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डिब्बा बंद दूध व कृत्रिम आहार के वितरण पर प्रतिबंध
Mon, 18 May 2020 10:49 AM IST
विक्रांत चतुर्वेदी
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: विक्रांत चतुर्वेदी
Updated Mon, 18 May 2020 10:49 AM IST
सार
- कोरोना संक्रमण को देखते हुए डब्ल्यूएचओ ने दिया सुझाव
- ऐसे आहार से गर्भवतियों और बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है कम
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Milk
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विस्तार
आईएमएस एक्ट के प्रावधान और विश्व स्वास्थ संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सुझाव को देखते हुए बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग (आईसीडीएस) ने मौजूदा समय में डिब्बा बंद दूध और बच्चों के कृत्रिम आहार के वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया है। लॉकडाउन के दौरान तमाम ऐसे आहारों की निर्माता कंपनियां, स्वयंसेवी संस्थाओं और संगठन मिलकर गर्भवती और धात्री महिलाओं के बीच निशुल्क डिब्बा बंद दूध और कृत्रिम आहार वितरण कर रहीं हैं।
जबकि डब्ल्यूएचओ व यूनिसेफ का सुझाव है कि कृत्रिम आहार के सेवन से गर्भवती व धात्री महिलाओं की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। ऐसी महिलाओं को कोरोना से संक्रमित होने का खतरा अधिक रहता है। इसके मद्देनजर ही आइसीडीएस ने सभी डीपीओ व सीडीपीओ को कृत्रिम आहार के वितरण पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं।
दरअसल, कोरोना काल में शिशुओं के लिए डिब्बा बंद दूध और कृत्रिम शिशु आहारों की बिक्री बढ़ाने और अपने उत्पाद का प्रचार करने के लिए निर्माता कंपनियों द्वारा ऐसे तमाम संगठनों के साथ मिलकर डिब्बा बंद दूध और कृत्रिम आहार का निशुल्क वितरण कर रहे हैं। ऐसे में तमाम माताएं स्तनपान कराने के बजाय कृत्रिम आहार पर निर्भर होती जा रहीं है। इससे शिशुओं की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने की संभावना बनी रह रही है।
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वहीं डब्ल्यूएचओ का कहना है डिब्बा बंद दूध आदि के सेवन से 6 माह से कम उम्र वाले बच्चों के मृत्यु दर के बढ़ने की अधिक संभावना रहती है। इसलिये कम से कम एक साल तक बच्चों को कृत्रिम आहार देने से बचना चाहिए। यूनिसेफ का सुझाव है कि आसानी से उपलब्ध होने की वजह से माताएं स्तनपान जैसे सुरक्षित साधन के स्थान पर डिब्बा बन्द दूध व कृत्रिम आहार को अहमियत देने लगती हैं और धीरे-धीरे उसी पर निर्भर हो जाती हैं। इसका प्रतिकूल असर शिशुओं के प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है।
यूनिसेफ और डब्ल्यूएचओ का मानना है कोरोना काल में शिशुओं, धात्री व गर्भवती महिलाओं को कृत्रिम आहारों से बचना चाहिए। इसके मद्देनजर ही निदेशक आईसीडीएस शत्रुघ्न सिंह ने सभी डीएम के साथ ही डीपीओ व सीडीपीओ को विभिन्न कंपनियों व स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा डिब्बा बंद दूध व अन्य कृत्रिम आहारों के निशुल्क वितरण को तत्काल प्रतिबंधित करने के लिए पत्र लिखा है।
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जबकि डब्ल्यूएचओ व यूनिसेफ का सुझाव है कि कृत्रिम आहार के सेवन से गर्भवती व धात्री महिलाओं की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। ऐसी महिलाओं को कोरोना से संक्रमित होने का खतरा अधिक रहता है। इसके मद्देनजर ही आइसीडीएस ने सभी डीपीओ व सीडीपीओ को कृत्रिम आहार के वितरण पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं।
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दरअसल, कोरोना काल में शिशुओं के लिए डिब्बा बंद दूध और कृत्रिम शिशु आहारों की बिक्री बढ़ाने और अपने उत्पाद का प्रचार करने के लिए निर्माता कंपनियों द्वारा ऐसे तमाम संगठनों के साथ मिलकर डिब्बा बंद दूध और कृत्रिम आहार का निशुल्क वितरण कर रहे हैं। ऐसे में तमाम माताएं स्तनपान कराने के बजाय कृत्रिम आहार पर निर्भर होती जा रहीं है। इससे शिशुओं की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने की संभावना बनी रह रही है।
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वहीं डब्ल्यूएचओ का कहना है डिब्बा बंद दूध आदि के सेवन से 6 माह से कम उम्र वाले बच्चों के मृत्यु दर के बढ़ने की अधिक संभावना रहती है। इसलिये कम से कम एक साल तक बच्चों को कृत्रिम आहार देने से बचना चाहिए। यूनिसेफ का सुझाव है कि आसानी से उपलब्ध होने की वजह से माताएं स्तनपान जैसे सुरक्षित साधन के स्थान पर डिब्बा बन्द दूध व कृत्रिम आहार को अहमियत देने लगती हैं और धीरे-धीरे उसी पर निर्भर हो जाती हैं। इसका प्रतिकूल असर शिशुओं के प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है।
यूनिसेफ और डब्ल्यूएचओ का मानना है कोरोना काल में शिशुओं, धात्री व गर्भवती महिलाओं को कृत्रिम आहारों से बचना चाहिए। इसके मद्देनजर ही निदेशक आईसीडीएस शत्रुघ्न सिंह ने सभी डीएम के साथ ही डीपीओ व सीडीपीओ को विभिन्न कंपनियों व स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा डिब्बा बंद दूध व अन्य कृत्रिम आहारों के निशुल्क वितरण को तत्काल प्रतिबंधित करने के लिए पत्र लिखा है।