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सोनभद्र: किसके इशारे पर बचाए जा रहे मकड़ीबाड़ी की घोषित वन भूमि खुर्द-बुर्द करने वाले 

Mon, 26 Aug 2019 02:32 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 26 Aug 2019 02:32 AM IST
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At whose behest forest land accused of the makdibari being saved in Sonbhadra
forest - फोटो : social media

सोनभद्र के गांव मकड़ीबाड़ी में घोषित 230 हेक्टेयर वन भूमि को खुर्द-बुर्द करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की संस्तुति संबंधी फाइल आज भी कहीं शासन में धूल फांक रही है। 

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भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तहत इस भूमि को वन भूमि घोषित कर दिया गया था, जिसका स्टेटस किसी भी हालत में नहीं बदला जा सकता था। लेकिन, वर्ष 2008 में अधिकारियों की मिलीभगत से यह जमीन जेपी एसोसिएट्स को दे दी गई। मामला पकड़ में आया तो जमीन तो वापस लेनी पड़ी, पर दोषी अधिकारियों को आज तक कार्यवाही के दायरे में नहीं लाया गया है।
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सोनभद्र के उभ्भा गांव में जमीन विवाद में 10 लोगों की हत्या के बाद तमाम फाइलें नए सिरे से निकाली जा रही हैं, पर सूत्रों के मुताबिक मकड़ीबाड़ी गांव की फाइल अभी भी दबी हुई है। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 1987 में तत्कालीन सचिव, वन कमल पांडेय ने मकड़ीबाड़ी की 230 हेक्टेयर जमीन भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तहत वन भूमि घोषित कर दी थी। 
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सिर्फ इस घोषणा का गवर्नमेंट प्रेस से प्रकाशन नहीं किया गया था। बताते हैं कि ऐसा भी एक षड्यंत्र के तहत किया गया था, ताकि कभी भी इस जमीन को खुर्द-बुर्द किया जा सके।

बसपा शासन में बड़े ही गुपचुप ढंग से इस जमीन को जेपी एसोसिएट्स के पक्ष में निकाल दिया गया। वर्ष 2014 में तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक एके जैन ने अपनी जांच रिपोर्ट में इस मामले का प्रमुखता से जिक्र किया। इसके लिए जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ कार्रवाई और मामले की सीबीआई जांच तक की संस्तुति की। 

पड़ताल में पता चला है कि वर्ष 2008 में शासन के एक अधिकारी ने तत्कालीन संबंधित डीएफओ से जमीन जेपी को देने का प्रस्ताव मंगाया। हालांकि, डीएफओ ने शासन के निर्देशों के क्रम में जमीन देने का प्रस्ताव तो भेज दिया, पर इस पर अपनी कोई संस्तुति या राय नहीं दी। 

यहां बता दें कि जेपी को जमीन देने का मामला वर्ष 2014 में अमर उजाला ने प्रमुखता से उठाया, तो अखिलेश सरकार को कैबिनेट में प्रस्ताव लाकर जमीन तो वापस लेनी पड़ी, पर कार्रवाई की संस्तुति संबंधी फाइल को वैसे ही छोड़ दिया गया।

गड़बड़ करने वाले इन अधिकारियों की पहुंच का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि 17 जनवरी 2014 को एक पत्र के माध्यम से भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी इस पर गहरी आपत्ति जताई। 


यह पत्र अमर उजाला के पास मौजूद है, लेकिन इसके बाद भी दोषी बच निकले। वन विभाग के ही अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के न जाने कितने मामले सोनभद्र जिले में हैं, अगर ईमानदारी से जांच होगी तो दूध और पानी को अलग होने में देर नहीं लगेगी।

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