'बेअंदाज हो भाग रही थी ट्रेन, मैं चाय-समोसे लेकर खड़ा था'
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बछरावां स्टेशन पर रत्नेश सोनकर की चाय-समोसे की दुकान पिछले 43 साल से है। वह बताते हैं कि करीब 25 वर्षों से जनता एक्सप्रेस आंखों के सामने से गुजरी है लेकिन शुक्रवार को इस ट्रेन का रौद्र रूप देखा तो एक पल को कुछ समझ में नहीं आया।
जनता एक्सप्रेस दहाड़ते हुए एक नंबर प्लेटफॉर्म की लाइन पर दौड़ रही थी, मानों गुस्से में हो। मैं ट्रेन में बैठे यात्रियों के लिए चाय और समोसे लिए खड़ा था।
रफ्तार और हवा के तेज झोंके से हर कोई पीछे हट गया। दहाड़ते हुए ट्रेन गुजरी तो मैं भौंचक्का रह गया। कुछ समझ पाता उससे पहले ही तेज धमाका हुआ और बेतहाशा भाग रही ट्रेन ठहर चुकी थी।
दुकानें बंद करने से पहले लुट गईं
हर तरफ चीख पुकार मच गई। दुकान बंद करते उससे पहले ही नमकीन और पानी की बोतलें लुट गईं। जैसे-तैसे दुकान बंद की और मौके से भागे क्योंकि जनता एक्सप्रेस के बाद ट्रेन में बैठी जनता ने रौद्र रूप धारण कर लिया था।
रत्नेश बताते हैं, सबसे पहले यह दुकान बाबा शंकर लाल के नाम से थी। उनके गुजरने के बाद दादी भगवान देई के नाम से दुकान हो गई। दादी गुजरीं तो पिता गया प्रसाद ने यात्रियों की सेवा का जिम्मा लिया।
मैं 20 साल से दुकान संभाल रहा हूं। रोज यह ट्रेन आती थी लेकिन शुक्रवार को जिस अंदाज में आई वह पहली बार था।
शनिवार को जब फिर जनता एक्सप्रेस सुबह करीब नौ बजे आई तो मैं प्लेटफॉर्म से काफी दूर था क्योंकि शुक्रवार का नजारा देखकर नजदीक जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी।