सियासी वजूद ही नहीं बेटे के भविष्य के लिए भी शिवपाल हैं परेशान
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शिवपाल सिंह यादव का सेकुलर मोर्चा बनाने का एलान। उससे पहले पुत्र आदित्य के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात। कुछ दिन बाद मुख्यमंत्री को दृढ़ निश्चयी व्यक्ति बताना और यह कहना कि उनके अनुरूप प्रदेश के अधिकारी काम नहीं कर रहे हैं। फिर यह बोलना कि नई सरकार है, इसलिए छह महीने के बाद ही आलोचना करूंगा।
अभी हाल में यह टिप्पणी कि अखिलेश का नारा लगाने वाले मौकापरस्त गले में भाजपा का गमछा डालकर कानून-व्यवस्था बिगाड़ रहे हैं। इसके बाद फिर यह बात कि मुख्यमंत्री मेहनती और ईमानदार हैं।
शिवपाल की ये बातें और बयान कहीं न कहीं सूबे की भावी सियासत की कहानी का भी संकेत दे रहे हैं। इनके पीछे भविष्य के सियासी समीकरण दुरुस्त करने की जद्दोजहद दिख रही है तो राजनीतिक वजूद बचाने की फिक्र भी नजर आ रही है।
बोल भले ही शिवपाल रहे हों, लेकिन इनके पीछे मुलायम सिंह यादव भी खड़े नजर आ रहे हैं। यह बात तब और भी ठीक तरह से समझ में आ सकती है जब मुलायम के दूसरे बेटे प्रतीक और बहू अपर्णा यादव के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मधुर रिश्तों को शिवपाल के बयानों से जोड़कर देखें।
इससे यह बात और भी ठीक तरह से समझ में आ जाएगी कि शिवपाल की इन बातों के पीछे सपा के अपने भी सियासी समीकरण हैं। कोशिश सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर सियासी दबाव बनाने की भी नजर आती है।
बसपा में जानें की गलती नहीं करेंगे शिवपाल
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो शिवपाल के सामने इस समय ज्यादा विकल्प नहीं हैं। बसपा प्रमुख मायावती भले ही चुनाव के समय शिवपाल को लेकर नरम बोल बोलती रही हों, पर ताजा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए वह बसपा में जाने की गलती नहीं करना चाहेंगे।
कारण, उन्हें पता होगा कि जिस तरह गैर भाजपा गठबंधन में सपा और बसपा के एक साथ रहने की संभावनाएं बन रही हैं, उसमें उनका गुजारा बसपा में होने वाला नहीं। जब मुलायम के साथ होने के बावजूद सपा में भतीजे के सामने उनकी एक नहीं चल पाई तो उस गठबंधन में भी नहीं चलने वाली जिसमें अखिलेश प्रभावी भूमिका में होंगे। भले ही मायावती उनके साथ हों तो भी।
जहां तक सपा की बात है तो शिवपाल यह भी जान चुके हैं कि अब उनका वहां लंबे समय तक गुजारा नहीं है। कारण, गुजारा तभी होगा जब वह चुप रहें।
सामान्य विधायक या पार्टी नेता की तरह काम करें, जो उनकी जैसी कद-काठी वाले नेता के लिए काफी मुश्किल है। जाहिर है कि उन्हें भविष्य की राह तय करके रखनी है, जिससे मौका मिलते ही उस पर आगे बढ़ लें।
यह वजह तो नहीं
राजनीतिक शास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी जो कुछ बताते हैं, उससे शिवपाल के बयानों का आशय और ठीक से समझ में आ सकता है। प्रो. द्विवेदी 60 के दशक में प्रकाशित ‘मॉडर्न डेमोक्रेसी’ पुस्तक का हवाला देते हुए कहते हैं कि इसमें भारत की राजनीति के भविष्य के बारे में लिखा गया था कि आने वाले दिनों में राजनीति भी पेशा हो जाएगी, जिसमें नेता अपने वंशजों को स्थापित करने की कोशिश करेंगे।
इस नाते शिवपाल के सामने खुद से ज्यादा चिंता बेटे आदित्य के भविष्य की है। मौजूदा हालात में सपा में आदित्य का सियासी भविष्य संवरना काफी मुश्किल होगा। इसके लिए उन्हें कोई विकल्प सामने रखना होगा।
