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यूपी: उपचुनाव में भाजपा के लिए खुला मैदान छोड़ रहा विपक्ष, सपा-कांग्रेस व बसपा खुद में ही उलझे

Sun, 30 Jun 2019 05:46 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sun, 30 Jun 2019 05:46 PM IST
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BJP and other parties planning for bypoll in Uttar Pradesh.
प्रतीकात्मक तस्वीर

लोकसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने के बाद भाजपा अपनी जमीन मजबूत बनाए रखने और विपक्ष की धार कुंद करने में एक बार फिर जुट गई है। सरकार से लेकर संगठन तक सरोकारों पर काम शुरू कर दिए गए हैं। विरोधियों का रवैया भी इसमें भाजपा की मदद कर रहा है।

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वजह जो भी हो लेकिन विपक्ष भविष्य की तैयारियों को लेकर न तो सक्रिय दिख रहा है और न ही भाजपा से मुकाबले को चिंतित। निकट भविष्य में विधानसभा की 12 सीटों के उपचुनाव होने हैं। उनमें भी ये तैयारियां भाजपा की मदद करेंगी।
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दूसरी तरफ सपा मुखिया अखिलेश यादव विदेश यात्रा पर हैं तो कांग्रेस अभी राहुल गांधी के इस्तीफे में ही उलझी है। बसपा सुप्रीमो मायावती की सक्रियता भी परिवार के लोगों को पार्टी में प्रभावशाली बनाने तक ही सीमित दिखाई दे रही है।

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एक महीने में ये रही भाजपा की सक्रियता

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद सिर्फ एक महीने की सियासी सरगर्मियों पर नजर दौड़ाएं तो लगता है कि विपक्ष खुद भाजपा के लिए खुला मैदान छोड़ता जा रहा है।

लोकसभा चुनाव से निपटते ही भाजपा के रणनीतिकार जहां विधानसभा की 12 सीटों पर होने वाले उपचुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं तो 2022 विधानसभा चुनाव को लेकर भी जमीन तैयार करने का खाका खींचना शुरू कर दिया है।

वहीं, विपक्ष का कहीं पता नहीं है। सिर्फ एक महीने में कई ऐसे मुद्दे सामने आ चुके हैं जिन पर विपक्ष सरकार और भाजपा को घेर सकता था, पर कहीं कोई हलचल नहीं दिखाई दी। विरोधी दल सिर्फ बयानों और ज्ञापन तक सीमित रहे।

ये हैं भाजपा की सक्रियता के प्रमाण

विश्लेषकों का निष्कर्ष सही लगता है। चुनाव निपटते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विभागवार मंत्रियों के साथ समीक्षा बैठक कर न सिर्फ अब तक हुए कामों और योजनाओं की स्थिति समझी, बल्कि अगले ढाई वर्ष का लक्ष्य भी निर्धारित कर दिया।

पर्यटन से लेकर विकास तक के काम पूरे करने की समयसीमा तय कर दी। अयोध्या सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर विकास के काम और पर्यटन सुविधाएं बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर भाजपा सरकार जहां लोगों को हिंदुत्व के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व सरोकारों का संदेश देने में जुटी है, वहीं 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी करने का फैसला कर सपा व बसपा के बचे-खुचे आधार को भी कमजोर करने का प्रयास किया है।

विपक्ष समझ नहीं पा रहा, क्या करें

क्षेत्रीय राजनीति के विशेषज्ञ प्रो. अश्विनी कुमार दुबे का कहना है कि सपा व बसपा का मुख्य आधार जाति थी। जाति के गणित के आधार पर इन दोनों ने गठबंधन करके मुस्लिम वोटों के सहारे भाजपा के समीकरण बिगाड़कर सफलता की सोची थी। पर, लोकसभा चुनाव नतीजों ने रजनी कोठारी की अवधारणा ‘भारतीय राजनीति का अध्ययन जाति के अध्ययन के बगैर संभव नहीं है’ गलत साबित कर दिया।

बता दिया कि भारतीय राजनीति में अब जाति एक निर्धारक तत्व नहीं रहा। ऐसे में सपा और बसपा समझ ही नहीं पा रही हैं कि वे क्या करें।

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