सियासी डगर पर कितनी दूर साथ चलेंगे मुलायम-अमर
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चार साल बाद मुलायम के साथ मंच पर अमर सिंह की मौजूदगी ने सूबे के सियासी गलियारों में अटकलों को हवा देनी शुरू कर दी है। जनेश्वर मिश्र पार्क के उद्घाटन समारोह के मंच पर चार साल बाद दिखी मुलायम और अमर की दोस्ती पहले की तरह परवान चढ़ेगी या इसी समारोह तक सिमटकर रह जाएगी, यह आगे पता चलेगा।
कुछ का तर्क है कि अमर सिंह को राज्यसभा की सदस्यता चाहिए तो मुलायम को एक ऐसा साथी जो उनकी राष्ट्रीय नेता की भूमिका में मददगार बन सके। इसलिए दोस्ती परवान चढ़ेगी। पर, कुछ इसके यहीं तक रह जाने की बात कह रहे हैं।
तर्क है कि अमर सिंह की मौजूदगी के बाद आजम खां और प्रो. रामगोपाल जैसे नेताओं ने जिस तरह समारोह से दूरी बनाई है। उसके चलते मुलायम और अमर दोस्ती की दूसरी पारी के ‘अमर’ होने की कोई संभावना नही हैं।
अमर ने की कई तल्ख टिप्पणियां
अमर, मुलायम दोस्ती के परवान न चढ़ने का तर्क देने वाले उन बयानों की याद दिलाते हैं जो अमर सिंह ने सपा से बाहर होने के बाद बीते चार वर्षों में मुलायम सिंह यादव और सपा के अन्य नेताओं पर दिए हैं। सही भी है। अमर ने लोकसभा चुनाव तक मुलायम पर कई तल्ख टिप्पणियां कीं।
कभी उन्हें लोहियावादी की जगह परिवारवादी करार दिया तो कभी सपा के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव पर निशाना साधते हुए उन्हें अपने निष्कासन के लिए जिम्मेदार ठहराया।
हद तो यह रही है कि अमर सिंह ने मुलायम पर बलात्कारियों का सहयोग करने तक का आरोप लगा दिया। ऐसी स्थिति में अमर की सपा के कुनबे में दोबारा आसानी से समायोजित होने की संभावना काफी मुश्किल लग रही है।
पर, कुछ न कुछ तो है जरूर
वैसे तो अमर सिंह ने भी समारोह में मौजूदगी को व्यक्तिगत बताकर सपा में वापसी की अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश की है।
सपा के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. रामगोपाल पहले भी कई बार सार्वजनिक रूप से अमर सिंह की सपा में वापसी की संभावनाओं को खारिज करते रहे हैं। मंगलवार को भी उन्होंने दिल्ली में जो बयान दिया है, उससे भी यह दिखता है कि अमर को लेकर उनकी तल्खी बरकरार है।
बावजूद इसके चार साल बाद मुलायम के साथ मंच पर उनकी मौजूदगी सामान्य मामला नहीं माना जा सकता है। भले ही अमर सिंह हाल-फिलहाल सपा में औपचारिक रूप से शामिल न हों लेकिन मुलायम और उनके रिश्तों में तल्खी जरूर कम हुई है। जिसका असर भविष्य में सूबे के राजनीतिक समीकरणों पर दिख सकता है।
आजम पर अंकुश
कयास इस बात के भी लगाए जा रहे हैं कि मुलायम और पूरी पार्टी आजम की तुनकमिजाजी से फिर परेशान होने लगे हैं। पार्टी के प्रमुख नेता इस तरह की बातों से भी परेशान हैं कि पूरी सरकार और पार्टी आजम के इशारों पर नाचती है।
इसलिए सपा के रणनीतिकारों ने अमर सिंह को जनेश्वर मिश्र के कार्यक्रम के बहाने मंच पर बुलाकर आजम को हद बताने की कोशिश की है।
साथ ही लोगों को यह संदेश देने की कि पार्टी व सरकार आजम के सामने नतमस्तक नहीं हैं।
ये भी हैं वजहें करीबी की