मौजूदा राजनीतिक समीकरणों के चलते इन विकल्पों में न तो बसपा हो सकती है और न कांग्रेस। कारण, कांग्रेस का सपा के साथ गठबंधन पहले से ही है। फिर वह खुद बहुत मजबूत नहीं है।
बसपा भी जिस तरह भाजपा विरोधी भावी राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा बनने को तैयार है, उसके चलते यह भी विकल्प नहीं हो सकती। ऐसे में सिर्फ भाजपा ही बचती है, जो उनके या उनके पुत्र के राजनीतिक भविष्य का सहारा बन सकती है। इसका स्वरूप भले ही कुछ हो।
यह भी है एक कारण
चर्चा यह भी है कि मुख्यमंत्री योगी की तारीफ और सेकुलर मोर्चा बनाने की घोषणा करके शिवपाल एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी कोशिश है कि अखिलेश दबाव में आकर उन्हें पहले जैसा महत्व दे दें।
महत्व न मिले तो उनके सामने भाजपा के रूप में धुर अखिलेश विरोधी राजनीतिक विकल्प खुला रहे। यह अकारण नहीं है।
सभी को पता है कि शिवपाल अगर सेकुलर मोर्चा बनाते हैं तो भले ही वह सपा की जगह न ले पाए लेकिन उसके आधार वोट बैंक में तो सेंध लगाएगा ही। इसका लाभ अंतत: भाजपा को ही होगा। भाजपा भी इस स्थिति का लाभ उठाना चाहेगी। शिवपाल भी यह जानते हैं। इसीलिए वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रति मुलायम नजर आ रहे हैं।
कहीं यह मजबूरी तो नहीं
कहा यह भी जा रहा है कि सेकुलर मोर्चा बनाने और भाजपा सरकार को लेकर नरम बयानों के पीछे समाजवादी परिवार के दिग्गजों के सामने खड़ी सियासी मजबूरी भी है। इसके पीछे कहीं न कहीं मुलायम की भी भूमिका नजर आ रही है।
वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल भी कहते हैं कि जो स्थितियां हैं, उनमें अकेले शिवपाल के ही नहीं बल्कि मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक अस्तित्व पर भी संकट खड़ा नजर आ रहा है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद सपा, बसपा और कांग्रेस एक ही भाषा बोल रही हैं। गठबंधन की भी कोशिश हो रही है। भाजपा विरोधी दलों को एक प्लेटफॉर्म पर लाने का प्रयास हो रहा है।
मुलायम को पता है कि इस फोरम या प्लेटफॉर्म पर उनके लिए जगह नहीं होगी। मुलायम जैसा दिग्गज राजनेता हाथ पर हाथ रखकर भी तो नहीं बैठ सकता। इसीलिए उन्होंने शिवपाल को आगे कर भविष्य की जगह तलाश करने के काम पर लगाया है।
मुलायम के सामने भी वजूद का संकट
रतनमणि लाल की बात सही लगती है। मुलायम जानते हैं कि वह वक्त निकल चुका है जब उनको केंद्र में रखकर राष्ट्रीय स्तर पर गैर कांग्रेस व गैर भाजपा मोर्चे की बात हुआ करती थी। रही बात योगी सरकार की तो मुलायम आज इस सरकार का उतना कड़ा विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं जितने अखिलेश हैं।
अखिलेश के पास संगठन है जो उनके पास नहीं है। फिर घर में जो पुत्र प्रतीक और बहू अपर्णा उनके साथ हैं, उनके रिश्ते योगी के साथ मधुर हैं। ऐसे में मुलायम के पास यही विकल्प है कि वह किसी न किसी बहाने अपना वजूद बनाए रखें।
इसमें शिवपाल के अलावा कोई दूसरा उनका सहारा नहीं बन सकता। इसीलिए वह शिवपाल के जरिए भविष्य की थाह नाप रहे हैं। बकौल लाल मुलायम और शिवपाल भी जानते हैं कि मोर्चा या नई पार्टी बनाना अब बड़ा मुश्किल है, पर इस तरह के बयानों से वे अपना वजूद बनाए रख सकते हैं। साथ ही अपनी अगली पीढ़ी के राजनीतिक समायोजन का रास्ता आसान बना सकते हैं।