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अकादमी अवॉर्ड के लिए चुने गए नगर के वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल मिश्र
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रंगकर्म उनका शौक है। वे तीन दशक से अधिक समय से समाज की हकीकत को अभिनय के मंचन में पिरो रहे हैं। 14 नाटक लिखे।
उनकी एक किताब ‘चौराहे पर नुक्कड़’ भी प्रकाशित हुई, लेकिन उन्होंने अपने इस शौक आजीविका नहीं बनाया। जीवन यापन के लिए वह पान की गुमटी चलाते हैं।
राजधानी में नुक्कड़ नाटकों के जरिये समाज में हाशिये पर रह रहे लोगों की आवाज उठा रहे ऐसे वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल मिश्र ‘गुरुजी’ को अब अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा।
उप्र. संगीत नाटक अकादमी की ओर से बृहस्पतिवार को घोषित किए गए पुरस्कारों में जब उनका नाम आया तो वह शाम ढलने के बाद कैसरबाग में आजीविका के एकमात्र साधन पान की दुकान (गुमटी) पर लेनदेन का हिसाब कर रहे थे।
करीबी पत्रकारों ने फोन कर उन्हें इसकी जानकारी दी तो उन्होंने आसमान की ओर देखकर मेहनत के इस पारितोषिक के लिए शुक्रिया किया।
बहुतों को मालूम नहीं होगा, लेकिन अक्सर उन्हें इसी दुकान पर किसी न किसी नाटक की पटकथा को धार देते हुए देखा भी जा सकता है।
अमर उजाला से बातचीत में वरिष्ठ रंगकर्मी ने बताया कि तीन सालों से उन्हें उम्मीद थी कि अकादमी की ओर से रंगमंच में सराहनीय काम करने वालों की लिस्ट में उनका नाम भी आएगा।
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लेकिन रंगमंच में उनकी मेहनत को 25-28 साल बाद पहचान मिली, इस बात की उन्हें बड़ी खुशी है। मूल रूप से लखनऊ के ही रहने वाले गुरुजी ने बताया कि नुक्कड़ नाटकों के मंचन के साथ ही 1986 में उनकी रंगमंच यात्रा शुरू हुई।
स्नातक की पढ़ाई के बाद लविवि से रंगमंच डिप्लोमा किया। मंच पर रहकर समाज के पीड़ितों, शोषितों की आवाज उठानी शुरू की तो लोगों ने गुरुजी नाम दे दिया।
दर्जनों नाट्य मंचनों के अलावा कई नाटकों की कहानी लिख चुके गुरुजी ने बताया कि कई नुक्कड़ नाटकों पर लिखी उनकी किताब छप चुकी है।
भावुक होते हुए बताया कि पान की गुमटी पर दिन बिताने के दौरान जमीनी लोगों की दिक्कतों, उनके हालातों से करीब से रूबरू होते हैं। उनका दर्द ही नाटकों के जरिये मंच पर दर्शकों के सामने उकेरने की कोशिश करता हूं।
नहीं बसाया घर, पान की दुकान पर ही मिलते हैं करीबी
55 वर्षीय वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल मिश्र ‘गुरुजी’ रंगमंच और नाटकों की दुनिया में कुछ इस कदर गुम हुए कि अभी तक घर नहीं बसाया। परिचितों के लिए उनसे मुलाकात का एक ही अड्डा कैसरबाग में उनकी पान की गुमटी है। बताते हैं कि दोस्तों, परिचितों से मिलने का बहाना कह लीजिये या आजीविका चलाने का एक साधन। यहीं पर परिचितों से मुलाकात हो जाती है। यारी दोस्ती में बिक्री, कमाई फिलहाल मेरे लिए मायने नहीं रखती, जो कुछ भी है परिचितों, दोस्तों और रंगमंच का ककहरा सीखने आने वाले बच्चों के लिए ही है। मेरे परिचित मिलने आते हैं, मेरे मेहमान हैं, मेहमानों से कुछ लिया नहीं जाता। पिछले 30 से अधिक वर्षों से परिवर्तन चौक से काकोरी स्थल तक शहीदों की याद में जनगीत गाते हुए साइकिल यात्रा निकाल रहे गुरुजी का कहना है कि अवॉर्ड मिलने के बाद अभी भी काफी काम करना बाकी है।
जिन शिष्यों को सिखाया उन्हें पहले मिल चुका अवॉर्ड
मूलरूप से बनारस के निवासी और लखनऊ में करीब चार दशकों से भी अधिक समय से शास्त्रीय गायन की पहचान बने रहे पं. रामेश्वर प्रसाद मिश्र को भी अकादमी अवॉर्ड सम्मान के लिए चुना गया है। इस सम्मान पर खुशी जताते हुए उन्होंने कहा कि चलो देर से ही मिला तो सही। भावुक होते हुए कहा कि मेरे शास्त्रीय गायन को पहचानने में इतनी देर हुई, इसका थोड़ा अफसोस है, लेकिन अच्छा लग रहा है। मेरे सिखाये कई शिष्य मुझसे पहले ये अवॉर्ड पा चुके हैं। लंबे समय तक उप्र. संगीत नाटक अकादमी से जुड़े रहने के बाद वर्ष 1984 में भातखंडे संगीत विवि में बतौर शास्त्रीय गायन प्रवक्ता बने पं. रामेश्वर 2010 में सेवानिवृत्त हुए। उसके बाद से लखनऊ और बनारस में गायकी के इच्छुक कई शिष्यों को फिलहाल गायन सिखा रहे पं. रामेश्वर ने कहा कि पुरस्कार एक कलाकार की प्रतिभा का सम्मान हैं। ऐसे सम्मान के बाद कलाकार को कुछ नया करने की उमंग भी देते हैं।