अमर सिंह की राज्यसभा सदस्यता का कार्यकाल नवंबर में पूरा हो रहा है। वह तकनीकी तौर पर आज भी समाजवादी पार्टी से ही राज्यसभा के सदस्य हैं। उनके सामने दोबारा राज्यसभा जाने के लिए सपा के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
माना जा रहा है कि इसीलिए वह मुलायम से नजदीकी बढ़ा रहे हैं। दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव में सपा के सिर्फ पांच सीटों पर सिमट जाने के बाद मुलायम सिंह अपनी राष्ट्रीय नेता की छवि को लेकर चिंतित हैं।
निकट भविष्य में महाराष्ट्र सहित कुछ राज्यों के होने वाले चुनाव में वह कुछ सीटें जीतकर पार्टी को हताशा से निकालना चाहते हैं।
उन्हें भरोसा है कि किसी से गठबंधन करके दूसरे राज्यों में कुछ सीटें सपा को मिल गईं तो उनका कद बढ़ जाएगा। साथ ही उनकी राष्ट्रीय नेता की छवि भी बरकरार रहेगी। इसमें अमर सिंह मददगार हो सकते हैं।
पर, कैसे रहेंगी एक म्यान में दो तलवारें
मुलायम सिंह के साथ अमर की मौजूदगी को भले ही रिश्तों पर बर्फ पिघलने की शुरुआत मानी जा रही हो। पर, एक सवाल काफी अहम है कि एक म्यान में दो तलवारें कैसे रहेंगी। आजम और अमर एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाते रहे हैं।
सपा में रहे तो नहीं थे तो और लौटकर आए हैं तो आजम ने कभी भी अमर सिंह को पसंद नहीं किया। आजम भी अमर सिंह को ‘राजनीतिक नमक हराम’ तक कह चुके हैं। वह यह भी कह चुके हैं, ‘अमर सिंह का किस्सा खत्म हो चुका है।’ सिर्फ आजम ही नहीं पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव से भी अमर की तल्खी पुरानी है।
ऐसे में यह दोनों नेता अमर सिंह की सपा में वापसी को सहजता से स्वीकार कर लेंगे, यह काफी मुश्किल दिखता है। रामगोपाल भी आजम को लेकर कभी सहज नहीं रहे हैं। कल्याण सिंह और मुलायम की दोस्ती का सबसे पहले विरोध आजम ने किया था। अमर सिंह को तिकड़मी बताकर निशाना साधा था। प्रो. यादव ने भी आजम पर टिप्पणियां की थीं।
मुलायम पर अमर के शब्दबाण
सपा से निकाले जाने के बाद मार्च 2010 में बोले, ‘मुलायम सिंह या तो आप लोहियावादी नहीं हैं या फिर अपने स्वार्थी मुलायमवाद का सफेद झूठ लोहिया जी पर मढ़ना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि सारी नेतृत्व क्षमता, गुणवत्ता सिर्फ एक ही परिवार में है। मेरी गलती थी कि मैंने 14 साल से हो रही इस धांधली को नहीं देखा।’
23 अक्तूबर 2010 को बोले, ‘मुलायम सिंह यादव ने लोहिया के सिद्धांतों की बलि चढ़ा दी है। लोहिया ने कभी भाई-भतीजावाद को बढ़ावा नहीं दिया। मुलायम इसी को बढ़ावा दे रहे हैं। समाजवादी पार्टी में सिर्फ दो अपवाद थे। एक जनेश्वर मिश्र और दूसरे अमर सिंह। एक को राम जी खा गए तो दूसरे को रामगोपाल।’
21 फरवरी 2012 को कहा, ‘यूपी के भ्रष्टाचार में मुख्यमंत्री मायावती और मुलायम सिंह यादव दोनों साझीदार हैं। मुलायम सिंह एक पहिए की साइकिल चलाने वाले जोकर हैं।’
इसी वर्ष 12 अप्रैल को कहा, ‘मुलायम सिंह ने बलात्कार पर बयान दिया है कि लड़के हैं। मन मचल जाता है। ऐसा लगता है कि मुलायम सिंह का वश चले तो रेप को भी जायज कर दें।’