुनाव हारे बल्कि वह तीसरे नंबर पर रहे।
कांग्रेस को हालांकि इस सीट पर भी पराजय का ही सामना करना पड़ा है लेकिन इसके बावजूद इसकी बांछें खिल गई हैं। उसके उम्मीदवार वीरेंद्र चौधरी का भाजपा से आगे निकलना किसी उपलब्धि से कम नहीं है।
विधायक रहते ठेकेदारी करने के मामले में लोकायुक्त की सिफारिश के बाद राज्यपाल राम नाईक ने फरवरी में बजरंग बहादुर सिंह को विधानसभा सदस्यता के अयोग्य घोषित कर दिया था। इसी के चलते यहां उपचुनाव हुआ।
प्रदेश कांग्रेस के कम्युनिकेशन विभाग के चेयरमैन सत्यदेव त्रिपाठी कांग्रेस की हार पर कुछ कहने के बजाय इस बात पर खुशी जताते हैं कि भाजपा तीसरे नंबर पर चली गई।
फिर खोखली साबित हुई भाजपाई दावों की पोल
सत्यदेव त्रिपाठी कहते हैं कि वे भाजपा का तीसरे नंबर पर रहना यह साबित करता है कि मोदी का जादू उतर गया है। कांग्रेस का उत्साह यूं ही नहीं है। सूबे में जिस तरह कांग्रेस को राजनीतिक लड़ाई से बाहर माना जा रहा था, वैसे में फरेंदा में दूसरे स्थान पर रहना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
वहीं, इस जीत के साथ सपा लगातार 11वीं सीट पर उपचुनाव ही नहीं जीती, बल्कि उसने एक बार फिर भाजपा की नीति, रणनीति और दावों की पोल खोल दी। साथ ही बता दिया है कि 2017 में सूबे में सरकार बनाने का सपना देख रही भाजपा के लिए राह बहुत आसान नहीं है।
भले ही भाजपा के प्रवक्ता मनोज मिश्र कहते हों कि सत्तापक्ष ने पुलिस व अधिकारियों की बदौलत यह जीत हासिल की है, पर यह तर्क आसानी से गले से नीचे नहीं उतरता। अगर मामला सिर्फ सत्ता के दुरुपयोग का होता और भाजपा मुकाबले में होती तो कम से कम दूसरे स्थान पर रहती ही, पर पार्टी का तीसरे स्थान पर रहना अपने आप में यह साबित करता है कि लोगों की नाराजगी के चलते यह स्थिति बनी है।
यहां भाजपा की तुलना में कांग्रेस के उम्मीदवार को लगभग 14 हजार वोट ज्यादा मिले। सपा के उम्मीदवार की तुलना में भाजपा लगभग 23 हजार वोटों से पीछे रही है।
मिशन 2017 की राह नहीं आसान
लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा जो भी सीटें हारी है, उन सभी पर 2012 में भाजपा ही जीती थी। जाहिर है कि भले ही सूबे में लोकसभा की कुल 80 सीटों में 73 पर भाजपा व गठबंधन के सांसद हों, पर प्रदेश विधानसभा के 2017 में होने वाले चुनाव भगवा टोली के लिए बहुत आसान नहीं हैं।
लोकसभा चुनाव के बाद यूपी में अब तक 14 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में 11 में भाजपा का हारना यह बताने के लिए काफी है कि प्रदेश में पार्टी की सदस्यता का आंकड़ा दो करोड़ पहुंचा देने के बावजूद वोटों के गणित के लिहाज से भगवा टोली को अभी बहुत काम करना बाकी है।
लोकसभा चुनाव के बाद जो माहौल दिख रहा था, उसे देखते हुए उपचुनाव के नतीजे भगवा रणनीतिकारों के लिए चिंता का विषय होने चाहिए थे, पर अभी तक वे इससे सबक लेते हुए नहीं दिख रहे।