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भातखंडे समारोह: धुनों में लिपटा रहा तीसरा दिन
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sat, 06 Sep 2014 01:40 PM IST
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भातखण्डे जयंती के समापन समारोह पर पुणे के प्रख्यात तबला वादक पद्मश्री पं. सुरेश तलवलकर को ‘गुरु सम्मान’ प्रदान किया गया। मुख्य अतिथि राज्यपाल राम नाईक ने उन्हें अंगवस्त्र व स्मृतिचिह्न देकर सम्मानित किया।
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इसके बाद तबला व सरोद वादन की प्रस्तुतियों ने जयंती को यादगार बना दिया। राज्यपाल ने कहा कि बगैर तबले के संगीत अधूरा है। यह संगीत को जोड़ने का काम करता है।
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उन्होंने कहा कि तलवलकर गोरेगांव (मुंबई) के रहने वाले हैं, जहां मैंने लंबा अरसा बिताया है। वह मेरे मित्र हैं। इसलिए उनको सम्मानित करना सुखद संयोग है।
16 साल पहले तलवलकर का कार्यक्रम देखा था, आज फिर से मौका मिला है, जिसे एन्जॉय करूंगा। सम्मान समारोह के बाद तबलावाद पं. सुरेश तलवलकर ने वाद्ययंत्र की यादगार प्रस्तुतियां दीं।
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उनके साथ तबले पर ही आशय कुलकर्णी, पखावज पर ओंकार दलवी, हारमोनियम पर चिन्मय कोलहटकर और गायन पर विनय रामदासन ने संगत की।
इससे पूर्व कोलकाता से आए सरोदवादक आबीर हुसैन ने राग देश और पहाड़ी धुन पेश की। रविनाथ मिश्र ने तबले और तानपुरे पर माजिद ने संगत की। भातखण्डे के विद्यार्थियों ने विनीत पवैया के निर्देशन में प्रस्तुतियां दीं।
‘ऐन मौके पर हुए बदलाव’
जयंती समारोह को भव्य बनाने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा मनमुताबिक नाम कार्ड में छपवा दिए गए। लेकिन ऐन मौके पर फेरबदल करने से आला अधिकारियों की काफी किरकिरी हुई। मसलन, पहले दिन शास्त्रीय गायन केलिए मुम्बई के पं. अजय पोहनकर का कार्यक्रम रखा गया।
ऐन मौके पर उनकी जगह खुद कुलपति श्रुति सडोलीकर ने प्रस्तुतियां दीं। जबकि अजय पोहनकर ने हफ्ते भर पहले ही अस्वस्थता का हवाला देते हुए आने से इनकार कर दिया था।
ऐसे ही समापन पर मुख्य सचिव आलोक रंजन के विदेश जाने की जानकारी होने के बावजूद उन्हें बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया गया। उनके न आने से आनन-फानन में राज्यपाल को आमंत्रित किया गया। जिससे उदघाटन व समापन दोनों उन्हीं के हाथों हुआ। ऐसे ही संस्कृति मंत्री अरुणा कोरी भी जयंती से दूर ही रहीं।