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ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला नहीं बन पाए कैराना व नूरपुर उपचुनाव, भाजपा के लिए निकले ये बड़े संदेश

Fri, 01 Jun 2018 09:36 AM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 01 Jun 2018 09:36 AM IST
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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

कैराना लोकसभा सीट पर राष्ट्रीय लोकदल व नूरपुर विधानसभा सीट पर सपा की जीत से विपक्षी दलों के गठबंधन की नींव मजबूत हुई है। तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा इन सीटों पर वोटों का ध्रुवीकरण कराने में नाकाम रही। कैराना जैसे सामाजिक समीकरण वेस्ट यूपी के कई जिलों में हैं। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों का गठबंधन इन जिलों में भाजपा के सामने कड़ी चुनौती पेश करेगा।

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हरियाणा सीमा से सटे कैराना में उपचुनाव के नतीजे कई मायने में अहम हैं। इसमें कई संदेश छिपे हैं। यह वही इलाका है जहां 2013 के दंगों के बाद भाजपा के पक्ष में 2014 के लोकसभा व 2017 के विधानसभा चुनावों में सांप्रदायिक आधार पर मतों का ध्रुवीकरण हुआ था। नतीजतन, पश्चिमी यूपी में भाजपा को इकतरफा जीत हासिल हुई।
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कैराना से सटे बागपत में चौधरी अजित सिंह को भी अपनी संसदीय सीट गंवानी पड़ी। पिछले दो चुनावों में जाट और मुसलमानों के बीच खाई बनी हुई थी। कैराना उपचुनाव ने इस खाई को पाटने का काम किया है। कैराना में मुस्लिम प्रत्याशी उतारकर वोटों का ध्रुवीकरण रोकना रालोद के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं था। रालोद इसमें पास हो गया। उसने कैराना को ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला बनने से रोक दिया। कमोबेश यही नूरपुर में भी हुआ।

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जाट-मुस्लिम केमिस्ट्री ने दिया सियासी संदेश

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जीत के बाद जश्न मनाते सपा कार्यकर्ता - फोटो : amar ujala

बसपा ने हालांकि दोनों उपचुनावों में किसी भी दल को अपना खुला समर्थन नहीं दिया, लेकिन दलितों में संदेश साफ था। आम तौर पर उनका रुझान भाजपा के खिलाफ और गठबंधन के पक्ष में रहा। माना जा रहा है कि बसपा वेस्ट यूपी में जाट और मुसलमानों के बीच की केमिस्ट्री की थाह लेना चाहती थी।

परखना चाहती थी कि 2013 के दंगों के बाद उनके बीच पैदा हुई खाई कितनी पटी है? इसके बाद ही वह रालोद को लेकर अपनी राय बनाना चाहती थी। जाट बहुल गांवों में तबस्सुम के पक्ष में पड़े वोटों ने साबित कर दिया कि दंगों के बाद यमुना में बहुत पानी बह चुका है।

जाट, मुसलमानों और दलितों ने न केवल गठबंधन (रालोद) को वोट किया, वरन वे साथ खड़े भी नजर आए। इससे भाजपा विरोधी गठबंधन को मजबूती मिलेगी और उसमें रालोद की स्वीकार्यता बढ़ेगी।

रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा

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भाजपा गोरखपुर व फूलपुर की हार से सबक लेकर कैराना व नूरपुर उपचुनाव में मैदान में उतरी थी। ये दोनों सीटें भाजपा के सांसद व विधायक के निधन से खाली हुई थीं। भाजपा ने 2014 व 2017 के फॉर्मूले से फिर इन्हें जीतने की कोशिश की। चुनाव प्रबंधन बेहतर किया, लेकिन उसकी रणनीति सफल नहीं हो सकी।

भाजपा नेताओं ने दंगे की याद दिलाई, कैराना से पलायन के मुद्दे को उठाया। यहां तक कहा कि कैराना में भाजपा की हार का जश्न पाकिस्तान में मनेगा। चुनाव के बीच जिन्ना का मुद्दा भी उठा लेकिन जनता में इन्हें व्यापक समर्थन नहीं मिल सका। कैराना में रालोद व नूरपुर में सपा की जीत के बाद भाजपा को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा।

पश्चिमी यूपी की सियासत का सैंपल है कैराना

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कैराना सीट पर लगभग 32 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। इससे सटी सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद, अमरोहा, रामपुर जैसी सीटों पर मुस्लिम वोट इससे कहीं ज्यादा हैं। मेरठ, बुलंदशहर, गाजियाबाद, बागपत समेत कुछ अन्य जिलों में मुसलमान आबादी 25 से 30 फीसदी तक है। इन जिलों में दलित अच्छी खासी तादाद में हैं। जाट भी कहीं कम कहीं ज्यादा, सभी जगह हैं। ऐसे में यदि 2019 में सपा, बसपा, रालोद व अन्य छोटे दलों का गठबंधन बना तो यह भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।

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