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उनकी एक किताब ‘चौराहे पर नुक्कड़’ भी प्रकाशित हुई, लेकिन उन्होंने अपने इस शौक आजीविका नहीं बनाया। जीवन यापन के लिए वह पान की गुमटी चलाते हैं।
राजधानी में नुक्कड़ नाटकों के जरिये समाज में हाशिये पर रह रहे लोगों की आवाज उठा रहे ऐसे वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल मिश्र ‘गुरुजी’ को अब अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा।
उप्र. संगीत नाटक अकादमी की ओर से बृहस्पतिवार को घोषित किए गए पुरस्कारों में जब उनका नाम आया तो वह शाम ढलने के बाद कैसरबाग में आजीविका के एकमात्र साधन पान की दुकान (गुमटी) पर लेनदेन का हिसाब कर रहे थे।
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करीबी पत्रकारों ने फोन कर उन्हें इसकी जानकारी दी तो उन्होंने आसमान की ओर देखकर मेहनत के इस पारितोषिक के लिए शुक्रिया किया।
बहुतों को मालूम नहीं होगा, लेकिन अक्सर उन्हें इसी दुकान पर किसी न किसी नाटक की पटकथा को धार देते हुए देखा भी जा सकता है।
अमर उजाला से बातचीत में वरिष्ठ रंगकर्मी ने बताया कि तीन सालों से उन्हें उम्मीद थी कि अकादमी की ओर से रंगमंच में सराहनीय काम करने वालों की लिस्ट में उनका नाम भी आएगा।
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लेकिन रंगमंच में उनकी मेहनत को 25-28 साल बाद पहचान मिली, इस बात की उन्हें बड़ी खुशी है। मूल रूप से लखनऊ के ही रहने वाले गुरुजी ने बताया कि नुक्कड़ नाटकों के मंचन के साथ ही 1986 में उनकी रंगमंच यात्रा शुरू हुई।
स्नातक की पढ़ाई के बाद लविवि से रंगमंच डिप्लोमा किया। मंच पर रहकर समाज के पीड़ितों, शोषितों की आवाज उठानी शुरू की तो लोगों ने गुरुजी नाम दे दिया।
दर्जनों नाट्य मंचनों के अलावा कई नाटकों की कहानी लिख चुके गुरुजी ने बताया कि कई नुक्कड़ नाटकों पर लिखी उनकी किताब छप चुकी है।
भावुक होते हुए बताया कि पान की गुमटी पर दिन बिताने के दौरान जमीनी लोगों की दिक्कतों, उनके हालातों से करीब से रूबरू होते हैं। उनका दर्द ही नाटकों के जरिये मंच पर दर्शकों के सामने उकेरने की कोशिश करता हूं।
नहीं बसाया घर, पान की दुकान पर ही मिलते हैं करीबी
55 वर्षीय वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल मिश्र ‘गुरुजी’ रंगमंच और नाटकों की दुनिया में कुछ इस कदर गुम हुए कि अभी तक घर नहीं बसाया। परिचितों के लिए उनसे मुलाकात का एक ही अड्डा कैसरबाग में उनकी पान की गुमटी है। बताते हैं कि दोस्तों, परिचितों से मिलने का बहाना कह लीजिये या आजीविका चलाने का एक साधन। यहीं पर परिचितों से मुलाकात हो जाती है। यारी दोस्ती में बिक्री, कमाई फिलहाल मेरे लिए मायने नहीं रखती, जो कुछ भी है परिचितों, दोस्तों और रंगमंच का ककहरा सीखने आने वाले बच्चों के लिए ही है। मेरे परिचित मिलने आते हैं, मेरे मेहमान हैं, मेहमानों से कुछ लिया नहीं जाता। पिछले 30 से अधिक वर्षों से परिवर्तन चौक से काकोरी स्थल तक शहीदों की याद में जनगीत गाते हुए साइकिल यात्रा निकाल रहे गुरुजी का कहना है कि अवॉर्ड मिलने के बाद अभी भी काफी काम करना बाकी है।
जिन शिष्यों को सिखाया उन्हें पहले मिल चुका अवॉर्ड
मूलरूप से बनारस के निवासी और लखनऊ में करीब चार दशकों से भी अधिक समय से शास्त्रीय गायन की पहचान बने रहे पं. रामेश्वर प्रसाद मिश्र को भी अकादमी अवॉर्ड सम्मान के लिए चुना गया है। इस सम्मान पर खुशी जताते हुए उन्होंने कहा कि चलो देर से ही मिला तो सही। भावुक होते हुए कहा कि मेरे शास्त्रीय गायन को पहचानने में इतनी देर हुई, इसका थोड़ा अफसोस है, लेकिन अच्छा लग रहा है। मेरे सिखाये कई शिष्य मुझसे पहले ये अवॉर्ड पा चुके हैं। लंबे समय तक उप्र. संगीत नाटक अकादमी से जुड़े रहने के बाद वर्ष 1984 में भातखंडे संगीत विवि में बतौर शास्त्रीय गायन प्रवक्ता बने पं. रामेश्वर 2010 में सेवानिवृत्त हुए। उसके बाद से लखनऊ और बनारस में गायकी के इच्छुक कई शिष्यों को फिलहाल गायन सिखा रहे पं. रामेश्वर ने कहा कि पुरस्कार एक कलाकार की प्रतिभा का सम्मान हैं। ऐसे सम्मान के बाद कलाकार को कुछ नया करने की उमंग भी देते हैं।